Haruki Murakami

Murakami by Geet Chaturvedi

मुराकामी होने का अर्थ

हारुकि मुराकामी की कीर्ति इतनी है कि बड़े से बड़ा रॉकस्टार भी उनसे ईर्ष्या करे। उनकी किताबों की दुनिया कई बार जितनी जानी-पहचानी लगती है, बाज़ दफ़ा उतनी ही अनजानी भी। किसी लेखक को हम महज़ इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक अनजान दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा, बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने व्यक्तित्व का अजाना चित्र खींच देता है। मुराकामी में ऐसा क्या है, जो उन्हें एक साथ पूरी दुनिया के पाठकों से जोड़ता है, यह बात पता करना दरअसल ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ लगाकर अपने महानगरीय समाज व व्यक्ति की निजी त्रासदियों को देखना है।

मुराकामी साझा वैश्विक संस्कृति और अनुभवों के उपन्यासकार हैं। जापान का महानगरीय समाज न तो अपने गाँवों-सा पूरी तरह जापानी है और न ही लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क की तरह यूरोपीय-अमेरिकी, बल्कि पूर्व और पश्चिम के इस मिश्रण से उसने एक तीसरा ही रंग ले लिया है। मुराकामी, यूरोपीय सांस्कृतिक दबावों से बने इसी विशिष्ट जापानी रंग के उपन्यासकार हैं। कमोबेश यही रंग एशिया व अफ्रीका के लगभग सभी महानगरों का होता जा रहा है। जीवनशैली व प्रतिस्पर्धा के दबाव ने इन सारे मनुष्यों के मनोजगत या ‘माइंडस्केप’ को एक-सा बना दिया है। तेज़ रफ़्तार, बिखरते परिवार, परिभाषाएँ बदलते मानवीय मूल्य और सफलता पा लेने के दबाव के कारण जिस तरह का अवसाद और अकेलापन टोक्यो का युवा महसूस करता है, लगभग वैसी ही अनुभूति बीजिंग, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कराची, इस्ताम्बुल जैसे शहरों का युवा भी करने लगा है। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसे महानगरों में तो यह अनुभूतियाँ पहले से थीं।

मुराकामी पर आरोप लगता है कि वह जापान में रहते हुए अमेरिकी जीवनशैली की किताब लिखते हैं, तो क्या इन सारे महानगरों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी अपने-अपने देशों में बसते हुए भी अमेरिकी जीवनशैली, भागदौड़ व दबावों को जी रहे हैं? इन महानगरों में रहने वाले पाठक भी कई बार इसे महसूस नहीं कर पाते, लेकिन मुराकामी के उपन्यास उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस करा देते हैं। यही उनकी विश्व-दृष्टि और वैश्विक समकालीनता है, जिससे वह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र हैं।

समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक दबावों से पैदा हुआ अवसाद व अकेलापन मुराकामी के उपन्यासों की मुख्य थीम हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति या युवक की कहानी लिखते हैं, जिसका भौगोलिक परिवेश तो जापानी है, लेकिन मानसिक परिवेश वैश्विक है, क्योंकि अवसाद व अकेलापन समकालीन पूंजीवादी विश्व-मानव को मिले सबसे बड़े अभिशाप हैं। ‘काफ्का ऑन द शोर’ में अभिभावकों से परेशान होकर एक नौजवान घर से बाहर निकल जाता है और लाइब्रेरी में रात बिताता है, ‘आफ्टर डार्क’ के नौजवान पूरी रात तफ़रीह करते हैं और एक-दूसरे की निजी समस्याओं को सुनते हैं तो वे उन्हें अपनी ही समस्याएँ लगती हैं। ‘वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकल’ की तरह लकदक चमकते सुपरबाज़ार में अचानक एक बिल्ली प्रगट हो जाती है और वह सुकून के उस स्वप्न की तरह दिखती है जिसे हमने बेहद अकेलेपन में देखा हो। उनकी किताबों में प्रेम व हानिबोध विराट हैं, तो जीवन व प्राप्तिबोध बेहद सूक्ष्म, और दोनों के साहचर्य में एक सोचता हुआ सौंदर्य है।

चाहे कोई भी समाज हो, भौतिक दबाव अधिक हों, तो आध्यात्मिक तलाश बलवती हो जाती है, और मुराकामी इस तलाश का ख़ालिस चित्रण करते हैं। यह करते हुए वह काफ़्का और बोर्हेस की तरह कठिन नहीं होते, न ही सेल्फ हेल्प के लेखकों जैसा सरल व उपदेशात्मक। दरअसल, मुराकामी ऐसे चतुर लेखक हैं, जिन्हें पता है कि कहानी के किन हिस्सों में कठिन होना है और कहाँ सरल बन जाना है। वह दोनों का सही अनुपात में कलात्मक मिश्रण करते हैं। उनके चरित्र अच्छाइयों का नहीं, इंसानी ख़ामियों का उदास उत्सव हैं।

अच्छा साहित्य मनुष्य की स्मृतियों को झिंझोड़ देता है। मुराकामी को पढ़ते हुए हम उदासी की अपनी स्मृतियों में चले जाते हैं। कितना भी इंकार करें, सचाई यह है कि हम अपनी उदासियों से मुहब्बत करते हैं। पराये दुखों को पढ़ने में एक सुविधा यह होती है कि आप उन दुखों को अपना महसूस करते हैं, लेकिन किसी भी समय उन्हें पराया मानकर छोड़ सकते हैं। ‘काफ़्का ऑन द शोर’ का एक संवाद है कि अपने बाहर की भूलभुलैया में तुम जितने क़दम रखोगे, तुम्हारे भीतर की भूलभुलैया भी उतनी ही घनी होती जाएगी। मनुष्य के लिए बाहरी और भीतरी का यह संघर्ष भले पुराना हो, लेकिन आज की दुनिया में यह जितना मुखर है, उतना किसी समय नहीं रहा। मुराकामी की किताबें बाहरी मेज़ पर रखी हुईं आंतरिक त्रासदी की नाज़ुक तश्तरियाँ हैं।

मुराकामी पर बात करते समय मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बीते बरसों में डोरेमॉन और उस जैसे जिन कार्टून सीरियलों ने पूरी दुनिया में स्वीकृति पाई है, वे सभी जापान से ही निकले हैं। उन्होंने मिकी माउस, डोनाल्ड डक, टॉम एंड जैरी जैसे पश्चिमी सीरियलों को लगभग बेदख़ल कर दिया। उनके चित्रण में भी आपको अवसाद, अकेलेपन, सफलता के दबाव से पैदा हुई काल्पनिक तलाश के तत्व प्रमुखता से दिखेंगे।

  • गीत चतुर्वेदी, संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 2016
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हारुकि मुराकामी : कोई लेखक मेरा दोस्त नहीं

न तो मैं कोई बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हूँ और न ही आक्रामक। मैं ठीक उन्हीं लोगों जैसा हूँ, जो मेरी किताबें पढ़ते हैं। मैं एक जैज़ क्लब चलाता था, ग्राहकों के लिए कॉकटेल और सैंडविच बनाता था। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं लेखक बनूँगा। यह सब अपने आप होता चला गया। मुझे लगता है कि यह मुझे ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसीलिए मैं भरसक विनम्र रहने की कोशिश करता हूँ।

तब मेरी उम्र 29 साल थी। मैं अपने व्यवसाय में मस्त रहता था। अचानक एक दिन एक फुटबॉल मैच देखते हुए, जाने कैसे मुझे सूझा कि मुझे एक उपन्यास लिखना चाहिए। मैं आज तक उस प्रेरणा का स्रोत नहीं समझ पाया। उस रोज़ आधी रात जब सब सो गए, मैं अपने किचन टेबल पर बैठा और उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। मैं लिखना तो चाहता था, शुरुआती वाक्य भी लिख दिए, पर मुझे लिखना नहीं आता था। हर वाक्य के बाद मेरी उलझन बढ़ जाती थी। समझ में ही नहीं आता था कि अब क्या लिखूँ।

मेरे पिता जापानी साहित्य के अध्यापक थे, लेकिन मैंने ख़ुद कभी जापानी साहित्य नहीं पढ़ा था। मैं बचपन से ही पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा था। जैज़ संगीत, दोस्तोएव्स्की, काफ्का, रेमंड चैंडलर, ये सब मेरे अपने लोग थे। उनकी दुनिया, मेरी दुनिया था। मैं इनकी किताबें उठाता और पढ़ते-पढ़ते अपने आप सेंट पीटर्सबर्ग या अमेरिका पहुँच जाता। यह उपन्यास की शक्ति होती है, वह आपको कहीं भी पहुँचा सकता है। आज आप आसानी से अमेरिका जा सकते हैं, लेकिन साठ के दशक में बड़ा मुश्किल था। मैं किताबें पढ़कर, संगीत सुनकर, मन ही मन वहाँ पहुँच जाता। किसी स्वप्न की तरह।

तो इस तरह, जब मैं उपन्यास लिखने बैठा, पहले ही पन्ने के बाद अटक गया कि अब क्या लिखा जाए। जापानी साहित्य तो पढ़ा ही नहीं था और लिख जापानी में रहा था। तो मैंने अपने प्रिय पश्चिमी लेखकों को याद किया और उनकी शैली में लिखने लगा। नतीजा यह हुआ कि पहली ही किताब से मेरी अपनी अलग शैली विकसित हो गई।

यह अच्छा ही हुआ कि मुझे जापानी साहित्य का ज्ञान नहीं था, और मेरे प्रिय विदेशी लेखकों को मेरी भाषा के भीतर नकल करना लगभग असंभव काम है। मेरी भाषा और विदेशी प्रभाव दोनों ने मौलिक मिश्रण बना दिया।

मुझे वह किताब पूरा करने में दस महीने का समय लगा। उसका शीर्षक रखा : हवा का गीत सुनो। (अब मुझे वह कमज़ोर किताब लगती है। अंग्रेज़ी में इसका नाम है ‘हियर द विंड सिंग’।) मैंने अपनी पांडुलिपि एक प्रकाशक को भेजी और कुछ ही दिन बाद उसे पहला पुरस्कार मिल गया। मैं हैरान था। मेरी शुरुआत हो गई थी। मैंने अपनी पत्नी से कहा, मैं लेखक बन गया। मुझसे ज़्यादा हैरान वह थी क्योंकि लेखक, होटलवाले के मुकाबले कहीं ज़्यादा ग्लैमरस करियर था।

मैंने छपने से पहले वह उपन्यास उसे पढ़ने के लिए दिया था। उसे पसंद नहीं आया। उसके बाद मैंने उसे तीन-चार बार लिखा। मेरी पत्नी ने मुझे बरसों बाद बताया कि दरअसल, उसने मेरी पांडुलिपि पढ़ी ही नहीं थी। बिना पढ़े ही उसने अपनी नकारात्मक राय दे दी थी, क्योंकि उसे लगता था, मैं लिख नहीं सकता।

जब वह किताब सफल हो गई, उससे इतने पैसे आ गए कि मुझे कोई दूसरा काम करने की ज़रूरत न पड़े, तब से वह मेरी किताबों की पहली पाठिका बन गई। उसके बाद से वह मेरा लिखा हर पेज पढ़ने और उस पर बहस करने को तत्पर रहती है।

मेरे लेखक बनने से पहले, मेरा कोई दोस्त तक लेखक न था। और मेरे लेखक बनने के बाद भी, आज तक, मेरा कोई लेखक दोस्त नहीं। दो-तीन जो हैं, वे भी विदेशों में हैं। अब तक मुझे किसी लेखक को दोस्त बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मैं अकेला रहता हूँ। समूह, स्कूल या साहित्यिक कार्यक्रम मुझे पसंद नहीं।

प्रिंसटन में एक बार एक दावत में मुझे भी बुलाया गया था। सकुचाया हुआ-सा मैं वहाँ गया। वहाँ जॉयस कैरल ओट्स आई थीं, टोनी मोरीसन भी थीं। इतने बड़े लेखकों की उपस्थिति में मैं एकदम घबरा गया। मैं इतना सहमा हुआ था कि उस दावत में खाना भी नहीं खा पाया। पहली बार वहाँ एकाध लेखकों से दोस्ती जैसा रिश्ता बना, लेकिन जापान में तो कोई भी लेखक मेरा दोस्त नहीं। मैं खुद भी लोगों से दूरी बनाए रखना पसंद करता हूँ। हमेशा यही कहता हूँ कि लेखक को अपने अच्छे लिखे पर निर्भर रहना चाहिए, किसी ख़ास समूह में शामिल होने या ख़ास लोगों से दोस्ती कर लेने पर नहीं।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(हारुकि मुराकामी जापान के सबसे चर्चित लेखक हैं। उनके विभिन्न साक्षात्कारों के आधार पर यह छोटा-सा टुकड़ा बनाया गया है।)

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