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वीस्वावा शिम्बोर्स्का : कवि मीवोश के बारे में

आज मैं यह बताना चाहती हूँ कि मेरे देश पोलैंड के कवि चेस्‍वाव मीवोश व उनकी कविताओं की उपस्थिति में मैं किस क़दर घबराई रहती हूँ। एकदम शुरुआत से ही इस घबराहट की शुरुआत हो चुकी थी।

फ़रवरी 1945 का समय था। मैं क्राकोव गई हुई थी। वहाँ स्टारी थिएटर में कविता पाठ आयोजित था। इतने बरसों तक चले युद्ध के बाद पहली बार कोई कविता पाठ हो रहा था। आमंत्रित कवियों के नामों का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि मैं किसी को नहीं जानती थी। मैंने अच्छा-ख़ासा गद्य पढ़ रखा था, लेकिन कविताओं के बारे में मेरी जानकारी शून्य थी। इसलिए मैं चुपचाप सुनती रही, देखती रही।

ऐसा नहीं कि सभी ने अच्छी तरह पढ़ा हो। कुछ लोग तो नाक़ाबिले-बर्दाश्त बमबारी किए जा रहे थे, तो कुछ की आवाज़ टूट रही थी और उनके हाथों में फँसा काग़ज़ काँप रहा था। इसी बीच उन्होंने मीवोश नाम के किसी कवि को पुकारा। बिना किसी उन्मादी नाटकीयता के उसने बेहद शांति से अपनी कविताएँ पढ़ीं। जैसे कि वह कविता नहीं पढ़ रहा था, सस्वर सोच रहा था और हमें भी आमंत्रित कर रहा था कि आओ, मेरी सोच में शामिल हो जाओ।

मैंने ख़ुद से कहा, ‘यह रही। यह है असली कविता! यह है असली कवि!’

ज़ाहिर है, मैं थोड़ा पक्षपात कर रही थी। वहाँ दो-तीन कवि और भी थे, जिन्हें इतने ही ध्यान से सुना जाना चाहिए था। लेकिन असाधारणता का अपना ही तापमान होता है। मेरे दिल ने मुझसे कहा कि अब से इस कवि को हमेशा ग़ौर से देखना, इसकी हर चीज़ खोजना।

मेरी इस प्रशंसा का एक कड़ा इम्तिहान जल्द ही मेरे सामने आ गया। कोई एक ख़ास अवसर था और मैं जीवन में पहली बार किसी एक असली रेस्तरां में खड़ी थी। मैं टुकुर-टुकुर अपने चारों ओर देख रही थी कि क्या पाती हूँ- नज़दीक की एक टेबल पर अपने कुछ दोस्तों के साथ चेस्वाव मीवोश बैठे हैं और पोर्क या सूअर का मांस खा रहे हैं।

यह मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था। सिद्धान्तत: मैं यह जानती थी कि कवियों को भी समय-समय पर खाने की ज़रूरत होती है, लेकिन क्या कवियों को ऐसा अश्लील और फूहड़ व्यंजन खाना चाहिए?

ख़ुद को किसी तरह समझाने-बुझाने के बाद ही मैं उस आतंक से बाहर निकल पाई। जीवन में मुझे कुछ और महत्वपूर्ण अनुभव मिले और मैं कविता की बेहद गंभीर पाठक बन गई। तब तक मीवोश का संग्रह ‘रेस्क्यू’ छप चुका था और अख़बारों में उनकी नई कविताएँ पढ़ने को मिल जाती थीं। उनकी बेहद गहरी चीज़ों को मैं जब भी पढ़ती, मेरी घबराहट बढ़ती जाती।

अगली बार मैंने मीवोश को सीधे पेरिस में देखा, 1950 के दशक के आख़िरी बरसों में। वह कॉफ़ी-टेबलों के बीच रास्ता बनाते हुए तेज़ी से बढ़ रहे थे, शायद आख़िरी पंक्ति में बैठे किसी व्यक्ति से मिलने। मेरे पास पूरा मौक़ा था कि मैं जाकर उनसे मिलती, बातें करती, उन्हें कुछ ऐसा बताती जिसे सुनकर उन्हें ख़ुशी होती कि- अब भी पोलैंड में उनकी प्रतिबंधित किताबों को बेहद शौक़ से पढ़ा जाता है, उनकी किताबें तस्करी के ज़रिए देश में लाई जाती हैं। अगर कोई दिल से मेहनत करे, तो वह, आज नहीं तो कल, उनकी किताबें पा सकता है। लेकिन मैं उनके पास जा नहीं पाई। उनसे कुछ कह नहीं पाई। घबराहट के मारे मेरा सारा शरीर सुन्न हो गया था।

इसके बाद, मीवोश को पोलैंड लौट सकने में कई साल का समय लग गया। (क़रीब तीस साल) क्राकोव की क्रूपनिशा स्ट्रीट में फोटोग्राफ़रों की फ्लैशलाइट से धुआँ उठ रहा था, मार तमाम लोगों और तरह-तरह के माइक्रोफोन्स के पीछे मीवोश लगभग छुप-से गए थे। संवाददाताओं से ख़ुद को मुक्त कराने तक वे बेहद थक चुके थे। जैसे ही उससे निकले, ऑटोग्राफ़ लेने वालों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। मैं भी उसी भीड़ में खड़ी थी। मुझमें इतना साहस नहीं था कि उस बेशुमार भीड़ में मैं उन्हें रोकती, अपना परिचय देती और ऑटोग्राफ़ माँगती।

जब वे दूसरी बार पोलैंड लौटे, तब उनसे निजी मुलाक़ात करने का अवसर आया। तब से अब तक बहुत सारी चीज़ें बदल गई हैं, पर एक तरह से देखा जाए तो कुछ भी नहीं बदला। यह सही है कि उसके बाद मेरे जीवन में कई मौक़े आए जब मैंने उनसे बातें कीं, साझा दोस्तों के साथ उनसे मिली, एक ही जगह से कविताएँ पढ़ीं और हम ख़राब आयोजकों से एक साथ पीडि़त हुए।

पर आज भी मेरी समझ में नहीं आता कि इतने बड़े कवि के सामने कैसे खड़ा हुआ जाए, कैसे पेश आया जाए। जिस तरह बरसों पहले मैं अपने आसपास उन्हें पा घबरा जाती थी, उसी तरह आज भी घबरा जाती हूँ। भले हमने कुछेक बार एक-दूसरे को चुटकुले सुनाए हों और ठंडी वोद्का के गिलास टकराए हों। और भले ही एक बार हम दोनों ने एक रेस्तरां में बैठकर पोर्क से बना वैसा ही व्यंजन साथ खाया, जैसा देखकर कभी मैं आतंकित हो गई थी।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(वीस्‍वावा शिम्‍बोर्स्‍का पोलैंड की कवि थीं। उन्‍हें 1996 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह संस्‍मरण उन्‍होंने पोलैंड के ही कवि चेस्‍वाव मीवोश के 90वें जन्‍मदिन पर लिखा था। मीवोश को 1980 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।)