नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में ‘सावंत आंटी की लड़कियाँ’ का मंचन 

नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (एनएसडी) ने मेरी कथा-पुस्तक ‘सावंत आंटी की लड़कियाँ’ को एक नाटक में रूपांतरित किया है। आसिफ़ अली द्वारा निर्देशित और एनएसडी के छात्रों द्वारा अभिनीत दो घंटे के इस नाटक का शीर्षक है ‘गगन लाजले’। एक, दो और तीन फ़रवरी 2022 को एनएसडी सभागार में इसका मंचन हुआ।

लिखना भले एक आदमी का काम हो, लेकिन मंच पर उसे साकार करने में कई लोगों का श्रम और योगदान लगता है। कृति का यह साझापन उसमें कई आयाम जोड़ता है। जो मित्र इस नाटक ‘गगन लाजले’ को देख आए, उन्होंने इसकी सराहना की। यह जानकर अच्छा लगा। निर्देशक आसिफ़ अली तथा उनकी पूरी टीम के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ। युवा लेखिका स्वधा त्रिपाठी ने नाटक देखने के बाद फेसबुक पोस्ट लिखकर अपनी प्रतिक्रिया इस तरह ज़ाहिर की। उनकी पोस्ट इस प्रकार हैः 


नाटक ‘गगन लाजले’ की रिपोर्ट

निर्देशक – आसिफ़ अली, लेखक – गीत चतुर्वेदी 

रंगमंच पर कहानी का रूप बिल्कुल अलग होकर सामने आ जाता है। ऐसा लगता है अरे! ये तो अपने आस -पास ही हो रहा है। जब हम कहानी पढ़ रहे होते है ,तब हम उस तरह से उससे नही जुड़ पाते है। जिस तरह से हम दृश्य और श्रव्य दोनों माध्यम से जुड़ पाते है। 

“सावंत आंटी की लड़कियां ” कहानी में एक मध्यम वर्ग की कथा का जिक्र है ,जिसमें लड़कियां अपने लिए निरंतर हक की माँग करती रहती हैं, और जब उन्हें वह नही मिलता है ,तो वो घर छोड़ कर बार- बार भागती रहती है। हमारा समाज और परिवार लड़कियों को ये आज़ादी नही देता की वो अपने मन से एक साथी ढूंढ ले इसी जद्दोजहद में ये कहानी चलती है। किस तरह से समाज द्वारा बनाये गए नियमों और प्रथाओं को तोड़ कर बाहर निकलने की कोशिश करती हुई लड़कियां दिखाई गई है। 

अभिनय के द्वारा कहानी में चार चांद लग जाते हैं ये बात नाटक ”गगन लाजले” को देख कर पता चलता है। 

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्रों की इतनी बेहतरीन प्रस्तुति देख कर काफ़ी ख़ुशी हुई। अक्सर जब हम नाटक देखते हैं तो हमें कोई किरदार या उसकी नाटकीयता शायद कभी- कभी अच्छी नहीं लगती होगी। लेकिन यहां पर एक भी किरदार ऐसा नहीं दिखा मुझें जिसको देख कर ये कहूँ की ये इस किरदार में नही फिट हो रहा है। निर्देशन कमाल का था और सारे पात्रों ने अपना किरदार बखूबी निभाया।