हिंदी अनुवाद

Murakami by Geet Chaturvedi

मुराकामी होने का अर्थ

हारुकि मुराकामी की कीर्ति इतनी है कि बड़े से बड़ा रॉकस्टार भी उनसे ईर्ष्या करे। उनकी किताबों की दुनिया कई बार जितनी जानी-पहचानी लगती है, बाज़ दफ़ा उतनी ही अनजानी भी। किसी लेखक को हम महज़ इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक अनजान दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा, बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने व्यक्तित्व का अजाना चित्र खींच देता है। मुराकामी में ऐसा क्या है, जो उन्हें एक साथ पूरी दुनिया के पाठकों से जोड़ता है, यह बात पता करना दरअसल ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ लगाकर अपने महानगरीय समाज व व्यक्ति की निजी त्रासदियों को देखना है।

मुराकामी साझा वैश्विक संस्कृति और अनुभवों के उपन्यासकार हैं। जापान का महानगरीय समाज न तो अपने गाँवों-सा पूरी तरह जापानी है और न ही लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क की तरह यूरोपीय-अमेरिकी, बल्कि पूर्व और पश्चिम के इस मिश्रण से उसने एक तीसरा ही रंग ले लिया है। मुराकामी, यूरोपीय सांस्कृतिक दबावों से बने इसी विशिष्ट जापानी रंग के उपन्यासकार हैं। कमोबेश यही रंग एशिया व अफ्रीका के लगभग सभी महानगरों का होता जा रहा है। जीवनशैली व प्रतिस्पर्धा के दबाव ने इन सारे मनुष्यों के मनोजगत या ‘माइंडस्केप’ को एक-सा बना दिया है। तेज़ रफ़्तार, बिखरते परिवार, परिभाषाएँ बदलते मानवीय मूल्य और सफलता पा लेने के दबाव के कारण जिस तरह का अवसाद और अकेलापन टोक्यो का युवा महसूस करता है, लगभग वैसी ही अनुभूति बीजिंग, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कराची, इस्ताम्बुल जैसे शहरों का युवा भी करने लगा है। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसे महानगरों में तो यह अनुभूतियाँ पहले से थीं।

मुराकामी पर आरोप लगता है कि वह जापान में रहते हुए अमेरिकी जीवनशैली की किताब लिखते हैं, तो क्या इन सारे महानगरों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी अपने-अपने देशों में बसते हुए भी अमेरिकी जीवनशैली, भागदौड़ व दबावों को जी रहे हैं? इन महानगरों में रहने वाले पाठक भी कई बार इसे महसूस नहीं कर पाते, लेकिन मुराकामी के उपन्यास उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस करा देते हैं। यही उनकी विश्व-दृष्टि और वैश्विक समकालीनता है, जिससे वह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र हैं।

समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक दबावों से पैदा हुआ अवसाद व अकेलापन मुराकामी के उपन्यासों की मुख्य थीम हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति या युवक की कहानी लिखते हैं, जिसका भौगोलिक परिवेश तो जापानी है, लेकिन मानसिक परिवेश वैश्विक है, क्योंकि अवसाद व अकेलापन समकालीन पूंजीवादी विश्व-मानव को मिले सबसे बड़े अभिशाप हैं। ‘काफ्का ऑन द शोर’ में अभिभावकों से परेशान होकर एक नौजवान घर से बाहर निकल जाता है और लाइब्रेरी में रात बिताता है, ‘आफ्टर डार्क’ के नौजवान पूरी रात तफ़रीह करते हैं और एक-दूसरे की निजी समस्याओं को सुनते हैं तो वे उन्हें अपनी ही समस्याएँ लगती हैं। ‘वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकल’ की तरह लकदक चमकते सुपरबाज़ार में अचानक एक बिल्ली प्रगट हो जाती है और वह सुकून के उस स्वप्न की तरह दिखती है जिसे हमने बेहद अकेलेपन में देखा हो। उनकी किताबों में प्रेम व हानिबोध विराट हैं, तो जीवन व प्राप्तिबोध बेहद सूक्ष्म, और दोनों के साहचर्य में एक सोचता हुआ सौंदर्य है।

चाहे कोई भी समाज हो, भौतिक दबाव अधिक हों, तो आध्यात्मिक तलाश बलवती हो जाती है, और मुराकामी इस तलाश का ख़ालिस चित्रण करते हैं। यह करते हुए वह काफ़्का और बोर्हेस की तरह कठिन नहीं होते, न ही सेल्फ हेल्प के लेखकों जैसा सरल व उपदेशात्मक। दरअसल, मुराकामी ऐसे चतुर लेखक हैं, जिन्हें पता है कि कहानी के किन हिस्सों में कठिन होना है और कहाँ सरल बन जाना है। वह दोनों का सही अनुपात में कलात्मक मिश्रण करते हैं। उनके चरित्र अच्छाइयों का नहीं, इंसानी ख़ामियों का उदास उत्सव हैं।

अच्छा साहित्य मनुष्य की स्मृतियों को झिंझोड़ देता है। मुराकामी को पढ़ते हुए हम उदासी की अपनी स्मृतियों में चले जाते हैं। कितना भी इंकार करें, सचाई यह है कि हम अपनी उदासियों से मुहब्बत करते हैं। पराये दुखों को पढ़ने में एक सुविधा यह होती है कि आप उन दुखों को अपना महसूस करते हैं, लेकिन किसी भी समय उन्हें पराया मानकर छोड़ सकते हैं। ‘काफ़्का ऑन द शोर’ का एक संवाद है कि अपने बाहर की भूलभुलैया में तुम जितने क़दम रखोगे, तुम्हारे भीतर की भूलभुलैया भी उतनी ही घनी होती जाएगी। मनुष्य के लिए बाहरी और भीतरी का यह संघर्ष भले पुराना हो, लेकिन आज की दुनिया में यह जितना मुखर है, उतना किसी समय नहीं रहा। मुराकामी की किताबें बाहरी मेज़ पर रखी हुईं आंतरिक त्रासदी की नाज़ुक तश्तरियाँ हैं।

मुराकामी पर बात करते समय मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बीते बरसों में डोरेमॉन और उस जैसे जिन कार्टून सीरियलों ने पूरी दुनिया में स्वीकृति पाई है, वे सभी जापान से ही निकले हैं। उन्होंने मिकी माउस, डोनाल्ड डक, टॉम एंड जैरी जैसे पश्चिमी सीरियलों को लगभग बेदख़ल कर दिया। उनके चित्रण में भी आपको अवसाद, अकेलेपन, सफलता के दबाव से पैदा हुई काल्पनिक तलाश के तत्व प्रमुखता से दिखेंगे।

  • गीत चतुर्वेदी, संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 2016

आद्रियाना लिस्बोआ की कविता : आत्मा को ऐसे धोएं

आत्मा को अपने हाथों से धोना चाहिए.
इसलिए नहीं कि वह बहुत नाजुक होती है
और रंग छोड़ती है.
इसके उलट, वह बेहद मजबूत कपड़े से बनी होती है
और उसे साफ करने का एक ही तरीका है कि
उसे हाथों से धोया जाए.

एक घरेलू साबुन लें- अच्छा होगा कि सबसे सस्ता वाला.
ब्लीच, फैब्रिक सॉफ्टनर- ये सब भूल जाइए,
किसी आत्मा को इनकी ज़रूरत नहीं होती.
थोड़ी देर तक उसे भिगोकर रखिए
ताकि जिद्दी दाग हट जाएं,
हट जाएं तेल, कीचड़, चटनी-सॉस के निशान भी.
फिर उसे रगड़िए, निचोड़िए
और सूखने के लिए धूप में टांग दीजिए.
इस्तरी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है.

अगर इस तरह से धोएंगे,
तो आप बरसों बरस पहन सकते हैं अपनी आत्मा.

यह जो आपकी देह है न, यही दुनिया है —
यह एक अड़ियल स्कूल है
और आत्मा
इसका आदर्श यूनिफॉर्म।

*

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

25 अप्रैल 1970 को जन्मी आद्रियाना लिस्बोआ, ब्राजील की सबसे चर्चित लेखिकाओं में से हैं। पुर्तगाली भाषा में उनके कई उपन्यास व एक कविता-संग्रह प्रकाशित हैं।  उनकी कविताएं दुनिया की कई बड़ी पत्रिकाओं में छपकर मक़बूल हुई हैं। आद्रियाना ने अपने कला-जीवन की शुरुआत गायन व संगीत से की, फिर धीरे-धीरे लेखन की ओर आ गईं। यह हिंदी संस्करण एलिसन एंत्रेकिन के अनुवाद पर आधारित है।

The Funeral : a short story in Two Lines

My short fiction “Bade Papa ki Antyeshti” has been published in Anita Gopalan’s fine English translation as “The Funeral” in Two Lines, a prestigious American journal. The translation was called “a masterful translation”. 

I feel proud that Two lines have spotlighted this story to begin their Fall season. The story would sound familiar to Hindi readers, it is a version of ‘Bahattar Gulab’ which was published recently in India Today annual.

Read The Funeral by Geet Chaturvedi, translated by Anita Gopalan here.

Read the beautiful editorial about the short story here.

इल्या कामिन्स्की की कविता

और जब वे दूसरों के घरों पर बम बरसा रहे थे,
हमने विरोध तो किया, लेकिन पर्याप्त नहीं.
हमने उनका विरोध किया, लेकिन पर्याप्त नहीं.
मैं अपने बिस्तर में था,
मेरे बिस्तर के इर्द-गिर्द अमेरिका भहराकर गिर रहा था :
अदृश्य मकान-दर-अदृश्य मकान-दर-अदृश्य मकान.
मैंने घर के बाहर कुर्सी रखी और सूरज को देखता रहा.
तबाही मचानेवाली हुकूमत के छठें महीने
पैसों के देश में स्थित पैसों के शहर में
पैसों की गली में स्थित पैसों के मकान में,
हम (माफ़ कीजिएगा)
युद्ध के दौरान ख़ुशी-ख़ुशी रहते रहे.

  • इल्या कामिन्स्की
    अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(अंग्रेज़ी कवि इल्या कामिन्स्की का जन्म यूक्रेन में हुआ था। वह अब अमेरिका रहते हैं।)

Amos Oz

अमोस ओज़ : बड़ा होकर एक किताब बनूँगा

हमारे पास सिर्फ़ एक ही चीज़ इफ़रात में थी, और वह थी- किताबें। हर जगह किताबें। दीवारों पर। दरीचों पर। गलियारे में। रसोई में। घर में घुसते ही किताबें। हर खिड़की पर रखी हुई किताबें। घर के हर कोने में भरी हुईं हज़ारों किताबें। मेरी सोच है, लोग आएँगे और चले जाएँगे, पैदा होंगे और मर जाएँगे, लेकिन किताबें हमेशा-हमेशा रहेंगी, वे हमेशा के लिए होती हैं। जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक किताब बन जाऊँगा। लेखक नहीं बनूँगा, किताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन किताबों को नहीं मारा जा सकता। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीक़े से किसी किताब को ख़त्म करने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के किसी कोने में ज़िंदा बची हुई हो।

मेरे बचपन में ऐसा कई बार हुआ कि त्योहार के दौरान भी घर में खाने के लिए पैसे न होते। ऐसे में माँ, पिताजी की ओर कातर निगाहों से देखती। पिताजी उसका देखना समझ जाते कि अब क़ुर्बानी देने का समय आ गया है। वह किताबों की आलमारी की तरफ़ बढ़ जाते। पिताजी नैतिक व्यक्ति थे। उन्हें पता था कि किताबों से ज़्यादा अहम रोटी होती है और रोटी से भी ज़्यादा अहम अपने बच्चे की ख़ुशी।

मुझे याद है, जब वह अपने हाथों में अपनी कुछ किताबें दबाकर सेकंड हैंड बुकशॉप की तरफ़ जा रहे थे, उन्हें बेचने के लिए, तब उनकी पीठ कुबड़ों की तरह झुक गई थी। जब अब्राहम अपने बेटे आइज़क की क़ुर्बानी देने के लिए उसे कंधे पर उठा मोरा की पहाड़ियों की तरफ़ जा रहा होगा, तब उसकी पीठ भी इसी तरह झुकी हुई होगी।

मैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा लगा सकता था। किताबों के साथ मेरे पिता का रिश्ता ऐंद्रिक था। उन्हें किताबों को महसूस करना, उन्हें थपथपाना, उन्हें सूँघना पसंद था। किताबों के साथ उन्हें सुख मिलता था। वह ख़ुद को रोक नहीं पाते थे। अपनी ही नहीं, दूसरों की किताबों तक भी बरबस चले जाते, उन्हें एक बार छूकर ज़रूर देखते।

और उस ज़माने में किताबें भी क्या माशाअल्लाह होती थीं। आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा सुंदर। खुरदुरे सुगंधित चमड़े पर सुनहरे अक्षरों से लिखा होता था। उन्हें छूते ही दिल ज़ोर-से धड़कता था, जैसे किसी निजी और वर्जित हिस्से को छुआ जा रहा, जैसे उसे छूते ही वह धीरे-से काँप उठेगा। दूसरी ऐसी भी किताबें थीं, जो पुट्ठों के साथ बँधी होती थीं, उनकी जिल्द लेई से चिपकी होती, कैसी तो कामुक-सी सुगंध होती थी उस लेई की।

हर किताब की अपनी एक निजी और उत्तेजक सुगंध होती है।

कई बार पुट्ठों के ऊपर चढ़ी कपड़े की जिल्द उखड़ जाती थी, जैसे लहराती हुई स्कर्ट। उस समय कपड़े की जिल्द और पुट्ठे के बीच के अंधकार में झाँकने से हम ख़ुद को रोक नहीं पाते थे।

जब मैं छह साल का हुआ, तो पिता ने अपनी आलमारी का एक छोटा-सा हिस्सा मुझे दे दिया और कहा, यहाँ तुम अपनी किताबें रख सकते हो। मुझे याद है, मेरी किताबें जो मेरी पलंग के पास यूं ही पड़ी रहती थीं, उन सबको अपनी गोद में उठाकर मैंने बड़े क़रीने से उस आलमारी में सेट किया था। मैंने उस समय बेहद ख़ुशी महसूस की थी।

जो लोग आलमारी में अपनी किताबें खड़ी करके लगा सकते हैं, वे बड़े हो चुके होते हैं। बच्चे तो अपनी किताबें आड़ी बिछाकर रखते हैं। मैं बड़ा हो गया था। मैं पिता की तरह हो गया था।

ख़ैर, रोटी ख़रीदने के लिए किताब बेचने निकले पिता आमतौर पर एक-दो घंटे में लौट आते थे। लौटने पर उनके पास किताबें न होतीं, बल्कि भूरे लिफ़ाफ़े में ब्रेड, अंडे, चीज़ आदि होते। लेकिन कभी-कभार जब वह लौटते, अपनी क़ुर्बानियों के बावजूद उनके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान होती। ऐसे समय उनके पास उनकी प्यारी किताबें न होतीं और वह खाने का कोई सामान भी ना लाते। वह घर से ले गई अपनी किताबें तो बेच देते थे, लेकिन उसी समय बदले में कुछ दूसरी किताबें ख़रीद लेते थे। उन्हें रद्दी की दुकान में कुछ ऐसी अनमोल किताबें मिल जातीं, जिन्हें पढ़ने का उनका बरसों पुराना सपना होता। वह उस मौक़े को हाथ से जाने न देते और मिले हुए पैसों से खाना ख़रीदने के बजाय वे किताबें ख़रीद लेते।

ऐसे समय मेरी माँ उन्हें माफ़ कर देती थी, मैं भी। क्योंकि मुझे आइसक्रीम और भुट्टों के अलावा कुछ भी खाना अच्छा नहीं लगता था। वे ऑमलेट या दूसरी चीज़ें ले आते, जो मुझे बिल्कुल नहीं भाती थीं। बहुत ईमानदारी से कहूँ, तो कई बार मुझे सुदूर भारत के कुपोषित बच्चों से ईर्ष्या होती थी, क्योंकि उन बच्चों से कोई यह ज़िद नहीं करता था कि अपनी थाली का खाना पूरा करके ही उठना।


अनुवाद – गीत चतुर्वेदी

(अमोस ओज़ इज़राल के महान लेखक थे। उनका उपन्यास ‘माय माइकल’ एक अद्भुत प्रेमकथा है। ऊपर का यह अंश उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक यानी उनकी आत्मकथा ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’ से लिया गया है।)

Jaime Sabines translated by Geet Chaturvedi

ख़ाइमे साबिनेस (Jaime Sabines) की कविताएँ

ख़ाइमे साबिनेस (Jaime Sabines,1926-1999) मेक्सिको के कवि थे। नोबेल पुरस्‍कार विजेता कवि ओक्‍तावियो पास (Octavio Paz) उन्‍हें ‘स्‍पैनिश भाषा के सर्वश्रेष्‍ठ समकालीन कवियों में से एक’ मानते थे। स्‍पैनिश में उनकी कविता की दस किताबें प्रकाशित थीं। उन्‍होंने गद्य कविता में अधिक काम किया, लेकिन यह भी तथ्‍य है कि स्‍पैनिश में नेरूदा के बाद, साबिनेस की प्रेम कविताओं को सबसे अधिक मान मिला। यानी गद्य कविता के बावजूद उनमें प्रेम कविताओं जैसी कोमलता थी। कवि-अनुवादक डब्‍ल्‍यू. एस. मर्विन (W. S. Merwin), साबिनेस के बारे में कहते थे कि उन्‍हें पढ़ना जुनून की प्रामाणिकता को सुनने जैसा है।

उनकी मृत्‍यु के बाद न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने लिखा था, ‘कामनाओं पर लिखी साबिनेस की कविताओं को मेक्सिको की कई पीढ़ियों ने गले लगाया और बरसों तक उन्‍हें प्रेम के भजनों की तरह गाया। मेक्सिको में उनकी कविताओं को पढ़ा जाता है, उन्‍हें कंठस्‍थ किया जाता है, उनसे प्रेम किया जाता है।’

साबिनेस बेहद लोकप्रिय कवि थे, लेकिन उतने ही एकांतवासी भी। उनकी सार्वजनिक उपस्थितियाँ बेहद कम होती थीं। मृत्‍यु से कई बरस पहले उन्‍होंने आखि़री कविता-पाठ किया था, जिसमें उन्‍हें सुनने हज़ारों लोग आए थे। वह कविता पाठ मेक्सिको के नेशनल थिएटर में हुआ था, जिसकी बैठक-क्षमता सिर्फ़ एक हज़ार थी, लेकिन बाहर सड़कों पर दसियों हज़ार लोग आकर बैठ गए थे। उन श्रोताओं के लिए आयोजकों को दूर-दूर तक लाउडस्‍पीकर लगाने पड़े। यही नहीं, लोगों की उनकी कविताएँ शब्‍दश: याद थीं। वह कविता पढ़ते, लोग उनके साथ एक-एक शब्‍द बोलते जाते। कितना रोमांचक दृश्‍य रहा होगा- हज़ारों का समूह एक साथ, कवि की आवाज़ से आवाज़ मिलाकर, एक कविता पढ़ रहा है।

साबिनेस, मेक्सिको के साहित्यिक समूहों से भी दूर रहते थे, इसलिए उनकी कविता को शुरुआती समय में साहित्यिक समूहों ने नज़रअंदाज़ किया, लेकिन 1983 के बाद उनकी कविता लोकप्रिय होती गई। उसी बरस ओक्‍तावियो पास ने कहा, ‘मेरी नज़र में साबिनेस, लातिन अमेरिका के सबसे महत्‍वपूर्ण कवि हैं।’

पिता के दबाव में साबिनेस ने डॉक्‍टरी की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन तीन साल में ही छोड़ दी। एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था, ‘उसके पहले मेरी कविता साधारण-सी थी, दूसरों की नक़ल थी। लेकिन उन तीन बरसों में मैंने जाना कि मैं कविता के बिना जीवित नहीं रह सकता, और मैंने दवाएँ छोड़कर कविता पर ध्‍यान देना शुरू कर दिया।’

72 साल के जीवन के आखि़री दशक में सीढि़यों से गिर जाने के कारण उनके कूल्‍हे की हड्डी  टूट गई, जिसके इलाज में उन्‍हें तीस बार सर्जरी करानी पड़ी। इससे उनका शारीरिक और मा‍नसिक स्‍वास्‍थ्‍य प्रभावित हुआ और वह कविता नहीं कर पाए।

1999 में उनकी मृत्‍यु के बाद मेक्सिको के राष्‍ट्रपति ज़ेदियो ने प्रस्‍ताव दिया कि कवि की राजकीय अंत्‍येष्टि की जाए, लेकिन उनके परिवार ने इससे मना कर दिया। यह कहते हुए कि कवि ने पूरी ज़िंदगी सादगी में बिताई थी, इसलिए मौत की रस्‍में भी सादगी से ही होंगी।

*

चाँद

तुम हर दो घंटे में चाँद को चम्‍मच में भरकर
खा सकते हो या कैप्‍सूल में भरकर।
उससे नींद की गोली जैसा फ़ायदा मिलेगा और
दर्द-निवारक गोली की तरह भी।
और उन लोगों को इससे ख़ास फ़ायदा होगा
जो कुछ ज़्यादा ही फिलॉसफ़ी झाड़ा करते हैं।
अगर अपने बटुए में तुम चाँद का एक टुकड़ा रखोगे
तो वह भालू के बाल या ख़रगोश के पैरों से ज़्यादा चमत्‍कारी होगा।
उससे तुम्‍हें एक प्रेमी खोजने में मदद मिलेगी
या चोरी-छिपे धनवान बन जाने से।
उसके कारण डॉक्‍टर और अस्‍पताल भी तुमसे दूर ही रहेंगे।
जब बच्‍चे सोने से मना करें, तब
तुम उसे टॉफि़यों की तरह दे सकते हो उन्‍हें।
अगर बुज़ुर्गों की आंखों में दो बूंद चाँद डाला जाए
तो वे ज़्यादा आसानी से प्राण छोड़ पाते हैं।

चाँद का एक नया पत्‍ता
अपने तकिये के नीचे रखकर सोओ
और जो चाहे, सो सपना देखो।
चाँद की हवा से भरी हुई बोतल
हमेशा अपने पास रखकर चला करो
इससे तुम पानी में डूबने से बच जाओगे।
क़ैदियों और निराश लोगों को
चाभी की तरह दे दो चाँद।
जिन लोगों को सज़ा-ए-मौत मिली है
और जिन लोगों को सज़ा-ए-ज़िंदगी मिली है
ऐसे लोगों के लिए चाँद से बेहतर कोई टॉनिक नहीं है।
उसे थोड़ा-थोड़ा, लेकिन नियमित लिया करें।


मृत्यु के बारे में

उसे दफ़ना दो।
मिट्टी के नीचे सोये हैं कई ख़ामोश लोग
वे बाक़ायदा उसकी देखभाल करेंगे।
इसे यहाँ मत छोड़ो।
दफ़ना दो।

*

मिथ के बारे में

मेरी माँ ने बताया था कि मैं उसके गर्भ में ही रोया था।
लोगों ने उससे कहा था : तुम्‍हारा बेटा बहुत क़िस्मत वाला होगा।

मेरे जीवन के इन बरसों में
कोई तो है, जो मेरे कानों के पास धीरे-धीरे
बहुत धीरे-धीरे फुसफुसाते हुए कहती है :
जियो, जियो, जियो।

वह मृत्यु है।

*

उम्मीद के बारे में

ख़ुद को उम्मीद से भरा हुआ रखो।
जो दिन आने वाला है
वह तुम्‍हारी आंखों में किसी कली की तरह खिल रहा है
एक नई रोशनी की तरह।
बस इतना है :
जो दिन आने वाला है, वह कभी नहीं आने वाला।

*

अगर मैं अगले ही पल मरने वाला हूँ

अगर मैं अगले ही पल मरने वाला हूँ, तो मैं ज्ञान के ये कुछ शब्‍द लिखूंगा : रोटी का पेड़ और शहद, रूबाब का फल, कोका-कोला, ज़ोनाइट, स्वस्तिक। और उसके बाद मैं रोने लग जाऊंगा।

अगर तुम रोना चाहो, तो ‘माफ़ किया’ शब्द के बाद भी रो सकते हो।

और मेरे साथ ऐसा ही है। मैं अपने नाख़ून त्यागने को तैयार हूँ, ताकि मैं अपनी आंखें निकाल सकूं और कॉफ़ी के एक कप के ऊपर उसे नींबू की तरह निचोड़ सकूं।

(चलो, आँख के छिलके के साथ कॉफ़ी पियें, मेरी प्रिया। )

इससे पहले कि चुप्‍पी की बर्फ़ मेरी ज़ुबान पर जम जाए, इससे पहले कि मेरा गला दो हिस्‍सों में कट जाए और चमड़े के किसी झोले की तरह मेरा दिल उलटकर गिर जाए, मेरी जि़ंदगी, मैं तम्‍हें बताना चाहता हूँ कि कितना शुक्रगुज़ार हूँ मैं अपने इस बड़े कलेजे का, इसी के कारण मैं तुम्‍हारे बग़ीचे में घुसकर सारे गुलाब खा गया और किसी ने मुझे देखा तक नहीं।

मुझे याद है। मैंने अपने दिल को हीरों से भर लिया – हीरे, टूटकर गिरे हुए सितारे हैं जो धरती की धूल में धीरे-धीरे बूढ़े हो गए – जब भी मैं हँसता था, मेरे दिल के हीरों से खनखनाने की आवाज़ आती थी। सिर्फ़ एक ही बात से खीझता हूँ कि थोड़ा पहले पैदा हो सकता था मैं, पर नहीं हो पाया।

प्यार को मेरे हाथ में किसी मरी हुई चिड़िया की तरह मत रखो।

*

मैं ख़ुशियों को इस तरह महसूस करता हूँ

मैं ख़ुशियों को इस तरह महसूस करता हूँ, जैसे तैरते हुए किसी शहर की पीठ पर बारिश अपने पंख फड़फड़ाती है।

धूल नीचे बैठ जाती है। हवा शांत है, उसमें से गुज़रती हैं महक की पत्तियाँ, ठंडक के पक्षी और सपने। अभी-अभी जन्‍मे एक शहर की अगुवानी आसमान करता है।

ट्राम, बस, ट्रक, साइकिल पर और पैदल चलते लोग, हर रंग की गाड़ियां, ठेलेवाले, दुकानदार, भुने हुए केले, दो बच्‍चों के बीच उछलती हुई गेंदें : गली फैलती है, लोगों की आवाज़ें शाम की आखिरी रोशनी से टकरा दोगुनी हो जाती हैं, दिन अब सूख रहा है।

वे उस तरह बाहर निकलते हैं जैसे बरसात के बाद चींटियाँ, आसमान के छोटे-छोटे टुकड़ों को चुनने के लिए, अक्षुण्‍णता के नन्‍हें तिनके को अपने अंधेरे घरों की ओर ले जाते हुए, छतों से लटक रही हैं गूदेदार मछलियाँ, पलंग के नीचे जाला बुन रही हैं मकडि़याँ, घर के पिछवाड़े, कम से कम एक, परिचित भूत भी मौजूद है।

काले बादलों की माँ, तुम्‍हारा शुक्रिया, तुमने इस दुपहरी का चेहरा इतना सफ़ेद कर दिया है और हमारी मदद की है ताकि हम ज़िंदगी से प्‍यार करते रह सकें।  

*
 

कुछ समय बाद

कुछ समय बाद अनजान लोगों को तुम इस तरह सौंपोगे ये पन्‍ने जैसे तुम कटी हुई घास का गट्ठर किसी को देते हो।

अपनी उपलब्धियों पर गर्वित और दुखी तुम लौटोगे और अपने पसंदीदा कोने में ख़ुद को फेंक दोगे।

तुम ख़ुद को कवि कहते हो, क्योंकि तुममें इतनी विनम्रता नहीं है कि तुम चुप रह सको।

अरे ओ चोर, तुम्‍हें शुभकामनाएँ, ऐसा करके तुम अपनी पीड़़ा से कुछ चुरा ही रहे हो – और अपने प्रेम से भी। अपनी परछाईं के जो टुकड़े तुम चुन-चुनकर उठाते हो, देखते हैं, उनसे तुम कैसी तस्‍वीर बना पाते हो।

*

तुममें वह सब है, जो मैं खोजता हूँ

तुममें वह सब है, जो मैं खोजता हूँ, जिसकी प्रतीक्षा करता हूँ, जिससे मैं प्‍यार करता हूँ- तुममें वह है।
मेरे हृदय की मुट्ठी धड़क रही है, पुकार रही है।
तुम्‍हारे लिए कही कहानियों के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ।
मैं तुम्‍हारे पिता और मां और मृत्‍यु को शुक्रिया कहता हूँ जिसने तुम्‍हें नहीं देखा।
तुम्‍हारे लिए चलती हवा का शुक्रिया।
तुम उतनी ही शानदार हो जितना गेहूँ,
अपनी देह के रेखाचित्र की तरह ही नाज़ुक हो तुम।
मैंने कभी किसी छरहरी औरत से प्‍यार नहीं किया
लेकिन तुमने मुझे प्‍यार में डाल ही दिया।
मेरी इच्‍छाओं को तुमने लंगर की तरह टिका दिया।
मेरी आँखों को दो म‍छलियों की तरह पकड़ लिया।
और इसी कारण मैं खड़ा हूँ तुम्‍हारे दरवाज़े पर, प्रतीक्षारत।

*

इस पर अच्‍छे से ग़ौर करना

वे कहते हैं कि वज़न घटाने के लिए मुझे कसरत करनी चाहिए
कि पचास की उम्र में चर्बी और सिगरेट ख़तरनाक होते हैं
कि अपनी देह को सुडौल बनाए रखना बहुत ज़रूरी है
और समय के ख़िलाफ़ एक जंग लड़ना, उम्र के ख़िलाफ़ भी।

अच्‍छी नीयत वाले विशेषज्ञ और दोस्‍ताना डॉक्‍टर
आहार की सूची और पूरी एक दिनचर्या बना कर देते हैं
ताकि ज़िंदगी को कुछ साल और लंबा किया जा सके।

इन अच्‍छी नीयतों के प्रति मैं कृतज्ञ हूँ, लेकिन मुझे हँसी आ जाती है
कि उनके सुझाव कितने खोखले हैं, कितना तुच्‍छ है उनका यह जोश

(मृत्‍यु को भी ऐसी चीज़ों पर हँसी आती है)

मैं सिर्फ़ एक ही सुझाव पर अमल करूंगा और वो यह कि
अपने बिस्‍तर में एक युवती को पा सकूं
क्‍योंकि इस उम्र में
यौवन ही वह एकमात्र चीज़ है जो ऐसे रोगों को ठीक कर सके।

*

पैदल

ऐसा कहा जाता है, ऐसी अफ़वाह है। दावतों में, कलादीर्घाओं में, कभी कोई एक या बहुत सारे लोग इस पर स्‍वीकृति की मुहर लगाते हैं, कि ख़ाइमे साबिनेस एक महान कवि है। या कम से कम एक अच्‍छा कवि है। या एक ठीक-ठाक सा कवि है। या बहुत सरल, कि वह एक कवि है।

ख़ाइमे ये सारी बातें सुनता है और ख़ुश होता है : अरे वाह! क्‍या बात है! मैं एक कवि हूँ। मैं एक महत्‍वपूर्ण कवि हूँ। मैं एक महान कवि हूँ। इन सारी बातों को मान वह घर से बाहर जाता है, या बाहर से घर लौटता है इन सारी बातों को मान। लेकिन तब कोई इस पर तवज्‍जो नहीं देता कि वह कवि है। जब वह गलियों में चलता है, तो कोई नहीं देता। और घर में एकाध ही लोग ही उसके कवि होने पर ध्यान देते हैं। कवियों के माथे पर कोई सितारा क्‍यों नहीं लगा होता? या उनकी चमक दिखने लायक़ क्‍यों नहीं होती? या उनके कानों से रोशनी की किरणें क्‍यों नहीं निकलतीं?

ख़ाइमे कहता है, हे ईश्‍वर! मुझे एक पिता भी होना पड़ता है, एक पति भी, दूसरों की तरह कारख़ाने में काम करना पड़ता है, दूसरों की तरह ही मैं घर से बाहर फिरता हूँ पैदल।

कहता है ख़ाइमे, हाँ, बिल्‍कुल यही है। इतना ही है। मैं कवि नहीं हूँ, मैं पैदल हूँ।

और इस बार वह अपने बिस्‍तर में जा घुसता है, ख़ुश और शांतचित्‍त।

*

टैगोर को पढ़ते हुए

टैगोर को पढ़ते हुए मैंने यह सोचा था : दिया, रास्‍ता, झरने के नीचे रखा घड़ा, नंगे पैर- ये सब एक खोई हुई दुनिया है। अब तो यहाँ बिजली के बल्‍ब हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं, पानी के नलके हैं, जेट हवाई जहाज़ हैं। इनमें से कोई कहानियाँ नहीं सुनाता। टीवी और फिल्‍मों ने दादी-नानी की जगह ले ली है। और सारी तकनीक चमत्‍कार तक इस क़दर पहुंचती है कि बस, साबुन और टूथपेस्‍ट के बारे में बता पाती है।

मुझे नहीं पता कि मैं क्‍यों चलता हूँ, लेकिन इस समय मुझे टैगोर की कोमलता की तरफ़ आ जाना चाहिए, पूरब की पूरी कविता की तरफ़ जो कंधे पर मटका लेकर चल रही लड़की को हमारे दफ़्तर की लायक़ लेकिन ग़रीब टाइपिस्‍ट में बदल देती है। आख़िरकार, हमारे बादल एक ही हैं, हमारे सितारे एक ही और अगर ग़ौर से देखा जाए, तो हमारे समंदर भी एक ही हैं।

मेरे दफ़्तर की यह लड़की भी प्‍यार को पसंद करती है। और काग़ज़ात की अराजकता जो दिनों को महज़ मैला करती है, उनके बीच सफ़ेद सपनों वाले कुछ ऐसे भी काग़ज़ हैं, जिनकी वह रखवाली करती है, करुणा की कतरनें भी हैं, जिनसे वह अकेलेपन को चुनौती देती है। किसी दिन मैं, हमारे जीवन की इस बेतहाशा ग़रीबी के गीत गाना चाहता हूँ, बेहद साधारण चीज़ों की स्‍मृति का गीत, उस आरामदेह यात्रा का गीत जो हम आने वाले कल की दिशा में की थी, बिना बीते हुए कल को पर्याप्‍त प्रेम किए।

प्रेमी

प्रेमी ख़ामोश हो गए हैं।
प्रेम सबसे सुंदर, सबसे बारीक मौन है
जो सबसे ज़्यादा कांपता है
और जिसे सहना सबसे ज़्यादा मुश्किल।
प्रेमी कुछ खोज रहे हैं।
प्रेमी वे हैं जो त्‍याग करते हैं
जो बदल जाते हैं, जो भूल जाते हैं।
उनका दिल उन्‍हें बताता है कि वे कभी नहीं खोज पाएँगे।
वे खोज नहीं रहे, फिर भी उन्‍हें तलाश है।

दीवानों की तरह गलियों में भटकते हैं प्रेमी
क्‍योंकि वे अकेले हैं, अकेले।
हर एक पल के प्रति ख़ुद को समर्पित करते,
रोते हैं क्‍योंकि वे अपना प्‍यार बचा नहीं पाते।
वे प्रेम की चिंता करते हैं।
वे बस आज में जीते हैं, यही अच्‍छा करते हैं।
बस इतना ही आता है उन्‍हें।
वे कहीं जा रहे होते हैं,
हमेशा कहीं न कहीं जा रहे होते हैं।
वे उम्‍मीद करते हैं,
किसी एक ख़ास चीज़ की नहीं,
बस, ऐसे ही उम्‍मीद करते हैं।
उन्‍हें पता है कि जो कुछ भी वे खोज रहे, उसे नहीं पा सकेंगे।
प्रेम एक अनवरत स्‍थगन है।
अगली बार, अगली बार। ना, बस अगली सीढ़ी पर मिल जाएगा प्रेम।
प्रेमियों की प्‍यास कभी बुझाई नहीं जा सकती।
इस पर भी सौभाग्‍य की बात कि उन्‍हें हमेशा अकेले रहना पड़ता है।

प्रेमी किसी कहानी में आए सांपों की तरह हैं।
उनके हाथों की जगह सांप उगे होते हैं।
उनकी गरदन में जो नस होती है,
वह भी सांप की तरह ही फूलती है
और एक दिन उनकी गला घोंट देती है
प्रेमी सो नहीं पाते।
क्‍योंकि अगर वे सोये, तो कीड़े उन्‍हें खा जाएँगे।

वे अंधेरे में आंखें खोलते हैं
और उनमें आतंक बस जाता है।

पागल होते हैं प्रेमी, सिर्फ़ पागल
उन्‍हें ईश्‍वर ने छोड़ दिया है और शैतान ने भी।

कांपते हुए अपनी गुफ़ाओं से
बाहर निकलते हैं प्रेमी, भूख से हारे हुए
और पुराने भूतों का शिकार करते हैं।
वे उन लोगों पर हंसते हैं
जिन्‍हें सबकुछ पता होता है।
और उन पर भी हंसते हैं जो ताउम्र सच्‍चा प्‍यार करते हैं।  
और उन पर भी, जो मानते हैं कि
प्रेम एक ऐसा दिया है, जिसकी लौ कभी बुझाई नहीं जा सकती।

प्रेमी पानी भरने का खेल खेलते हैं
धुएँ से छल्‍ले बनाने का खेल।
एक ही जगह रुके रहने का खेल।
कहीं नहीं जाने का खेल।
वे खेलते हैं प्‍यार का लंबा और दुख-भरा खेल।
वे कभी हार नहीं मानते।
किसी भी क़िस्‍म की सुलह उन्‍हें शर्मिंदा कर देती है।

एक पसली से दूसरी पसली तक ख़ाली होते हैं वे
एक ख़ाली मौत उबलती रहती है उनकी आंखों के पीछे
वे भटकते हुए रोते हैं जब तक कि सुबह न हो जाए।
ट्रेनें उन्‍हें अलविदा कह देती हैं
मुर्ग़े दुख से भरकर जागते हैं।

कभी-कभी एक नवजात भूमि की ख़ुशबू उन तक पहुंचती है
एक औरत की ख़ुशबू जो अपनी जांघों के बीच हाथ दबाए सोई है शांति से
शांत पानियों की ख़ुशबू, और रसोई की भी।

और तब प्रेमी अपने होंठों के बीच
वह गीत गाना शुरू करते हैं
जो उन्‍होंने कभी सीखा ही नहीं था।
और उसके बाद रोते जाते हैं, रोते ही जाते हैं
इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी के लिए।

*

सारे अनुवाद और टिप्पणी : गीत चतुर्वेदी

Geet Chaturvedi Thumbnail Adam Zagajewski

एडम ज़गाएव्स्की : युवा कवियो, सब कुछ पढ़ियो

यह कहते मुझे कम से कम, एक ख़तरा तो महसूस हो ही रहा है। पढ़ने के तरीक़ों पर  बात करते समय, या एक अच्छे पाठक की तस्वीर खींचते समय, कहीं मैं अनजाने ही यह अहसास न दे बैठूँ कि मैं ख़ुद एक परफ़ेक्ट पाठक हूँ। इस बात में  कोई सचाई नहीं होगी।

मैं एक बेहद अराजक और अस्त-व्यस्त पाठक हूँ। मेरी पढ़ाई  में इतने विस्मयकारी गड्ढे हैं जितने कि स्विस आल्प्स में होंगे। इसलिए मेरी टिप्पणी को स्वप्न के साम्राज्य से आई एक टिप्पणी मानी जाए— मेरा एक निजी स्वप्न। मेरे इस निबंध को पाठक के रूप में मेरे गुणों का बखान न माना जाए।

एक अराजक पाठक! कुछ समय पहले गर्मी की छुट्टियों पर जाने के बाद मैंने अपना  सूटकेस खोला। सोचा, ज़रा उन किताबों पर नज़र डाली जाए, जो मैं अपने साथ स्विट्ज़रलैंड लेकर गया था। जिनेवा झील के पास छुट्टियाँ मनाने के लिए।

जो किताबें मेरे साथ थीं, उनके नाम इस तरह हैं—  ज्यां-जाक रूसो, बायरन, मदाम दे स्ताइल, जूलियस स्लोवास्की, एडम मिकिएविच, गिबन और नबोकफ़। ये सारे लेखक और इनकी किताबें किसी न किसी रूप में इस झील के  साथ जुड़ी हुई हैं। लेकिन सच यह है कि इनमें से कोई किताब मेरे साथ नहीं गई थी।

मैं  अपने कमरे की फ़र्श पर जिन किताबों को देख रहा था, वे थीं जैकब बर्कहार्ट की “द  ग्रीक्स एंड ग्रीक सिविलाइज़ेशन” (हाँ, अंग्रेज़ी अनुवाद में, वह भी ह्यूस्टन में रद्दी की एक दुकान से ख़रीदी हुई), इमर्सन के निबंधों का एक संग्रह, बॉदलेयर की कविता फ्रेंच में, पोलिश अनुवाद में स्टीफ़न जॉर्ज की कविताएँ, ईसाई रहस्यवाद पर हान्स जोनास की  मशहूर किताब (जर्मन में), ज़िबग्न्यिेव हेर्बेर्त की कविताएँ और ह्यूगो फॉन हाफमान्स्थाल  की संपूर्ण रचनाओं वाली मोटी-सी किताब, जिसमें उनके निबंध भी थे।

इनमें से कुछ किताबें पेरिस की मशहूर लाइब्रेरियों से ली गई थीं। इससे आपको यह अंदाज़ा लग जाएगा कि मैं उस सनकी व्यक्ति की तरह हूँ, जो लाइब्रेरी की किताबों को पढ़ने के लिए अपने निजी स्वामित्व वाली किताबों को छोड़ सकता है। ऐसा लगता है कि मैं जिन किताबों का मालिक ख़ुद नहीं हूँ, वे किताबें मुझे पढ़ने के लिए ज़्यादा आज़ादी देती हैं।  (सिर्फ़ लाइब्रेरी ही एकमात्र वह जगह है, जहाँ समाजवाद सच में सफल रहा है।)

मैं क्यों पढ़ता हूँ?

पर मैं क्यों पढ़ता हूँ? क्या मुझे सच में इस सवाल का जवाब देने की ज़रूरत है? मुझे ऐसा जान पड़ता है कि कवि विभिन्न कारणों से पढ़ते हैं, कुछ कारण तो एकदम सीधे हैं, ठीक दूसरे व्यक्तियों जैसे ही। लेकिन हम कवियों की पढ़ाई दो संकेतों के बीच घूमती रहती है- स्मृति का संकेत और उल्लास का संकेत।

हम स्मृति के लिए पढ़ते हैं  (स्मृति यानी ज्ञान, शिक्षा), क्योंकि हममें यह सतत जिज्ञासा रहती है कि जब हम पैदा भी नहीं हुए थे, तब हमसे पूर्ववर्ती कवियों ने क्या और कैसे लिखा। इसी को हम परंपरा या इतिहास कहते हैं।

हम उल्लास के लिए भी पढ़ते हैं। क्यों? बस ऐसे ही। क्योंकि किताबों में न सिर्फ़ ज्ञान और सुनियोजित सूचनाएँ दर्ज होती हैं, बल्कि एक ऊर्जा भी होती है, जो नृत्य या जादुई शराब में पाई जाती है। कुछ ख़ास तरह की कविता के बारे में तो यह बात पूरी तरह सच है। क्योंकि हम ख़ुद उन अजीब क्षणों का अनुभव कर चुके होते हैं, जब हम एक ऐसी ताक़त द्वारा संचालित होते हैं, जो कभी बेहद अनुशासन के साथ और कभी बेपरवाही के साथ, हमसे काग़ज़ पर कुछ काले धब्बे बनवा देती है, वैसे ही जैसे आग अपने जाने के बाद राख छोड़ जाती है।

और एक बार आपने ऐसे उन्माद व उल्लास के क्षणों में लेखन कर लिया, तो आपके भीतर और ज़्यादा लिखने की तलब जाग जाती है। उस अतिरिक्त लिखाई के लिए आप कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। और उस सिलसिले में पढ़ाई कोई बहुत बड़ा बलिदान नहीं नज़र आती।

अगर किसी स्वीकारोक्ति की ज़रूरत है, तो मैं कह दूँ कि मैं जो भी किताबें पढ़ता हूँ,  उन्हें इन्हीं दोनों श्रेणियों में डाला जा सकता है- मेरे लिए या तो वह स्मृति की किताब है  या फिर उल्लास की किताब।

उल्लास या उन्माद के कारण पढ़ी जाने वाली किताबों को आप देर रात नहीं पढ़ सकते हैं, वे अनिद्रा ले आती हैं। नींद आने से पहले आप इतिहास पढ़ लेते हैं और रिम्बो को दोपहर के लिए बचा ले जाते हैं।

स्मृति और उल्लास के बीच यह रिश्ता बेहद संपन्न है, विरोधाभासी है और दिलचस्प भी है। यह उल्लास या उन्माद या भावुक आनंद की चरम अवस्था, जो भी कह लें, स्मृति से पैदा होती है और आपके भीतर जंगल की आग की तरह फैल जाती है — ललचाई हुई निगाह से आपने एक पुराने सॉनेट को पढ़ा और हो सकता है कि उससे एक नई कविता का जन्म हो जाए। पर स्मृति और उल्लास हमेशा एक साथ नहीं रहते। कई बार उदासीनता का एक समुद्र उनके बीच  दूरी बनाए रखता है।

ऐसे भी विद्वान हैं, जिनकी स्मृति बेहद विशाल है, लेकिन उसके बावजूद वे अत्यंत कम लिखते हैं। कई बार लाइब्रेरी में आपकी नज़र एक ऐसे बूढ़े पर पड़ती है, जो बो टाई लगाए, अपनी बरसों पुरानी उम्र के बोझ तले बैठा पढ़ रहा है। उसे देखकर आपको लगता है, वह बूढ़ा सबकुछ जानता है। और कई बार यह सही भी होता है, मोटे चश्मे वाले ये बुज़ुर्ग पाठक कई बार बेहद जानकार भी होते हैं। लेकिन कोई ज़रूरी नहीं कि वे उतने ही रचनात्मक भी हों। इसी के दूसरे सिरे पर देखिए, ऐसे भी युवा हैं, जो हिप-हॉप  की दीवानगी में डूबे रहते हैं, लेकिन हम उनसे भी किसी बड़ी रचनात्मकता या कलात्मकता की उम्मीद नहीं रख पाते।

स्मृति और उल्लास

स्मृति और उल्लास, एक-दूसरे के बिना रह नहीं सकते। उल्लास को भी थोड़ी स्मृति  की ज़रूरत पड़ती है और स्मृति को अगर भावनात्मकता के कुछ रंगों से रंग दिया जाए, तो  उसका कोई नुक़सान तो नहीं हो जाता। पढ़ने की समस्या हमारे लिए बड़ी समस्या है- हम  यानी कवि, हम यानी वे लोग जो सोचना पसंद करते हैं, हम यानी वे जो मनन करना  चाहते हैं- क्योंकि हमारी बचपन की पढ़ाइयाँ तमाम ग़लतियों से भरी होती है।

आप एक आज़ाद-ख़याल स्कूल में पढ़े होंगे (जबकि मेरी पढ़ाई तो एक कम्युनिस्ट स्कूल में हुई थी), ये स्कूल क्लासिक्स की कम क़द्र करते हैं और उससे भी कम फ़िक्र आधुनिक बड़े लेखकों की करते हैं। हमारे स्कूल पूरे गर्व के साथ एक जैसे महापशु पैदा  कर रहे हैं- महापशु यानी नये समाज के गर्वीले उपभोक्ता।

यह सही है कि इंग्लैंड या फ्रांस या जर्मनी या पोलैंड में उन्नीसवीं सदी के बरसों में किशोरों को जिस तरह प्रताड़ित किया जाता है, हमें वैसी प्रताड़ना नहीं झेलनी पड़ी थी : हमें पूरा का पूरा वर्जिल या ओविड कंठस्थ नहीं करना पड़ा। हमें आत्म-शिक्षित होना पड़ता है। दोनों के बीच उतना ही फ़र्क है, जितना जोसेफ़ ब्रॉडस्की और उस अमेरिकी छात्र के बीच जिसने पीएचडी कर रखी हो।

ब्रॉडस्की ने पंद्रह की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था। उसके बाद भी उनकी आँख के सामने जो आता था, वह उसे पढ़ते रहते थे। जबकि अमेरिकी पीएचडी छात्र बेहद क़रीने से, बेहद सुनियोजित तरीक़े से अपनी पढ़ाई करता है, लेकिन अपने कैम्पस और कम्फर्ट ज़ोन से बाहर कभी पैर भी नहीं निकाल पाता।

हम कवि अपनी पढ़ाई दरअसल,  कैम्पस के बाहर और कैम्पस के बाद वाले जीवन में ही करते हैं। जिन अमेरिकी कवियों को मैं जानता हूँ, वे सुपठित हैं, पढ़ाकू हैं, लेकिन एक फ़र्क़ उनमें भी दिखाई देता है- उनकी अधिकांश पढ़ाई, उनके स्नातक बन जाने के बाद शुरू हुई और अधेड़ बनने से पहले रुक गई। अमेरिका के स्नातक, यूरोपीय स्नातकों के मुक़ाबले कम जानकारी रखते हैं, लेकिन वे डिग्री लेने के बाद के बरसों में आत्म-शिक्षा या स्वाध्याय से इस कमी को पूरा कर देते हैं।

‘‘सिर्फ़’’ कविता ही पढ़ते हैं?

मैंने पिछले बरसों में यह भी देखा है कि कई युवा अमेरिकी कवियों की पढ़ाई का  दायरा सँकरा हो गया है- वे मुख्यत: कविता ही पढ़ते हैं और कभी-कभार थोड़ी बहुत आलोचना पढ़ लेते हैं। यह तो तय बात है कि होमर से लेकर ज़िबग्न्यिेव हेर्बेर्त और ऐनी कार्सन तक की कविताओं को पढ़ने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन सिर्फ़ इन्हीं को पढ़ा जाए, तो आप एक विशेष तरह की पढ़ाई तक ही सीमित रहेंगे। यह ऐसा है, जैसे जीव-विज्ञान का एक छात्र आपसे कहे कि मैं तो सिर्फ़ जीव-विज्ञान की पुस्तकें ही पढ़ता हूँ, और कुछ नहीं। या एक युवा खगोलशास्त्री, जो सिर्फ़ खगोल की पुस्तकें पढ़ता हो। या एक एथलीट, जो न्यूयॉर्क टाइम्स का सिर्फ़ खेल वाला पन्ना ही पढ़ता हो।

अगर आप ‘‘सिर्फ़’’ कविता ही पढ़ रहे हों, तो भी कोई बुराई नहीं है- लेकिन यह भी है कि इस पढ़ाई के ऊपर एक ख़ास तरह की अपरिपक्वता की परछाईं हमेशा डोलती रहेगी–  सतहीपन की परछाईं।

अगर आप “सिर्फ़” कविता ही पढ़ते हैं, तो इससे एक बात का अंदाज़ा लगता है कि समकालीन कविता जगत में कुछ तो भी, बेहद रूढ़िवादी चल रहा है, जैसे कि कविता, दर्शन के बुनियादी प्रश्नों से दूर चली गई है, एक इतिहासकार की बेचैनी उसमें से ग़ायब हो गई है, एक पेंटर की व्याकुलता उसमें नहीं है, एक ईमानदार राजनीतिक की आशंकाएँ उसमें नहीं  हैं, जैसे कि वह कविता, संस्कृति के एक साझा गहरे केंद्र से दूर चली गई है।

एक युवा कवि जिस तरह से अपनी पढ़ाई की योजना बनाता है, वह दरअसल समाज में दूसरी कलाओं के बीच कविता की स्थिति को रेखांकित करने के लिए बहुत ज़रूरी है। इससे  पता चलता है कि उस कलात्मक समाज में कविता, केंद्रीय विधा है या नहीं, भले उसे कुछ ही लोग क्यों न पढ़ते हों। क्या वह किसी ऐतिहासिक क्षण के महत्वपूर्ण पहलुओं से संवाद कर पा रही है? क्या वह महज़ एक नीरस किस्म का काम है, जिसे महज़ नाख़ुश रहने वाले कुछ प्रशंसक पढ़ लिया करते हैं?

संभव है कि शायद इसका उल्टा हो। शायद हमारी पढ़ाई के पैटर्न से कविता की केंद्रीय (या  परिधि वाली) भूमिका के बारे में जाने-अनजाने कुछ पता चल जाता हो। क्या हम सिर्फ़, कविता पढ़ने वाले एक विशेषज्ञ नज़रिए से प्रसन्न हैं, जो बहुत सचेत है,  सेक्टेरियन है, साहित्य के साथ ख़ास तरह का रिश्ता रखता है और दिलजलों की  कहानियाँ सुनाने तक ख़ुद को सीमित रखता है? या हम एक ऐसा उदार कवि बनना चाहते हैं, जो सोचने के लिए संघर्ष करता है, गीत गाने के लिए, नए ख़तरे उठाने के लिए-  हमारे समय में मनुष्यता जिस तरह क्षीण हो रही है, उसे पूरे साहस के साथ गले लगाने के लिए लड़ना चाहता हो? और ऐसा करते समय जो दिलजलों को भी नहीं भूलता?

सबकुछ पढ़िए

इसीलिए, मेरे प्रिय युवा कवियो, मैं कहता हूँ कि सबकुछ पढ़िए। प्लेटो से लेकर ओर्तेगा ई गार्सेत तक, होरास और होल्डरलिन, रोनसा और पास्कल, दोस्तोएव्स्की और तोल्स्तोय, ऑस्कर मीवोश और चेस्वाव मीवोश, कीट्स और विटगेन्स्टीन, इमर्सन और एमिली डिकिन्सन, टीएस एलियट और उम्बेर्तो साबा, अपोलिनायर और वर्जीनिया वुल्फ़, आना आख़्मातोवा और दान्ते, पास्तरनाक और मचादो, मोन्टैन और सेंट आगस्टीन, प्रूस्त और हॉफमान्स्थाल, सैफ़ो और शिम्बोर्स्का, टॉमस मान और एस्खुलस, जीवनियों से लेकर निबंध तक पढ़िए, टिप्पणियों से लेकर राजनीतिक विश्लेषण तक पढ़िए। अपने लिए पढ़िए, अपनी प्रेरणाओं के लिए पढ़िए, जो एक मीठी-सी खलबली आपके दिमाग़ में चलती रहती है, उसके लिए पढ़िए।

लेकिन इन सबके साथ ही, अपने ख़िलाफ़ पढ़िए, सवाल पूछने के लिए पढ़िए,  लाचारी के लिए पढ़िए, निराशा के लिए पढ़िए, विद्वत्ता के लिए पढ़िए, चोरान और कार्ल श्मिट जैसे सनकी दार्शनिकों के रूखे और कड़वे वचन पढ़िए, अख़बार पढ़िए।

जो लोग कविता से नफ़रत करते हैं, उसे ख़ारिज करते हैं, उसका उपहास करते हैं या उपेक्षा, उन सबको पढ़िए और जानने की कोशिश कीजिए कि वे ऐसा क्यों करते हैं।

अपने दुश्मनों  को पढ़िए। अपने दोस्तों को पढ़िए। उन लोगों को पढ़िए, जिन्हें पढक़र आपको यह समझ में आए कि कविता में क्या नया हो रहा है। और उन लोगों को भी पढ़िए, जिनका अंधेरा या जिनकी बुराई या जिनका पागलपन या जिनकी महानता अभी तक आपकी समझ में नहीं आ पाई है, क्योंकि सिर्फ़ यही एक तरीक़ा है, जिससे आपका विकास होगा। इसी से आप अपने दायरे से बाहर निकलेंगे। और इसी से आप वह बन पाएँगे, जो कि आप अंदर से हैं।

__________________________
अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

एडम ज़गाएव्स्की पोलैंड के महान कवि थे। उनका यह निबंध उनकी पुस्तक ‘अ डिफेंस ऑफ आर्डर’ में शामिल है। यह हिन्दी अनुवाद क्लेयर कैवेना द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है।

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गार्सीया मारकेस : साहित्य से प्यार करने वाला चोर

वे मेरे लेखन के शुरुआती दिन थे। उस समय मैं जो तरीक़ा अपनाता था, आज के तरीक़े से एकदम अलग था। मैं अख़बार में काम करता था। दिन भर लिखता था। रात के कुछ घंटे बाहर दोस्तों के साथ रहता। वापस दफ़्तर आकर सो जाता था। सुबह उठकर फिर काम शुरू कर देता था। उस समय भी मैं सिर्फ़ दो उँगलियों से टाइप करता था और तब तक पैराग्राफ़ नहीं बदलता था, जब तक कि मैं उससे संतुष्ट न हो जाऊँ।

मेरे भीतर जो भी कुछ चलता था, उसे मैं काग़ज़ पर उँडेल देता था, कच्चा, अधपका। मुझे लगता है कि काग़ज़ की लंबाई के कारण मुझे यह आदत पड़ गई थी। अख़बार में छपाई के लिए काग़ज़ के रोल आते हैं, उसमें से काग़ज़ काटकर लिखने के लिए दिया जाता था। वे रोल लंबे-लंबे होते थे, सो उनमें से कटे टुकड़े भी बेहद लंबे होते थे। आज की तरह ए-फोर साइज के पेपर नहीं। कई बार तो एक टुकड़ा ही पाँच मीटर लंबा होता था और हम लोग उसी पर टाइप करते थे। कैसा दृश्य होता था! एक सँकरा-सा काग़ज़ टाइपराइटर से निकला हुआ है, एक तरफ़ टाइप हो रहा है और आगे वह ज़मीन पर किसी विशाल पूँछ की तरह फैलता जा रहा है। हमारे संपादक महोदय की आदत भी उसी के हिसाब से बनी हुई थी। जब भी वह हमें लेख लिखने को कहते, पेज या शब्द संख्या के आधार पर न कहते, बल्कि कहते, ‘मुझे डेढ़ मीटर लंबा लेख चाहिए।’

बरसों बाद जब मैं प्रसिद्ध लेखक बन गया, मैं लिखने की इस शैली को ‘मिस’ करने लगा। अब कंप्यूटर को देखकर लगता है कि यह एकदम उस लंबे काग़ज़ वाली शैली का ही विस्तार है, क्योंकि कंप्यूटर की स्क्रीन पर भी काग़ज़ की लंबाई का पता नहीं चलता।

मैं देर तक काम करता था। हर समय दिमाग़ में सिर्फ़ मेरी कहानी चलती। एक ही चीज़ को कई-कई बार लिखता। सुबह तक लिखने के बाद जब थक जाता, दफ़्तर के पिछले कमरों में काग़ज़ के रोल्स पर सो जाता। काग़ज़ का बिस्तर बनाकर। उसी रोल वाले काग़ज़ को ही ओढक़र। बीच में बाहर जाकर थोड़ा खा-पी लेता, वरना वह भी मुल्तवी कर देता।

हर दिन पिछले दिन की तरह बीत जाता, सिर्फ़ शुक्रवार की रातों को छोड़कर। उस रोज़ हम शाम से ही बाहर निकल जाते। लेखकों-कलाकारों का एक बड़ा समूह था। हम सब एक कैफ़े मे मिलते और बहसें करते। इस समूह में एक शख़्स सबसे अजीब था। वह एक चोर था। वह आधी रात से थोड़ा पहले आता था। हमेशा अपनी चोरों वाली यूनिफॉर्म में होता यानी टाइट पैंट, कपड़े के जूते, बेसबॉल टोपी और हल्के औज़ारों वाली एक पोटली।

एक बार किसी के यहाँ चोरी करते समय वह पकड़ा गया। पकड़ने वाले ने उसका फोटो खींचकर अख़बार में छपवा दिया, ताकि हर कोई उस चोर को पहचान ले और उसे अपने घर के आसपास देखकर सावधान हो जाए। इससे उसकी चोरियाँ तो नहीं रुकीं, बल्कि उसके नाम हज़ारों पाठकों की चिट्ठियां आईं। उनमें उस तस्वीर को छपवाने वाले को खरीखोटी सुनाई गई थी कि कैसे वह एक ग़रीब चोर के पेट पर इस तरह लात मार सकता है।

उस चोर को साहित्य से ख़ूब प्रेम था। जब हम कला और किताबों के बारे में बोल रहे होते, वह बहुत ग़ौर से सुनता, एक शब्द भी न चूकता। हमें पता था कि वह कविताएँ भी लिखता है, प्रेम-कविताओं का एक सकुचाया हुआ शर्मसार-सा कवि, जो अपनी रचनाएँ हम सबसे छुपा ले जाता था। जब हम उस जगह नहीं होते थे, तो वह वहाँ मौजूद दूसरों को अपनी कविताएँ सुना देता था, ऐसा हमें कई बार पता चला था।

आधी रात के बाद वह पड़ोस के किसी अमीर मुहल्ले की ओर चला जाता, इतने सुकून के साथ, जैसे यह उसकी नौकरी हो। फिर तीन-चार घंटे बाद लौटकर आता। हम अपनी बहसों में मशग़ूल तब भी वहीं डटे रहते। वह हम लोगों के लिए कभी गहना लेकर आता, कान की बाली या अंगूठी, जो कि चोरी के माल का हिस्सा होती। हमें भेंट करते हुए वह कहता, ‘यह मेरी तरफ़ से, तुम्हारी प्रेमिका के लिए।’ हालांकि उसने यह कभी नहीं पूछा कि हमारी कोई प्रेमिका थी भी या नहीं।

चोरी करते समय वह घर में किताबें खोजा करता, अगर किसी बेहद सुंदर किताब पर उसकी नज़र पड़ जाती, तो वह उसे हमारे लिए तोहफ़े में ले आता। अगर वह किताब ज़्यादा सुंदर और ज़्यादा लोगों के लिए उपयोगी नज़र आती, तो उसे हमें देने के बजाय वह मीरा देल्मार द्वारा संचालित सार्वजनिक पुस्तकालय को भेंट कर देता था।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(गाब्रियल गार्सीया मारकेस दक्षिण अमेरिका के महान लेखक थे। उन्हें 1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह हिस्सा उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘लिविंग टु टेल अ टेल’ से लिया गया है।)

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वीस्वावा शिम्बोर्स्का : कवि मीवोश के बारे में

आज मैं यह बताना चाहती हूँ कि मेरे देश पोलैंड के कवि चेस्‍वाव मीवोश व उनकी कविताओं की उपस्थिति में मैं किस क़दर घबराई रहती हूँ। एकदम शुरुआत से ही इस घबराहट की शुरुआत हो चुकी थी।

फ़रवरी 1945 का समय था। मैं क्राकोव गई हुई थी। वहाँ स्टारी थिएटर में कविता पाठ आयोजित था। इतने बरसों तक चले युद्ध के बाद पहली बार कोई कविता पाठ हो रहा था। आमंत्रित कवियों के नामों का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि मैं किसी को नहीं जानती थी। मैंने अच्छा-ख़ासा गद्य पढ़ रखा था, लेकिन कविताओं के बारे में मेरी जानकारी शून्य थी। इसलिए मैं चुपचाप सुनती रही, देखती रही।

ऐसा नहीं कि सभी ने अच्छी तरह पढ़ा हो। कुछ लोग तो नाक़ाबिले-बर्दाश्त बमबारी किए जा रहे थे, तो कुछ की आवाज़ टूट रही थी और उनके हाथों में फँसा काग़ज़ काँप रहा था। इसी बीच उन्होंने मीवोश नाम के किसी कवि को पुकारा। बिना किसी उन्मादी नाटकीयता के उसने बेहद शांति से अपनी कविताएँ पढ़ीं। जैसे कि वह कविता नहीं पढ़ रहा था, सस्वर सोच रहा था और हमें भी आमंत्रित कर रहा था कि आओ, मेरी सोच में शामिल हो जाओ।

मैंने ख़ुद से कहा, ‘यह रही। यह है असली कविता! यह है असली कवि!’

ज़ाहिर है, मैं थोड़ा पक्षपात कर रही थी। वहाँ दो-तीन कवि और भी थे, जिन्हें इतने ही ध्यान से सुना जाना चाहिए था। लेकिन असाधारणता का अपना ही तापमान होता है। मेरे दिल ने मुझसे कहा कि अब से इस कवि को हमेशा ग़ौर से देखना, इसकी हर चीज़ खोजना।

मेरी इस प्रशंसा का एक कड़ा इम्तिहान जल्द ही मेरे सामने आ गया। कोई एक ख़ास अवसर था और मैं जीवन में पहली बार किसी एक असली रेस्तरां में खड़ी थी। मैं टुकुर-टुकुर अपने चारों ओर देख रही थी कि क्या पाती हूँ- नज़दीक की एक टेबल पर अपने कुछ दोस्तों के साथ चेस्वाव मीवोश बैठे हैं और पोर्क या सूअर का मांस खा रहे हैं।

यह मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था। सिद्धान्तत: मैं यह जानती थी कि कवियों को भी समय-समय पर खाने की ज़रूरत होती है, लेकिन क्या कवियों को ऐसा अश्लील और फूहड़ व्यंजन खाना चाहिए?

ख़ुद को किसी तरह समझाने-बुझाने के बाद ही मैं उस आतंक से बाहर निकल पाई। जीवन में मुझे कुछ और महत्वपूर्ण अनुभव मिले और मैं कविता की बेहद गंभीर पाठक बन गई। तब तक मीवोश का संग्रह ‘रेस्क्यू’ छप चुका था और अख़बारों में उनकी नई कविताएँ पढ़ने को मिल जाती थीं। उनकी बेहद गहरी चीज़ों को मैं जब भी पढ़ती, मेरी घबराहट बढ़ती जाती।

अगली बार मैंने मीवोश को सीधे पेरिस में देखा, 1950 के दशक के आख़िरी बरसों में। वह कॉफ़ी-टेबलों के बीच रास्ता बनाते हुए तेज़ी से बढ़ रहे थे, शायद आख़िरी पंक्ति में बैठे किसी व्यक्ति से मिलने। मेरे पास पूरा मौक़ा था कि मैं जाकर उनसे मिलती, बातें करती, उन्हें कुछ ऐसा बताती जिसे सुनकर उन्हें ख़ुशी होती कि- अब भी पोलैंड में उनकी प्रतिबंधित किताबों को बेहद शौक़ से पढ़ा जाता है, उनकी किताबें तस्करी के ज़रिए देश में लाई जाती हैं। अगर कोई दिल से मेहनत करे, तो वह, आज नहीं तो कल, उनकी किताबें पा सकता है। लेकिन मैं उनके पास जा नहीं पाई। उनसे कुछ कह नहीं पाई। घबराहट के मारे मेरा सारा शरीर सुन्न हो गया था।

इसके बाद, मीवोश को पोलैंड लौट सकने में कई साल का समय लग गया। (क़रीब तीस साल) क्राकोव की क्रूपनिशा स्ट्रीट में फोटोग्राफ़रों की फ्लैशलाइट से धुआँ उठ रहा था, मार तमाम लोगों और तरह-तरह के माइक्रोफोन्स के पीछे मीवोश लगभग छुप-से गए थे। संवाददाताओं से ख़ुद को मुक्त कराने तक वे बेहद थक चुके थे। जैसे ही उससे निकले, ऑटोग्राफ़ लेने वालों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। मैं भी उसी भीड़ में खड़ी थी। मुझमें इतना साहस नहीं था कि उस बेशुमार भीड़ में मैं उन्हें रोकती, अपना परिचय देती और ऑटोग्राफ़ माँगती।

जब वे दूसरी बार पोलैंड लौटे, तब उनसे निजी मुलाक़ात करने का अवसर आया। तब से अब तक बहुत सारी चीज़ें बदल गई हैं, पर एक तरह से देखा जाए तो कुछ भी नहीं बदला। यह सही है कि उसके बाद मेरे जीवन में कई मौक़े आए जब मैंने उनसे बातें कीं, साझा दोस्तों के साथ उनसे मिली, एक ही जगह से कविताएँ पढ़ीं और हम ख़राब आयोजकों से एक साथ पीडि़त हुए।

पर आज भी मेरी समझ में नहीं आता कि इतने बड़े कवि के सामने कैसे खड़ा हुआ जाए, कैसे पेश आया जाए। जिस तरह बरसों पहले मैं अपने आसपास उन्हें पा घबरा जाती थी, उसी तरह आज भी घबरा जाती हूँ। भले हमने कुछेक बार एक-दूसरे को चुटकुले सुनाए हों और ठंडी वोद्का के गिलास टकराए हों। और भले ही एक बार हम दोनों ने एक रेस्तरां में बैठकर पोर्क से बना वैसा ही व्यंजन साथ खाया, जैसा देखकर कभी मैं आतंकित हो गई थी।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(वीस्‍वावा शिम्‍बोर्स्‍का पोलैंड की कवि थीं। उन्‍हें 1996 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह संस्‍मरण उन्‍होंने पोलैंड के ही कवि चेस्‍वाव मीवोश के 90वें जन्‍मदिन पर लिखा था। मीवोश को 1980 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।)

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हारुकि मुराकामी : कोई लेखक मेरा दोस्त नहीं

न तो मैं कोई बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हूँ और न ही आक्रामक। मैं ठीक उन्हीं लोगों जैसा हूँ, जो मेरी किताबें पढ़ते हैं। मैं एक जैज़ क्लब चलाता था, ग्राहकों के लिए कॉकटेल और सैंडविच बनाता था। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं लेखक बनूँगा। यह सब अपने आप होता चला गया। मुझे लगता है कि यह मुझे ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसीलिए मैं भरसक विनम्र रहने की कोशिश करता हूँ।

तब मेरी उम्र 29 साल थी। मैं अपने व्यवसाय में मस्त रहता था। अचानक एक दिन एक फुटबॉल मैच देखते हुए, जाने कैसे मुझे सूझा कि मुझे एक उपन्यास लिखना चाहिए। मैं आज तक उस प्रेरणा का स्रोत नहीं समझ पाया। उस रोज़ आधी रात जब सब सो गए, मैं अपने किचन टेबल पर बैठा और उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। मैं लिखना तो चाहता था, शुरुआती वाक्य भी लिख दिए, पर मुझे लिखना नहीं आता था। हर वाक्य के बाद मेरी उलझन बढ़ जाती थी। समझ में ही नहीं आता था कि अब क्या लिखूँ।

मेरे पिता जापानी साहित्य के अध्यापक थे, लेकिन मैंने ख़ुद कभी जापानी साहित्य नहीं पढ़ा था। मैं बचपन से ही पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा था। जैज़ संगीत, दोस्तोएव्स्की, काफ्का, रेमंड चैंडलर, ये सब मेरे अपने लोग थे। उनकी दुनिया, मेरी दुनिया था। मैं इनकी किताबें उठाता और पढ़ते-पढ़ते अपने आप सेंट पीटर्सबर्ग या अमेरिका पहुँच जाता। यह उपन्यास की शक्ति होती है, वह आपको कहीं भी पहुँचा सकता है। आज आप आसानी से अमेरिका जा सकते हैं, लेकिन साठ के दशक में बड़ा मुश्किल था। मैं किताबें पढ़कर, संगीत सुनकर, मन ही मन वहाँ पहुँच जाता। किसी स्वप्न की तरह।

तो इस तरह, जब मैं उपन्यास लिखने बैठा, पहले ही पन्ने के बाद अटक गया कि अब क्या लिखा जाए। जापानी साहित्य तो पढ़ा ही नहीं था और लिख जापानी में रहा था। तो मैंने अपने प्रिय पश्चिमी लेखकों को याद किया और उनकी शैली में लिखने लगा। नतीजा यह हुआ कि पहली ही किताब से मेरी अपनी अलग शैली विकसित हो गई।

यह अच्छा ही हुआ कि मुझे जापानी साहित्य का ज्ञान नहीं था, और मेरे प्रिय विदेशी लेखकों को मेरी भाषा के भीतर नकल करना लगभग असंभव काम है। मेरी भाषा और विदेशी प्रभाव दोनों ने मौलिक मिश्रण बना दिया।

मुझे वह किताब पूरा करने में दस महीने का समय लगा। उसका शीर्षक रखा : हवा का गीत सुनो। (अब मुझे वह कमज़ोर किताब लगती है। अंग्रेज़ी में इसका नाम है ‘हियर द विंड सिंग’।) मैंने अपनी पांडुलिपि एक प्रकाशक को भेजी और कुछ ही दिन बाद उसे पहला पुरस्कार मिल गया। मैं हैरान था। मेरी शुरुआत हो गई थी। मैंने अपनी पत्नी से कहा, मैं लेखक बन गया। मुझसे ज़्यादा हैरान वह थी क्योंकि लेखक, होटलवाले के मुकाबले कहीं ज़्यादा ग्लैमरस करियर था।

मैंने छपने से पहले वह उपन्यास उसे पढ़ने के लिए दिया था। उसे पसंद नहीं आया। उसके बाद मैंने उसे तीन-चार बार लिखा। मेरी पत्नी ने मुझे बरसों बाद बताया कि दरअसल, उसने मेरी पांडुलिपि पढ़ी ही नहीं थी। बिना पढ़े ही उसने अपनी नकारात्मक राय दे दी थी, क्योंकि उसे लगता था, मैं लिख नहीं सकता।

जब वह किताब सफल हो गई, उससे इतने पैसे आ गए कि मुझे कोई दूसरा काम करने की ज़रूरत न पड़े, तब से वह मेरी किताबों की पहली पाठिका बन गई। उसके बाद से वह मेरा लिखा हर पेज पढ़ने और उस पर बहस करने को तत्पर रहती है।

मेरे लेखक बनने से पहले, मेरा कोई दोस्त तक लेखक न था। और मेरे लेखक बनने के बाद भी, आज तक, मेरा कोई लेखक दोस्त नहीं। दो-तीन जो हैं, वे भी विदेशों में हैं। अब तक मुझे किसी लेखक को दोस्त बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मैं अकेला रहता हूँ। समूह, स्कूल या साहित्यिक कार्यक्रम मुझे पसंद नहीं।

प्रिंसटन में एक बार एक दावत में मुझे भी बुलाया गया था। सकुचाया हुआ-सा मैं वहाँ गया। वहाँ जॉयस कैरल ओट्स आई थीं, टोनी मोरीसन भी थीं। इतने बड़े लेखकों की उपस्थिति में मैं एकदम घबरा गया। मैं इतना सहमा हुआ था कि उस दावत में खाना भी नहीं खा पाया। पहली बार वहाँ एकाध लेखकों से दोस्ती जैसा रिश्ता बना, लेकिन जापान में तो कोई भी लेखक मेरा दोस्त नहीं। मैं खुद भी लोगों से दूरी बनाए रखना पसंद करता हूँ। हमेशा यही कहता हूँ कि लेखक को अपने अच्छे लिखे पर निर्भर रहना चाहिए, किसी ख़ास समूह में शामिल होने या ख़ास लोगों से दोस्ती कर लेने पर नहीं।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(हारुकि मुराकामी जापान के सबसे चर्चित लेखक हैं। उनके विभिन्न साक्षात्कारों के आधार पर यह छोटा-सा टुकड़ा बनाया गया है।)

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