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एडम ज़गाएव्स्की : युवा कवियो, सब कुछ पढ़ियो

यह कहते मुझे कम से कम, एक ख़तरा तो महसूस हो ही रहा है। पढ़ने के तरीक़ों पर  बात करते समय, या एक अच्छे पाठक की तस्वीर खींचते समय, कहीं मैं अनजाने ही यह अहसास न दे बैठूँ कि मैं ख़ुद एक परफ़ेक्ट पाठक हूँ। इस बात में  कोई सचाई नहीं होगी।

मैं एक बेहद अराजक और अस्त-व्यस्त पाठक हूँ। मेरी पढ़ाई  में इतने विस्मयकारी गड्ढे हैं जितने कि स्विस आल्प्स में होंगे। इसलिए मेरी टिप्पणी को स्वप्न के साम्राज्य से आई एक टिप्पणी मानी जाए— मेरा एक निजी स्वप्न। मेरे इस निबंध को पाठक के रूप में मेरे गुणों का बखान न माना जाए।

एक अराजक पाठक! कुछ समय पहले गर्मी की छुट्टियों पर जाने के बाद मैंने अपना  सूटकेस खोला। सोचा, ज़रा उन किताबों पर नज़र डाली जाए, जो मैं अपने साथ स्विट्ज़रलैंड लेकर गया था। जिनेवा झील के पास छुट्टियाँ मनाने के लिए।

जो किताबें मेरे साथ थीं, उनके नाम इस तरह हैं—  ज्यां-जाक रूसो, बायरन, मदाम दे स्ताइल, जूलियस स्लोवास्की, एडम मिकिएविच, गिबन और नबोकफ़। ये सारे लेखक और इनकी किताबें किसी न किसी रूप में इस झील के  साथ जुड़ी हुई हैं। लेकिन सच यह है कि इनमें से कोई किताब मेरे साथ नहीं गई थी।

मैं  अपने कमरे की फ़र्श पर जिन किताबों को देख रहा था, वे थीं जैकब बर्कहार्ट की “द  ग्रीक्स एंड ग्रीक सिविलाइज़ेशन” (हाँ, अंग्रेज़ी अनुवाद में, वह भी ह्यूस्टन में रद्दी की एक दुकान से ख़रीदी हुई), इमर्सन के निबंधों का एक संग्रह, बॉदलेयर की कविता फ्रेंच में, पोलिश अनुवाद में स्टीफ़न जॉर्ज की कविताएँ, ईसाई रहस्यवाद पर हान्स जोनास की  मशहूर किताब (जर्मन में), ज़िबग्न्यिेव हेर्बेर्त की कविताएँ और ह्यूगो फॉन हाफमान्स्थाल  की संपूर्ण रचनाओं वाली मोटी-सी किताब, जिसमें उनके निबंध भी थे।

इनमें से कुछ किताबें पेरिस की मशहूर लाइब्रेरियों से ली गई थीं। इससे आपको यह अंदाज़ा लग जाएगा कि मैं उस सनकी व्यक्ति की तरह हूँ, जो लाइब्रेरी की किताबों को पढ़ने के लिए अपने निजी स्वामित्व वाली किताबों को छोड़ सकता है। ऐसा लगता है कि मैं जिन किताबों का मालिक ख़ुद नहीं हूँ, वे किताबें मुझे पढ़ने के लिए ज़्यादा आज़ादी देती हैं।  (सिर्फ़ लाइब्रेरी ही एकमात्र वह जगह है, जहाँ समाजवाद सच में सफल रहा है।)

मैं क्यों पढ़ता हूँ?

पर मैं क्यों पढ़ता हूँ? क्या मुझे सच में इस सवाल का जवाब देने की ज़रूरत है? मुझे ऐसा जान पड़ता है कि कवि विभिन्न कारणों से पढ़ते हैं, कुछ कारण तो एकदम सीधे हैं, ठीक दूसरे व्यक्तियों जैसे ही। लेकिन हम कवियों की पढ़ाई दो संकेतों के बीच घूमती रहती है- स्मृति का संकेत और उल्लास का संकेत।

हम स्मृति के लिए पढ़ते हैं  (स्मृति यानी ज्ञान, शिक्षा), क्योंकि हममें यह सतत जिज्ञासा रहती है कि जब हम पैदा भी नहीं हुए थे, तब हमसे पूर्ववर्ती कवियों ने क्या और कैसे लिखा। इसी को हम परंपरा या इतिहास कहते हैं।

हम उल्लास के लिए भी पढ़ते हैं। क्यों? बस ऐसे ही। क्योंकि किताबों में न सिर्फ़ ज्ञान और सुनियोजित सूचनाएँ दर्ज होती हैं, बल्कि एक ऊर्जा भी होती है, जो नृत्य या जादुई शराब में पाई जाती है। कुछ ख़ास तरह की कविता के बारे में तो यह बात पूरी तरह सच है। क्योंकि हम ख़ुद उन अजीब क्षणों का अनुभव कर चुके होते हैं, जब हम एक ऐसी ताक़त द्वारा संचालित होते हैं, जो कभी बेहद अनुशासन के साथ और कभी बेपरवाही के साथ, हमसे काग़ज़ पर कुछ काले धब्बे बनवा देती है, वैसे ही जैसे आग अपने जाने के बाद राख छोड़ जाती है।

और एक बार आपने ऐसे उन्माद व उल्लास के क्षणों में लेखन कर लिया, तो आपके भीतर और ज़्यादा लिखने की तलब जाग जाती है। उस अतिरिक्त लिखाई के लिए आप कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। और उस सिलसिले में पढ़ाई कोई बहुत बड़ा बलिदान नहीं नज़र आती।

अगर किसी स्वीकारोक्ति की ज़रूरत है, तो मैं कह दूँ कि मैं जो भी किताबें पढ़ता हूँ,  उन्हें इन्हीं दोनों श्रेणियों में डाला जा सकता है- मेरे लिए या तो वह स्मृति की किताब है  या फिर उल्लास की किताब।

उल्लास या उन्माद के कारण पढ़ी जाने वाली किताबों को आप देर रात नहीं पढ़ सकते हैं, वे अनिद्रा ले आती हैं। नींद आने से पहले आप इतिहास पढ़ लेते हैं और रिम्बो को दोपहर के लिए बचा ले जाते हैं।

स्मृति और उल्लास के बीच यह रिश्ता बेहद संपन्न है, विरोधाभासी है और दिलचस्प भी है। यह उल्लास या उन्माद या भावुक आनंद की चरम अवस्था, जो भी कह लें, स्मृति से पैदा होती है और आपके भीतर जंगल की आग की तरह फैल जाती है — ललचाई हुई निगाह से आपने एक पुराने सॉनेट को पढ़ा और हो सकता है कि उससे एक नई कविता का जन्म हो जाए। पर स्मृति और उल्लास हमेशा एक साथ नहीं रहते। कई बार उदासीनता का एक समुद्र उनके बीच  दूरी बनाए रखता है।

ऐसे भी विद्वान हैं, जिनकी स्मृति बेहद विशाल है, लेकिन उसके बावजूद वे अत्यंत कम लिखते हैं। कई बार लाइब्रेरी में आपकी नज़र एक ऐसे बूढ़े पर पड़ती है, जो बो टाई लगाए, अपनी बरसों पुरानी उम्र के बोझ तले बैठा पढ़ रहा है। उसे देखकर आपको लगता है, वह बूढ़ा सबकुछ जानता है। और कई बार यह सही भी होता है, मोटे चश्मे वाले ये बुज़ुर्ग पाठक कई बार बेहद जानकार भी होते हैं। लेकिन कोई ज़रूरी नहीं कि वे उतने ही रचनात्मक भी हों। इसी के दूसरे सिरे पर देखिए, ऐसे भी युवा हैं, जो हिप-हॉप  की दीवानगी में डूबे रहते हैं, लेकिन हम उनसे भी किसी बड़ी रचनात्मकता या कलात्मकता की उम्मीद नहीं रख पाते।

स्मृति और उल्लास

स्मृति और उल्लास, एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते। उल्लास को भी थोड़ी स्मृति  की ज़रूरत पड़ती है और स्मृति को अगर भावनात्मकता के कुछ रंगों से रंग दिया जाए, तो  उसका कोई नुक़सान तो नहीं हो जाता। पढ़ने की समस्या हमारे लिए बड़ी समस्या है- हम  यानी कवि, हम यानी वे लोग जो सोचना पसंद करते हैं, हम यानी वे जो मनन करना  चाहते हैं- क्योंकि हमारी बचपन की पढ़ाइयाँ तमाम ग़लतियों से भरी होती है।

आप एक आज़ाद-ख़याल स्कूल में पढ़े होंगे (जबकि मेरी पढ़ाई तो एक कम्युनिस्ट स्कूल में हुई थी), ये स्कूल क्लासिक्स की कम क़द्र करते हैं और उससे भी कम फ़िक्र आधुनिक बड़े लेखकों की करते हैं। हमारे स्कूल पूरे गर्व के साथ एक जैसे महापशु पैदा  कर रहे हैं- महापशु यानी नये समाज के गर्वीले उपभोक्ता।

यह सही है कि इंग्लैंड या फ्रांस या जर्मनी या पोलैंड में उन्नीसवीं सदी के बरसों में किशोरों को जिस तरह प्रताड़ित किया जाता है, हमें वैसी प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ी थी : हमें पूरा का पूरा वर्जिल या ओविड कंठस्थ नहीं करना पड़ा। हमें आत्म-शिक्षित होना पड़ता है। दोनों के बीच उतना ही फ़र्क है, जितना जोसेफ़ ब्रॉडस्की और उस अमेरिकी छात्र के बीच जिसने पीएचडी कर रखी हो।

ब्रॉडस्की ने पंद्रह की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था। उसके बाद भी उनकी आँख के सामने जो आता था, वह उसे पढ़ते रहते थे। जबकि अमेरिकी पीएचडी छात्र बेहद क़रीने से, बेहद सुनियोजित तरीक़े से अपनी पढ़ाई करता है, लेकिन अपने कैम्पस और कम्फर्ट ज़ोन से बाहर कभी पैर भी नहीं निकाल पाता।

हम कवि अपनी पढ़ाई दरअसल,  कैम्पस के बाहर और कैम्पस के बाद वाले जीवन में ही करते हैं। जिन अमेरिकी कवियों को मैं जानता हूँ, वे सुपठित हैं, पढ़ाकू हैं, लेकिन एक फ़र्क़ उनमें भी दिखाई देता है- उनकी अधिकांश पढ़ाई, उनके स्नातक बन जाने के बाद शुरू हुई और अधेड़ बनने से पहले रुक गई। अमेरिका के स्नातक, यूरोपीय स्नातकों के मुक़ाबले कम जानकारी रखते हैं, लेकिन वे डिग्री लेने के बाद के बरसों में आत्म-शिक्षा या स्वाध्याय से इस कमी को पूरा कर देते हैं।

‘‘सिर्फ़’’ कविता ही पढ़ते हैं?

मैंने पिछले बरसों में यह भी देखा है कि कई युवा अमेरिकी कवियों की पढ़ाई का  दायरा सँकरा हो गया है- वे मुख्यत: कविता ही पढ़ते हैं और कभी-कभार थोड़ी बहुत आलोचना पढ़ लेते हैं। यह तो तय बात है कि होमर से लेकर ज़िबग्न्यिेव हेर्बेर्त और ऐनी कार्सन तक की कविताओं को पढ़ने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सिर्फ़ इन्हीं को पढ़ा जाए, तो आप एक विशेष तरह की पढ़ाई तक ही सीमित रहेंगे। यह ऐसा है, जैसे जीव-विज्ञान का एक छात्र आपसे कहे कि मैं तो सिर्फ़ जीव-विज्ञान की पुस्तकें ही पढ़ता हूँ, और कुछ नहीं। या एक युवा खगोलशास्त्री, जो सिर्फ़ खगोल की पुस्तकें पढ़ता हो। या एक एथलीट, जो न्यूयॉर्क टाइम्स का सिर्फ़ खेल वाला पन्ना ही पढ़ता हो।

अगर आप ‘‘सिर्फ़’’ कविता ही पढ़ रहे हों, तो भी कोई बुराई नहीं है- लेकिन यह भी है कि इस पढ़ाई के ऊपर एक ख़ास तरह की अपरिपक्वता की परछाईं हमेशा डोलती रहेगी–  सतहीपन की परछाईं।

अगर आप “सिर्फ़” कविता ही पढ़ते हैं, तो इससे एक बात का अंदाज़ा लगता है कि समकालीन कविता जगत में कुछ तो भी, बेहद रूढ़िवादी चल रहा है, जैसे कि कविता, दर्शन के बुनियादी प्रश्नों से दूर चली गई है, एक इतिहासकार की बेचैनी उसमें से ग़ायब हो गई है, एक पेंटर की व्याकुलता उसमें नहीं है, एक ईमानदार राजनीतिक की आशंकाएँ उसमें नहीं  हैं, जैसे कि वह कविता, संस्कृति के एक साझा गहरे केंद्र से दूर चली गई है।

एक युवा कवि जिस तरह से अपनी पढ़ाई की योजना बनाता है, वह दरअसल समाज में दूसरी कलाओं के बीच कविता की स्थिति को रेखांकित करने के लिए बहुत ज़रूरी है। इससे  पता चलता है कि उस कलात्मक समाज में कविता, केंद्रीय विधा है या नहीं, भले उसे कुछ ही लोग क्यों न पढ़ते हों। क्या वह किसी ऐतिहासिक क्षण के महत्वपूर्ण पहलुओं से संवाद कर पा रही है? क्या वह महज़ एक नीरस किस्म का काम है, जिसे महज़ नाख़ुश रहने वाले कुछ प्रशंसक पढ़ लिया करते हैं?

संभव है कि शायद इसका उल्टा हो। शायद हमारी पढ़ाई के पैटर्न से कविता की केंद्रीय (या  परिधि वाली) भूमिका के बारे में जाने-अनजाने कुछ पता चल जाता हो। क्या हम सिर्फ़, कविता पढ़ने वाले एक विशेषज्ञ नज़रिए से प्रसन्न हैं, जो बहुत सचेत है,  सेक्टेरियन है, साहित्य के साथ ख़ास तरह का रिश्ता रखता है और दिलजलों की  कहानियाँ सुनाने तक ख़ुद को सीमित रखता है? या हम एक ऐसा उदार कवि बनना चाहते हैं, जो सोचने के लिए संघर्ष करता है, गीत गाने के लिए, नए ख़तरे उठाने के लिए-  हमारे समय में मनुष्यता जिस तरह क्षीण हो रही है, उसे पूरे साहस के साथ गले लगाने के लिए लड़ना चाहता हो? और ऐसा करते समय जो दिलजलों को भी नहीं भूलता?

सबकुछ पढ़िए

इसीलिए, मेरे प्रिय युवा कवियो, मैं कहता हूँ कि सबकुछ पढ़िए। प्लेटो से लेकर ओर्तेगा ई गार्सेत तक, होरास और होल्डरलिन, रोनसा और पास्कल, दोस्तोएव्स्की और तोल्स्तोय, ऑस्कर मीवोश और चेस्वाव मीवोश, कीट्स और विटगेन्स्टीन, इमर्सन और एमिली डिकिन्सन, टीएस एलियट और उम्बेर्तो साबा, अपोलिनायर और वर्जीनिया वुल्फ़, आना आख़्मातोवा और दान्ते, पास्तरनाक और मचादो, मोन्टैन और सेंट आगस्टीन, प्रूस्त और हॉफमान्स्थाल, सैफ़ो और शिम्बोर्स्का, टॉमस मान और एस्खुलस, जीवनियों से लेकर निबंध तक पढ़िए, टिप्पणियों से लेकर राजनीतिक विश्लेषण तक पढ़िए। अपने लिए पढ़िए, अपनी प्रेरणाओं के लिए पढ़िए, जो एक मीठी-सी खलबली आपके दिमाग़ में चलती रहती है, उसके लिए पढ़िए।

लेकिन इन सबके साथ ही, अपने ख़िलाफ़ पढ़िए, सवाल पूछने के लिए पढ़िए,  लाचारी के लिए पढ़िए, निराशा के लिए पढ़िए, विद्वत्ता के लिए पढ़िए, चोरान और कार्ल श्मिट जैसे सनकी दार्शनिकों के रूखे और कड़वे वचन पढ़िए, अख़बार पढ़िए।

जो लोग कविता से नफ़रत करते हैं, उसे ख़ारिज करते हैं, उसका उपहास करते हैं या उपेक्षा, उन सबको पढ़िए और जानने की कोशिश कीजिए कि वे ऐसा क्यों करते हैं।

अपने दुश्मनों  को पढ़िए। अपने दोस्तों को पढ़िए। उन लोगों को पढ़िए, जिन्हें पढक़र आपको यह समझ में आए कि कविता में क्या नया हो रहा है। और उन लोगों को भी पढ़िए, जिनका अंधेरा या जिनकी बुराई या जिनका पागलपन या जिनकी महानता अभी तक आपकी समझ में नहीं आ पाई है, क्योंकि सिर्फ़ यही एक तरीक़ा है, जिससे आपका विकास होगा। इसी से आप अपने दायरे से बाहर निकलेंगे। और इसी से आप वह बन पाएँगे, जो कि आप अंदर से हैं।

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अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

एडम ज़गाएव्स्की पोलैंड के महान कवि थे। उनका यह निबंध उनकी पुस्तक ‘अ डिफेंस ऑफ आर्डर’ में शामिल है। यह हिन्दी अनुवाद क्लेयर कैवेना द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है।