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Murakami by Geet Chaturvedi

मुराकामी होने का अर्थ

हारुकि मुराकामी की कीर्ति इतनी है कि बड़े से बड़ा रॉकस्टार भी उनसे ईर्ष्या करे। उनकी किताबों की दुनिया कई बार जितनी जानी-पहचानी लगती है, बाज़ दफ़ा उतनी ही अनजानी भी। किसी लेखक को हम महज़ इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक अनजान दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा, बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने व्यक्तित्व का अजाना चित्र खींच देता है। मुराकामी में ऐसा क्या है, जो उन्हें एक साथ पूरी दुनिया के पाठकों से जोड़ता है, यह बात पता करना दरअसल ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ लगाकर अपने महानगरीय समाज व व्यक्ति की निजी त्रासदियों को देखना है।

मुराकामी साझा वैश्विक संस्कृति और अनुभवों के उपन्यासकार हैं। जापान का महानगरीय समाज न तो अपने गाँवों-सा पूरी तरह जापानी है और न ही लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क की तरह यूरोपीय-अमेरिकी, बल्कि पूर्व और पश्चिम के इस मिश्रण से उसने एक तीसरा ही रंग ले लिया है। मुराकामी, यूरोपीय सांस्कृतिक दबावों से बने इसी विशिष्ट जापानी रंग के उपन्यासकार हैं। कमोबेश यही रंग एशिया व अफ्रीका के लगभग सभी महानगरों का होता जा रहा है। जीवनशैली व प्रतिस्पर्धा के दबाव ने इन सारे मनुष्यों के मनोजगत या ‘माइंडस्केप’ को एक-सा बना दिया है। तेज़ रफ़्तार, बिखरते परिवार, परिभाषाएँ बदलते मानवीय मूल्य और सफलता पा लेने के दबाव के कारण जिस तरह का अवसाद और अकेलापन टोक्यो का युवा महसूस करता है, लगभग वैसी ही अनुभूति बीजिंग, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कराची, इस्ताम्बुल जैसे शहरों का युवा भी करने लगा है। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसे महानगरों में तो यह अनुभूतियाँ पहले से थीं।

मुराकामी पर आरोप लगता है कि वह जापान में रहते हुए अमेरिकी जीवनशैली की किताब लिखते हैं, तो क्या इन सारे महानगरों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी अपने-अपने देशों में बसते हुए भी अमेरिकी जीवनशैली, भागदौड़ व दबावों को जी रहे हैं? इन महानगरों में रहने वाले पाठक भी कई बार इसे महसूस नहीं कर पाते, लेकिन मुराकामी के उपन्यास उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस करा देते हैं। यही उनकी विश्व-दृष्टि और वैश्विक समकालीनता है, जिससे वह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र हैं।

समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक दबावों से पैदा हुआ अवसाद व अकेलापन मुराकामी के उपन्यासों की मुख्य थीम हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति या युवक की कहानी लिखते हैं, जिसका भौगोलिक परिवेश तो जापानी है, लेकिन मानसिक परिवेश वैश्विक है, क्योंकि अवसाद व अकेलापन समकालीन पूंजीवादी विश्व-मानव को मिले सबसे बड़े अभिशाप हैं। ‘काफ्का ऑन द शोर’ में अभिभावकों से परेशान होकर एक नौजवान घर से बाहर निकल जाता है और लाइब्रेरी में रात बिताता है, ‘आफ्टर डार्क’ के नौजवान पूरी रात तफ़रीह करते हैं और एक-दूसरे की निजी समस्याओं को सुनते हैं तो वे उन्हें अपनी ही समस्याएँ लगती हैं। ‘वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकल’ की तरह लकदक चमकते सुपरबाज़ार में अचानक एक बिल्ली प्रगट हो जाती है और वह सुकून के उस स्वप्न की तरह दिखती है जिसे हमने बेहद अकेलेपन में देखा हो। उनकी किताबों में प्रेम व हानिबोध विराट हैं, तो जीवन व प्राप्तिबोध बेहद सूक्ष्म, और दोनों के साहचर्य में एक सोचता हुआ सौंदर्य है।

चाहे कोई भी समाज हो, भौतिक दबाव अधिक हों, तो आध्यात्मिक तलाश बलवती हो जाती है, और मुराकामी इस तलाश का ख़ालिस चित्रण करते हैं। यह करते हुए वह काफ़्का और बोर्हेस की तरह कठिन नहीं होते, न ही सेल्फ हेल्प के लेखकों जैसा सरल व उपदेशात्मक। दरअसल, मुराकामी ऐसे चतुर लेखक हैं, जिन्हें पता है कि कहानी के किन हिस्सों में कठिन होना है और कहाँ सरल बन जाना है। वह दोनों का सही अनुपात में कलात्मक मिश्रण करते हैं। उनके चरित्र अच्छाइयों का नहीं, इंसानी ख़ामियों का उदास उत्सव हैं।

अच्छा साहित्य मनुष्य की स्मृतियों को झिंझोड़ देता है। मुराकामी को पढ़ते हुए हम उदासी की अपनी स्मृतियों में चले जाते हैं। कितना भी इंकार करें, सचाई यह है कि हम अपनी उदासियों से मुहब्बत करते हैं। पराये दुखों को पढ़ने में एक सुविधा यह होती है कि आप उन दुखों को अपना महसूस करते हैं, लेकिन किसी भी समय उन्हें पराया मानकर छोड़ सकते हैं। ‘काफ़्का ऑन द शोर’ का एक संवाद है कि अपने बाहर की भूलभुलैया में तुम जितने क़दम रखोगे, तुम्हारे भीतर की भूलभुलैया भी उतनी ही घनी होती जाएगी। मनुष्य के लिए बाहरी और भीतरी का यह संघर्ष भले पुराना हो, लेकिन आज की दुनिया में यह जितना मुखर है, उतना किसी समय नहीं रहा। मुराकामी की किताबें बाहरी मेज़ पर रखी हुईं आंतरिक त्रासदी की नाज़ुक तश्तरियाँ हैं।

मुराकामी पर बात करते समय मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बीते बरसों में डोरेमॉन और उस जैसे जिन कार्टून सीरियलों ने पूरी दुनिया में स्वीकृति पाई है, वे सभी जापान से ही निकले हैं। उन्होंने मिकी माउस, डोनाल्ड डक, टॉम एंड जैरी जैसे पश्चिमी सीरियलों को लगभग बेदख़ल कर दिया। उनके चित्रण में भी आपको अवसाद, अकेलेपन, सफलता के दबाव से पैदा हुई काल्पनिक तलाश के तत्व प्रमुखता से दिखेंगे।

  • गीत चतुर्वेदी, संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 2016

नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में ‘सावंत आंटी की लड़कियाँ’ का मंचन 

नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) ने मेरी कथा-पुस्तक ‘सावंत आंटी की लड़कियाँ’ को एक नाटक में रूपांतरित किया है। आसिफ़ अली द्वारा निर्देशित और एनएसडी के छात्रों द्वारा अभिनीत दो घंटे के इस नाटक का शीर्षक है ‘गगन लाजले’। एक, दो और तीन फ़रवरी 2022 को एनएसडी सभागार में इसका मंचन हुआ।

लिखना भले एक आदमी का काम हो, लेकिन मंच पर उसे साकार करने में कई लोगों का श्रम और योगदान लगता है। कृति का यह साझापन उसमें कई आयाम जोड़ता है। जो मित्र इस नाटक ‘गगन लाजले’ को देख आए, उन्होंने इसकी सराहना की। यह जानकर अच्छा लगा। निर्देशक आसिफ़ अली तथा उनकी पूरी टीम के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ। युवा लेखिका स्वधा त्रिपाठी ने नाटक देखने के बाद फेसबुक पोस्ट लिखकर अपनी प्रतिक्रिया इस तरह ज़ाहिर की। उनकी पोस्ट इस प्रकार हैः 


नाटक ‘गगन लाजले’ की रिपोर्ट

निर्देशक – आसिफ़ अली, लेखक – गीत चतुर्वेदी 

रंगमंच पर कहानी का रूप बिल्कुल अलग होकर सामने आ जाता है। ऐसा लगता है अरे! ये तो अपने आस -पास ही हो रहा है। जब हम कहानी पढ़ रहे होते है ,तब हम उस तरह से उससे नही जुड़ पाते है। जिस तरह से हम दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यम से जुड़ पाते है। 

“सावंत आंटी की लड़कियां ” कहानी में एक मध्यम वर्ग की कथा का जिक्र है ,जिसमें लड़कियां अपने लिए निरंतर हक की माँग करती रहती हैं, और जब उन्हें वह नही मिलता है ,तो वो घर छोड़ कर बार- बार भागती रहती है। हमारा समाज और परिवार लड़कियों को ये आज़ादी नही देता की वो अपने मन से एक साथी ढूंढ ले इसी जद्दोजहद में ये कहानी चलती है। किस तरह से समाज द्वारा बनाये गए नियमों और प्रथाओं को तोड़ कर बाहर निकलने की कोशिश करती हुई लड़कियां दिखाई गई है। 

अभिनय के द्वारा कहानी में चार चांद लग जाते हैं ये बात नाटक ”गगन लाजले” को देख कर पता चलता है। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्रों की इतनी बेहतरीन प्रस्तुति देख कर काफ़ी ख़ुशी हुई। अक्सर जब हम नाटक देखते हैं तो हमें कोई किरदार या उसकी नाटकीयता शायद कभी- कभी अच्छी नहीं लगती होगी। लेकिन यहां पर एक भी किरदार ऐसा नहीं दिखा मुझें जिसको देख कर ये कहूँ की ये इस किरदार में नही फिट हो रहा है। निर्देशन कमाल का था और सारे पात्रों ने अपना किरदार बखूबी निभाया।

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पाब्लो नेरूदा – 2 : मेरी पहली कविता

अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि मैंने अपनी पहली कविता कब लिखी थी, कविता ने मेरे भीतर ठीक-ठीक कब जन्म लिया था। मैं याद करने की कोशिश करता हूँ। बचपन की बात है। उसी समय मैंने पढ़ना सीखा था। एक रोज़ मेरे भीतर भावनाओं ने उपद्रव किया और मैंने कागज़ पर कुछ शब्द लिख दिए। उनमें से कुछ लय और तुक में थे लेकिन लिखने के बाद वे शब्द भी मुझे अजनबियों जैसे लग रहे थे। मैं अपने जीवन में रोज़मर्रा जिस भाषा का इस्तेमाल करता था, ये शब्द उससे पराई भाषा के लग रहे थे। उस गहरी बेचैनी से, मैं बड़ी मशक़्क़त के बाद बाहर आ पाया। मुझे उसकी आदत नहीं थी। वह एक क़िस्म की व्यथा और उदासी थी। उससे किसी तरह परे होने के बाद मैंने उन पंक्तियों को एक सादे काग़ज़ पर साफ़-सुथरा लिख दिया।

वह कविता मेरी माँ के लिए थी। मेरी सौतेली माँ। हाँ, मैं एक अच्छी सौतेली माँ को जानता हूँ। वह सौतेली थी, लेकिन फ़रिश्तों जैसी थी, उसकी नरम-मुलायम छांव में मेरे बचपन की निगहबानी हुई। मैंने पहली ही कविता लिखी थी और मेरे पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं था, जिससे मैं यह जान सकूं कि मैंने आख़िर लिखा क्या है, तो ज़ाहिर है, काग़ज़ का वह टुकड़ा लेकर मैं अपने माता-पिता के पास गया।

वे डाइनिंग रूम में बैठे थे और फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। जब भी माता-पिता फुसफुसाकर बातें करते हैं, वे नदियों की तरह ज़मीन को दो हिस्सों में बांट देते हैं, एक हिस्सा बड़ों के लिए और दूसरे पार का हिस्सा बच्चों के लिए। उनके सामने खड़ा मैं कविता के आकस्मिक स्पर्श से कांप रहा था, कविता से भरा वह काग़ज़ मैंने उनकी ओर बढ़ा दिया। खोए-खोए से मेरे पिता ने आधे मन से वह काग़ज़ पकड़ा, आधे मन से उसे पढ़ा और आधे मन से ही मुझे वापस करते हुए कहा, ‘कहाँ से नक़ल मारी है बेटा?’ इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस, आवाज़ नीची करके जाने किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर माँ से बातें करने लग गए।

इस तरह मेरी पहली कविता ने जन्म लिया था, और इसी तरह, पहली कविता के साथ ही मुझे ग़ैर-जि़म्मेदार साहित्यिक आलोचना का पहला नमूना भी तोहफ़े में मिला था।

*

कुछ घटनाएं साथ-साथ चलती हैं। वे आपस में जुड़ी न दिखें, लेकिन कब वे असर करती हैं, पता नहीं चलता। ये ऐसी ही घटनाएं हैं। अब मैं आपको चिड़ियों से जुड़ी एक कहानी बताता हूँ। बूदी झील में बहुत बेरहमी से हंसों का शिकार किया जाता था। शिकारी अपनी नाव में झुककर छिप जाते थे, फिर नाव को बहुत तेज़ चलाते थे। हवा के साथ हंसों का रिश्ता अनाड़ियों जैसा होता है। वे पानी को छूते हुए लगभग दौड़ते हैं, ठीक से उड़ते नहीं, उन्हें अपने भारी पंखों को उठाने में बड़ी ताक़त लगती है। और इसीलिए तेज़ दौड़ती नावें उन्हें आसानी से पकड़ लेती हैं। वे पानी पर ही उसे डंडे मारते हैं और नाव में खींच लेते हैं। किसी ने मुझे ऐसा ही हंस दिया, जो अधमरा था। वह इतना सुंदर पक्षी थी कि जीवन में दुबारा वैसा कुछ भी देखने को न मिला। जैसे बर्फ का बर्तन हो, सुराही जैसी गर्दन पर किसी ने तंग काला मोज़ा पहना दिया हो, नारंगी रंग की चोंच और लाल आँखें।

मैंने उसके घाव धोए, उसके गले में डबलरोटी और मछलियों के टुकड़े भर दिए, लेकिन उसने सबकुछ उलट दिया। वह जल्द ही ठीक होने लगा और उसने महसूस किया कि मैं उसका दोस्त हूँ। उसकी देखभाल करते हुए मुझे हमेशा यह लगता कि उसे यक़ीनन अपने घर की याद आ रही होगी। उतने भारी पक्षी को, जिसकी ऊँचाई मेरे जितनी थी, लेकर मैं नदी पर गया। वह किनारे-किनारे ही थोड़ा-सा तैरा, नदी के भीतर नहीं गया। मैं उसे मछली पकड़ना सीखने की याद दिलाने लगा। बार-बार उसका ध्यान तल के कंकड़ों और उन नन्ही मछलियों की ओर ले जाता, जिनकी चंचलता लुभाती है। लेकिन हंस की उदास आँखें दूर, कहीं दूर, खो जाती थीं।

मैं पूरे बीस दिन उसे अपने साथ ढोकर घर से नदी और नदी से घर लाता रहा। एक दोपहर वह बहुत सुंदर दिखने लगा था। उस रोज़ तैरते समय वह मुझसे दूर नहीं जा रहा था, मैं उसे मछली पकड़ना सिखाने की जितनी कोशिश करता, वह उन पर ध्यान ही नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद जब मैंने उसे अपनी बांहों में लिया, वह एकदम शांत हो गया। जब मैंने उसे सीने से लगाया, लगा, जैसे कोई मुलायम-सी फीता धीरे-धीरे खुल रहा हो, एक काली भुजा मेरे चेहरे को सहला रही हो। उसकी लंबी सुराहीदार गर्दन लहराकर गिर-गिर जा रही थी। उसी दिन मुझे पता चला, मरते समय हंस कभी गीत नहीं गाते।

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि मैंने अपनी पहली कविता कब लिखी थी, कविता ने मेरे भीतर ठीक-ठीक कब जन्म लिया था। मैं याद करने की कोशिश करता हूँ। बचपन की बात है। उसी समय मैंने पढ़ना सीखा था। एक रोज़ मेरे भीतर भावनाओं ने उपद्रव किया और मैंने कागज़ पर कुछ शब्द लिख दिए। उनमें से कुछ लय और तुक में थे लेकिन लिखने के बाद वे शब्द भी मुझे अजनबियों जैसे लग रहे थे। मैं अपने जीवन में रोज़मर्रा जिस भाषा का इस्तेमाल करता था, ये शब्द उससे पराई भाषा के लग रहे थे। उस गहरी बेचैनी से, मैं बड़ी मशक़्क़त के बाद बाहर आ पाया। मुझे उसकी आदत नहीं थी। वह एक क़िस्म की व्यथा और उदासी थी। उससे किसी तरह परे होने के बाद मैंने उन पंक्तियों को एक सादे काग़ज़ पर साफ़-सुथरा लिख दिया।

वह कविता मेरी माँ के लिए थी। मेरी सौतेली माँ। हाँ, मैं एक अच्छी सौतेली माँ को जानता हूँ। वह सौतेली थी, लेकिन फ़रिश्तों जैसी थी, उसकी नरम-मुलायम छांव में मेरे बचपन की निगहबानी हुई। मैंने पहली ही कविता लिखी थी और मेरे पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं था, जिससे मैं यह जान सकूं कि मैंने आख़िर लिखा क्या है, तो ज़ाहिर है, काग़ज़ का वह टुकड़ा लेकर मैं अपने माता-पिता के पास गया।

वे डाइनिंग रूम में बैठे थे और फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। जब भी माता-पिता फुसफुसाकर बातें करते हैं, वे नदियों की तरह ज़मीन को दो हिस्सों में बांट देते हैं, एक हिस्सा बड़ों के लिए और दूसरे पार का हिस्सा बच्चों के लिए। उनके सामने खड़ा मैं कविता के आकस्मिक स्पर्श से कांप रहा था, कविता से भरा वह काग़ज़ मैंने उनकी ओर बढ़ा दिया। खोए-खोए से मेरे पिता ने आधे मन से वह काग़ज़ पकड़ा, आधे मन से उसे पढ़ा और आधे मन से ही मुझे वापस करते हुए कहा, ‘कहाँ से नक़ल मारी है बेटा?’ इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस, आवाज़ नीची करके जाने किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर माँ से बातें करने लग गए।

इस तरह मेरी पहली कविता ने जन्म लिया था, और इसी तरह, पहली कविता के साथ ही मुझे ग़ैर-जि़म्मेदार साहित्यिक आलोचना का पहला नमूना भी तोहफ़े में मिला था।

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कुछ घटनाएं साथ-साथ चलती हैं। वे आपस में जुड़ी न दिखें, लेकिन कब वे असर करती हैं, पता नहीं चलता। ये ऐसी ही घटनाएं हैं। अब मैं आपको चिड़ियों से जुड़ी एक कहानी बताता हूँ। बूदी झील में बहुत बेरहमी से हंसों का शिकार किया जाता था। शिकारी अपनी नाव में झुककर छिप जाते थे, फिर नाव को बहुत तेज़ चलाते थे। हवा के साथ हंसों का रिश्ता अनाड़ियों जैसा होता है। वे पानी को छूते हुए लगभग दौड़ते हैं, ठीक से उड़ते नहीं, उन्हें अपने भारी पंखों को उठाने में बड़ी ताक़त लगती है। और इसीलिए तेज़ दौड़ती नावें उन्हें आसानी से पकड़ लेती हैं। वे पानी पर ही उसे डंडे मारते हैं और नाव में खींच लेते हैं। किसी ने मुझे ऐसा ही हंस दिया, जो अधमरा था। वह इतना सुंदर पक्षी थी कि जीवन में दुबारा वैसा कुछ भी देखने को न मिला। जैसे बर्फ का बर्तन हो, सुराही जैसी गर्दन पर किसी ने तंग काला मोज़ा पहना दिया हो, नारंगी रंग की चोंच और लाल आँखें।

मैंने उसके घाव धोए, उसके गले में डबलरोटी और मछलियों के टुकड़े भर दिए, लेकिन उसने सबकुछ उलट दिया। वह जल्द ही ठीक होने लगा और उसने महसूस किया कि मैं उसका दोस्त हूँ। उसकी देखभाल करते हुए मुझे हमेशा यह लगता कि उसे यक़ीनन अपने घर की याद आ रही होगी। उतने भारी पक्षी को, जिसकी ऊँचाई मेरे जितनी थी, लेकर मैं नदी पर गया। वह किनारे-किनारे ही थोड़ा-सा तैरा, नदी के भीतर नहीं गया। मैं उसे मछली पकड़ना सीखने की याद दिलाने लगा। बार-बार उसका ध्यान तल के कंकड़ों और उन नन्ही मछलियों की ओर ले जाता, जिनकी चंचलता लुभाती है। लेकिन हंस की उदास आँखें दूर, कहीं दूर, खो जाती थीं।

मैं पूरे बीस दिन उसे अपने साथ ढोकर घर से नदी और नदी से घर लाता रहा। एक दोपहर वह बहुत सुंदर दिखने लगा था। उस रोज़ तैरते समय वह मुझसे दूर नहीं जा रहा था, मैं उसे मछली पकड़ना सिखाने की जितनी कोशिश करता, वह उन पर ध्यान ही नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद जब मैंने उसे अपनी बांहों में लिया, वह एकदम शांत हो गया। जब मैंने उसे सीने से लगाया, लगा, जैसे कोई मुलायम-सी फीता धीरे-धीरे खुल रहा हो, एक काली भुजा मेरे चेहरे को सहला रही हो। उसकी लंबी सुराहीदार गर्दन लहराकर गिर-गिर जा रही थी। उसी दिन मुझे पता चला, मरते समय हंस कभी गीत नहीं गाते।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

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पाब्‍लो नेरूदा – 1 : मेरा जीवन, मेरे संघर्ष

दुनिया मुझे पाब्‍लो नेरूदा के नाम से जानती है, लेकिन घरवालों ने स्‍पैनिश परंपरा के अनुकूल मेरा लंबा-सा नाम रखा था- नेफ्ताली रिकार्दो रेयेस बासोआल्‍तो। जब मैंने कविताएं लिखनी शुरू कीं, तो मैंने अपना नाम पाब्‍लो नेरूदा रख लिया। सच कहूँ, मुझे ठीक से याद नहीं, मैंने अपना नाम कब बदला, क्‍यों बदला, ठीक-ठीक क्‍यों मैंने यही नाम चुना, कोई और नाम क्‍यों नहीं चुना। मैं तेरह या चौदह साल का था। कविताएं लिखता था। मेरे पिताजी बेहद सख़्त इंसान थे। लेखक बनने का मेरा सपना उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं था। वह मुझे देखकर परेशान हो उठते थे। उन्‍हें लगता था, जब तक मेरे भीतर लेखक बनने का सपना रहेगा, मेरे पास कोई भविष्‍य नहीं होगा। मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो जाएगा। मुझे उनकी बातें समझ नहीं आती थीं। मैं तो एक किशोरवयीन लेखक था। मैं अपना लेखन उनसे कैसे छिपा सकता हूँ- अक्‍सर मैं ये बातें सोचता रहता था।

उन्‍हीं दिनों मैंने चेक कथाकार यान नेरूदा को पढ़ा। मैंने उनकी कविताएं कभी नहीं पढ़ी थीं, लेकिन मेरे पास उनकी कहानियों की एक किताब थी। उसमें प्राग के आसपास के परिवेश और लोगों की कथाएं थीं। शायद मैंने अपना नया नाम वहीं से चुना। इतना समय हो चुका है कि मुझे ठीक से याद ही नहीं है। फिर भी सभी लोग यही मानते हैं कि मैंने यान नेरूदा से अपना चुना। इसी कारण चेक और प्राग के लोग मुझे बहुत अपना मानते हैं।

मैंने हर जगह लिखा है। मैंने जंगलों में लिखा, मैं चारागाहों में लिखा। मैंने सड़क पर लिखा और भेड़ों की ऊन छीलते समय भी लिखा। लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है। जिस तरह सांस लिये बिना मैं जि़ंदा नहीं रह सकता, उसी तरह लिखे बिना भी जीवित रहना मुमकि़न नहीं। मैंने कार में यात्रा करते हुए भी लिखा है। जहाँ संभव हो, मैं वहाँ लिख सकता हूँ। मुझे प्रकृति, जीवन, हलचलों में शरीक रहना अच्‍छा लगता है। चारों ओर बहुत लोग हों, बहुत शोर हो, मैं तब भी लिख लेता हूँ। हाँ, अगर अचानक सन्‍नाटा छा जाए, तो मेरे लिखना रुक जाता है।

शुरुआती दिनों में तो हाथ से ही लिखता था, पर बाद के दिनों में मैंने टाइपराइटर अपना लिया। एक बार एक हादसे में मेरी उंगली टूट गई। उसके कारण मेरा टाइप करना बंद हो गया। फिर भी कविताएं तो लिखनी ही थीं, मैं हाथ से लिखता रहा। जब मेरी उंगली ठीक हो गई, तो मैंने फिर टाइपराइटर पकड़ लिया। पर मैंने पाया, जिन कविताओं को

मैंने हाथ से लिखा था, वे अधिक सुंदर, अधिक नाज़ुक थीं। उनकी फार्म में मैं आसानी से फेरबदल कर सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि टाइपराइटर के प्रयोग ने कविता के साथ मेरी आत्‍मीयता को कुछ कम किया था। हाथ से लिखने पर वह आत्‍मीयता मैंने वापस पा ली।

अब लोग मेरी आर्थिक स्थिति पर व्‍यंग्‍य करते हैं। उन्‍हें लगता है कि मेरा रहन-सहन आलीशान है और मैं पैसों के बीच खेलता हूँ। वे यह क्‍यों भूल जाते हैं कि मेरी पहली किताब जिसकी अब लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं, और जिन कविताओं को लोग कंठस्‍थ रखते हैं, वह छपने के बाद भी मैं टूटी चप्‍प्‍पल, कई बार नंगे पैर ही चलता था। जितना काम और संघर्ष मैंने किया है, उतना बहुत कम लोगों के हिस्‍से में आया, फिर भी सारी निंदाएं मेरे ही हिस्‍से आती हैं, यह अजीब लगता है। मैंने अपना जीवन जनता के कल्‍याण के लिए समर्पित कर दिया है। मेरे पास अपना कहने के लिए सिर्फ़ किताबें हैं। मैं अपना सबकुछ लोगों में बांट दिया। जो लोग मेरी आलोचना करते हैं, वे इसका एक हिस्‍सा भी करके दिखा दें। मैं तो सिर्फ़ इतना कहता हूँ कि एक दिन के लिए अपना जूता तो छोड़कर दिखा दें। नंगे पैर चलकर दिखा दें।

मैंने अपने जीवन का एक हिस्‍सा भारत में भी बिताया है। रेसीडेंस ऑन अर्थ की कविताएं मैंने भारत में ही लिखीं। मुझे वहाँ अच्‍छा लगा, लेकिन वहाँ के जीवन ने मुझे बहुत निराश किया। लोग अपनी चिंताओं को मिटाने भारत जाते हैं, वहाँ का रहस्‍य, धर्म अनुभव करने के लिए। वे शायद दूसरी तरह के लोग हैं। मुझे तो भारत बहुत अलग लगा। एक निहत्‍था देश, अपने आप में असुरक्षित। वहाँ नौजवानों ने अंग्रेज़ी संस्‍कृति अपना ली है। अंग्रेज़ी संस्‍कृति मुझे भी बहुत प्रिय है, लेकिन भारत के लोगों पर मुझे वह बहुत अटपटी लगी, लगभग घिनौनी, क्‍योंकि उस अंग्रेज़ी संस्‍कृति के कारण वे पश्चिम की बौद्धिक ग़ुलामी कर रहे हैं।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

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