विश्व

Murakami by Geet Chaturvedi

मुराकामी होने का अर्थ

हारुकि मुराकामी की कीर्ति इतनी है कि बड़े से बड़ा रॉकस्टार भी उनसे ईर्ष्या करे। उनकी किताबों की दुनिया कई बार जितनी जानी-पहचानी लगती है, बाज़ दफ़ा उतनी ही अनजानी भी। किसी लेखक को हम महज़ इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक अनजान दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा, बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने व्यक्तित्व का अजाना चित्र खींच देता है। मुराकामी में ऐसा क्या है, जो उन्हें एक साथ पूरी दुनिया के पाठकों से जोड़ता है, यह बात पता करना दरअसल ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ लगाकर अपने महानगरीय समाज व व्यक्ति की निजी त्रासदियों को देखना है।

मुराकामी साझा वैश्विक संस्कृति और अनुभवों के उपन्यासकार हैं। जापान का महानगरीय समाज न तो अपने गाँवों-सा पूरी तरह जापानी है और न ही लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क की तरह यूरोपीय-अमेरिकी, बल्कि पूर्व और पश्चिम के इस मिश्रण से उसने एक तीसरा ही रंग ले लिया है। मुराकामी, यूरोपीय सांस्कृतिक दबावों से बने इसी विशिष्ट जापानी रंग के उपन्यासकार हैं। कमोबेश यही रंग एशिया व अफ्रीका के लगभग सभी महानगरों का होता जा रहा है। जीवनशैली व प्रतिस्पर्धा के दबाव ने इन सारे मनुष्यों के मनोजगत या ‘माइंडस्केप’ को एक-सा बना दिया है। तेज़ रफ़्तार, बिखरते परिवार, परिभाषाएँ बदलते मानवीय मूल्य और सफलता पा लेने के दबाव के कारण जिस तरह का अवसाद और अकेलापन टोक्यो का युवा महसूस करता है, लगभग वैसी ही अनुभूति बीजिंग, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कराची, इस्ताम्बुल जैसे शहरों का युवा भी करने लगा है। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसे महानगरों में तो यह अनुभूतियाँ पहले से थीं।

मुराकामी पर आरोप लगता है कि वह जापान में रहते हुए अमेरिकी जीवनशैली की किताब लिखते हैं, तो क्या इन सारे महानगरों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी अपने-अपने देशों में बसते हुए भी अमेरिकी जीवनशैली, भागदौड़ व दबावों को जी रहे हैं? इन महानगरों में रहने वाले पाठक भी कई बार इसे महसूस नहीं कर पाते, लेकिन मुराकामी के उपन्यास उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस करा देते हैं। यही उनकी विश्व-दृष्टि और वैश्विक समकालीनता है, जिससे वह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र हैं।

समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक दबावों से पैदा हुआ अवसाद व अकेलापन मुराकामी के उपन्यासों की मुख्य थीम हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति या युवक की कहानी लिखते हैं, जिसका भौगोलिक परिवेश तो जापानी है, लेकिन मानसिक परिवेश वैश्विक है, क्योंकि अवसाद व अकेलापन समकालीन पूंजीवादी विश्व-मानव को मिले सबसे बड़े अभिशाप हैं। ‘काफ्का ऑन द शोर’ में अभिभावकों से परेशान होकर एक नौजवान घर से बाहर निकल जाता है और लाइब्रेरी में रात बिताता है, ‘आफ्टर डार्क’ के नौजवान पूरी रात तफ़रीह करते हैं और एक-दूसरे की निजी समस्याओं को सुनते हैं तो वे उन्हें अपनी ही समस्याएँ लगती हैं। ‘वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकल’ की तरह लकदक चमकते सुपरबाज़ार में अचानक एक बिल्ली प्रगट हो जाती है और वह सुकून के उस स्वप्न की तरह दिखती है जिसे हमने बेहद अकेलेपन में देखा हो। उनकी किताबों में प्रेम व हानिबोध विराट हैं, तो जीवन व प्राप्तिबोध बेहद सूक्ष्म, और दोनों के साहचर्य में एक सोचता हुआ सौंदर्य है।

चाहे कोई भी समाज हो, भौतिक दबाव अधिक हों, तो आध्यात्मिक तलाश बलवती हो जाती है, और मुराकामी इस तलाश का ख़ालिस चित्रण करते हैं। यह करते हुए वह काफ़्का और बोर्हेस की तरह कठिन नहीं होते, न ही सेल्फ हेल्प के लेखकों जैसा सरल व उपदेशात्मक। दरअसल, मुराकामी ऐसे चतुर लेखक हैं, जिन्हें पता है कि कहानी के किन हिस्सों में कठिन होना है और कहाँ सरल बन जाना है। वह दोनों का सही अनुपात में कलात्मक मिश्रण करते हैं। उनके चरित्र अच्छाइयों का नहीं, इंसानी ख़ामियों का उदास उत्सव हैं।

अच्छा साहित्य मनुष्य की स्मृतियों को झिंझोड़ देता है। मुराकामी को पढ़ते हुए हम उदासी की अपनी स्मृतियों में चले जाते हैं। कितना भी इंकार करें, सचाई यह है कि हम अपनी उदासियों से मुहब्बत करते हैं। पराये दुखों को पढ़ने में एक सुविधा यह होती है कि आप उन दुखों को अपना महसूस करते हैं, लेकिन किसी भी समय उन्हें पराया मानकर छोड़ सकते हैं। ‘काफ़्का ऑन द शोर’ का एक संवाद है कि अपने बाहर की भूलभुलैया में तुम जितने क़दम रखोगे, तुम्हारे भीतर की भूलभुलैया भी उतनी ही घनी होती जाएगी। मनुष्य के लिए बाहरी और भीतरी का यह संघर्ष भले पुराना हो, लेकिन आज की दुनिया में यह जितना मुखर है, उतना किसी समय नहीं रहा। मुराकामी की किताबें बाहरी मेज़ पर रखी हुईं आंतरिक त्रासदी की नाज़ुक तश्तरियाँ हैं।

मुराकामी पर बात करते समय मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बीते बरसों में डोरेमॉन और उस जैसे जिन कार्टून सीरियलों ने पूरी दुनिया में स्वीकृति पाई है, वे सभी जापान से ही निकले हैं। उन्होंने मिकी माउस, डोनाल्ड डक, टॉम एंड जैरी जैसे पश्चिमी सीरियलों को लगभग बेदख़ल कर दिया। उनके चित्रण में भी आपको अवसाद, अकेलेपन, सफलता के दबाव से पैदा हुई काल्पनिक तलाश के तत्व प्रमुखता से दिखेंगे।

  • गीत चतुर्वेदी, संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 2016
Amos Oz

अमोस ओज़ : बड़ा होकर एक किताब बनूँगा

हमारे पास सिर्फ़ एक ही चीज़ इफ़रात में थी, और वह थी- किताबें। हर जगह किताबें। दीवारों पर। दरीचों पर। गलियारे में। रसोई में। घर में घुसते ही किताबें। हर खिड़की पर रखी हुई किताबें। घर के हर कोने में भरी हुईं हज़ारों किताबें। मेरी सोच है, लोग आएँगे और चले जाएँगे, पैदा होंगे और मर जाएँगे, लेकिन किताबें हमेशा-हमेशा रहेंगी, वे हमेशा के लिए होती हैं। जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक किताब बन जाऊँगा। लेखक नहीं बनूँगा, किताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन किताबों को नहीं मारा जा सकता। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीक़े से किसी किताब को ख़त्म करने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के किसी कोने में ज़िंदा बची हुई हो।

मेरे बचपन में ऐसा कई बार हुआ कि त्योहार के दौरान भी घर में खाने के लिए पैसे न होते। ऐसे में माँ, पिताजी की ओर कातर निगाहों से देखती। पिताजी उसका देखना समझ जाते कि अब क़ुर्बानी देने का समय आ गया है। वह किताबों की आलमारी की तरफ़ बढ़ जाते। पिताजी नैतिक व्यक्ति थे। उन्हें पता था कि किताबों से ज़्यादा अहम रोटी होती है और रोटी से भी ज़्यादा अहम अपने बच्चे की ख़ुशी।

मुझे याद है, जब वह अपने हाथों में अपनी कुछ किताबें दबाकर सेकंड हैंड बुकशॉप की तरफ़ जा रहे थे, उन्हें बेचने के लिए, तब उनकी पीठ कुबड़ों की तरह झुक गई थी। जब अब्राहम अपने बेटे आइज़क की क़ुर्बानी देने के लिए उसे कंधे पर उठा मोरा की पहाड़ियों की तरफ़ जा रहा होगा, तब उसकी पीठ भी इसी तरह झुकी हुई होगी।

मैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा लगा सकता था। किताबों के साथ मेरे पिता का रिश्ता ऐंद्रिक था। उन्हें किताबों को महसूस करना, उन्हें थपथपाना, उन्हें सूँघना पसंद था। किताबों के साथ उन्हें सुख मिलता था। वह ख़ुद को रोक नहीं पाते थे। अपनी ही नहीं, दूसरों की किताबों तक भी बरबस चले जाते, उन्हें एक बार छूकर ज़रूर देखते।

और उस ज़माने में किताबें भी क्या माशाअल्लाह होती थीं। आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा सुंदर। खुरदुरे सुगंधित चमड़े पर सुनहरे अक्षरों से लिखा होता था। उन्हें छूते ही दिल ज़ोर-से धड़कता था, जैसे किसी निजी और वर्जित हिस्से को छुआ जा रहा, जैसे उसे छूते ही वह धीरे-से काँप उठेगा। दूसरी ऐसी भी किताबें थीं, जो पुट्ठों के साथ बँधी होती थीं, उनकी जिल्द लेई से चिपकी होती, कैसी तो कामुक-सी सुगंध होती थी उस लेई की।

हर किताब की अपनी एक निजी और उत्तेजक सुगंध होती है।

कई बार पुट्ठों के ऊपर चढ़ी कपड़े की जिल्द उखड़ जाती थी, जैसे लहराती हुई स्कर्ट। उस समय कपड़े की जिल्द और पुट्ठे के बीच के अंधकार में झाँकने से हम ख़ुद को रोक नहीं पाते थे।

जब मैं छह साल का हुआ, तो पिता ने अपनी आलमारी का एक छोटा-सा हिस्सा मुझे दे दिया और कहा, यहाँ तुम अपनी किताबें रख सकते हो। मुझे याद है, मेरी किताबें जो मेरी पलंग के पास यूं ही पड़ी रहती थीं, उन सबको अपनी गोद में उठाकर मैंने बड़े क़रीने से उस आलमारी में सेट किया था। मैंने उस समय बेहद ख़ुशी महसूस की थी।

जो लोग आलमारी में अपनी किताबें खड़ी करके लगा सकते हैं, वे बड़े हो चुके होते हैं। बच्चे तो अपनी किताबें आड़ी बिछाकर रखते हैं। मैं बड़ा हो गया था। मैं पिता की तरह हो गया था।

ख़ैर, रोटी ख़रीदने के लिए किताब बेचने निकले पिता आमतौर पर एक-दो घंटे में लौट आते थे। लौटने पर उनके पास किताबें न होतीं, बल्कि भूरे लिफ़ाफ़े में ब्रेड, अंडे, चीज़ आदि होते। लेकिन कभी-कभार जब वह लौटते, अपनी क़ुर्बानियों के बावजूद उनके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान होती। ऐसे समय उनके पास उनकी प्यारी किताबें न होतीं और वह खाने का कोई सामान भी ना लाते। वह घर से ले गई अपनी किताबें तो बेच देते थे, लेकिन उसी समय बदले में कुछ दूसरी किताबें ख़रीद लेते थे। उन्हें रद्दी की दुकान में कुछ ऐसी अनमोल किताबें मिल जातीं, जिन्हें पढ़ने का उनका बरसों पुराना सपना होता। वह उस मौक़े को हाथ से जाने न देते और मिले हुए पैसों से खाना ख़रीदने के बजाय वे किताबें ख़रीद लेते।

ऐसे समय मेरी माँ उन्हें माफ़ कर देती थी, मैं भी। क्योंकि मुझे आइसक्रीम और भुट्टों के अलावा कुछ भी खाना अच्छा नहीं लगता था। वे ऑमलेट या दूसरी चीज़ें ले आते, जो मुझे बिल्कुल नहीं भाती थीं। बहुत ईमानदारी से कहूँ, तो कई बार मुझे सुदूर भारत के कुपोषित बच्चों से ईर्ष्या होती थी, क्योंकि उन बच्चों से कोई यह ज़िद नहीं करता था कि अपनी थाली का खाना पूरा करके ही उठना।


अनुवाद – गीत चतुर्वेदी

(अमोस ओज़ इज़राल के महान लेखक थे। उनका उपन्यास ‘माय माइकल’ एक अद्भुत प्रेमकथा है। ऊपर का यह अंश उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक यानी उनकी आत्मकथा ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’ से लिया गया है।)

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वीस्वावा शिम्बोर्स्का : कवि मीवोश के बारे में

आज मैं यह बताना चाहती हूँ कि मेरे देश पोलैंड के कवि चेस्‍वाव मीवोश व उनकी कविताओं की उपस्थिति में मैं किस क़दर घबराई रहती हूँ। एकदम शुरुआत से ही इस घबराहट की शुरुआत हो चुकी थी।

फ़रवरी 1945 का समय था। मैं क्राकोव गई हुई थी। वहाँ स्टारी थिएटर में कविता पाठ आयोजित था। इतने बरसों तक चले युद्ध के बाद पहली बार कोई कविता पाठ हो रहा था। आमंत्रित कवियों के नामों का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि मैं किसी को नहीं जानती थी। मैंने अच्छा-ख़ासा गद्य पढ़ रखा था, लेकिन कविताओं के बारे में मेरी जानकारी शून्य थी। इसलिए मैं चुपचाप सुनती रही, देखती रही।

ऐसा नहीं कि सभी ने अच्छी तरह पढ़ा हो। कुछ लोग तो नाक़ाबिले-बर्दाश्त बमबारी किए जा रहे थे, तो कुछ की आवाज़ टूट रही थी और उनके हाथों में फँसा काग़ज़ काँप रहा था। इसी बीच उन्होंने मीवोश नाम के किसी कवि को पुकारा। बिना किसी उन्मादी नाटकीयता के उसने बेहद शांति से अपनी कविताएँ पढ़ीं। जैसे कि वह कविता नहीं पढ़ रहा था, सस्वर सोच रहा था और हमें भी आमंत्रित कर रहा था कि आओ, मेरी सोच में शामिल हो जाओ।

मैंने ख़ुद से कहा, ‘यह रही। यह है असली कविता! यह है असली कवि!’

ज़ाहिर है, मैं थोड़ा पक्षपात कर रही थी। वहाँ दो-तीन कवि और भी थे, जिन्हें इतने ही ध्यान से सुना जाना चाहिए था। लेकिन असाधारणता का अपना ही तापमान होता है। मेरे दिल ने मुझसे कहा कि अब से इस कवि को हमेशा ग़ौर से देखना, इसकी हर चीज़ खोजना।

मेरी इस प्रशंसा का एक कड़ा इम्तिहान जल्द ही मेरे सामने आ गया। कोई एक ख़ास अवसर था और मैं जीवन में पहली बार किसी एक असली रेस्तरां में खड़ी थी। मैं टुकुर-टुकुर अपने चारों ओर देख रही थी कि क्या पाती हूँ- नज़दीक की एक टेबल पर अपने कुछ दोस्तों के साथ चेस्वाव मीवोश बैठे हैं और पोर्क या सूअर का मांस खा रहे हैं।

यह मेरे लिए बहुत बड़ा आघात था। सिद्धान्तत: मैं यह जानती थी कि कवियों को भी समय-समय पर खाने की ज़रूरत होती है, लेकिन क्या कवियों को ऐसा अश्लील और फूहड़ व्यंजन खाना चाहिए?

ख़ुद को किसी तरह समझाने-बुझाने के बाद ही मैं उस आतंक से बाहर निकल पाई। जीवन में मुझे कुछ और महत्वपूर्ण अनुभव मिले और मैं कविता की बेहद गंभीर पाठक बन गई। तब तक मीवोश का संग्रह ‘रेस्क्यू’ छप चुका था और अख़बारों में उनकी नई कविताएँ पढ़ने को मिल जाती थीं। उनकी बेहद गहरी चीज़ों को मैं जब भी पढ़ती, मेरी घबराहट बढ़ती जाती।

अगली बार मैंने मीवोश को सीधे पेरिस में देखा, 1950 के दशक के आख़िरी बरसों में। वह कॉफ़ी-टेबलों के बीच रास्ता बनाते हुए तेज़ी से बढ़ रहे थे, शायद आख़िरी पंक्ति में बैठे किसी व्यक्ति से मिलने। मेरे पास पूरा मौक़ा था कि मैं जाकर उनसे मिलती, बातें करती, उन्हें कुछ ऐसा बताती जिसे सुनकर उन्हें ख़ुशी होती कि- अब भी पोलैंड में उनकी प्रतिबंधित किताबों को बेहद शौक़ से पढ़ा जाता है, उनकी किताबें तस्करी के ज़रिए देश में लाई जाती हैं। अगर कोई दिल से मेहनत करे, तो वह, आज नहीं तो कल, उनकी किताबें पा सकता है। लेकिन मैं उनके पास जा नहीं पाई। उनसे कुछ कह नहीं पाई। घबराहट के मारे मेरा सारा शरीर सुन्न हो गया था।

इसके बाद, मीवोश को पोलैंड लौट सकने में कई साल का समय लग गया। (क़रीब तीस साल) क्राकोव की क्रूपनिशा स्ट्रीट में फोटोग्राफ़रों की फ्लैशलाइट से धुआँ उठ रहा था, मार तमाम लोगों और तरह-तरह के माइक्रोफोन्स के पीछे मीवोश लगभग छुप-से गए थे। संवाददाताओं से ख़ुद को मुक्त कराने तक वे बेहद थक चुके थे। जैसे ही उससे निकले, ऑटोग्राफ़ लेने वालों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। मैं भी उसी भीड़ में खड़ी थी। मुझमें इतना साहस नहीं था कि उस बेशुमार भीड़ में मैं उन्हें रोकती, अपना परिचय देती और ऑटोग्राफ़ माँगती।

जब वे दूसरी बार पोलैंड लौटे, तब उनसे निजी मुलाक़ात करने का अवसर आया। तब से अब तक बहुत सारी चीज़ें बदल गई हैं, पर एक तरह से देखा जाए तो कुछ भी नहीं बदला। यह सही है कि उसके बाद मेरे जीवन में कई मौक़े आए जब मैंने उनसे बातें कीं, साझा दोस्तों के साथ उनसे मिली, एक ही जगह से कविताएँ पढ़ीं और हम ख़राब आयोजकों से एक साथ पीडि़त हुए।

पर आज भी मेरी समझ में नहीं आता कि इतने बड़े कवि के सामने कैसे खड़ा हुआ जाए, कैसे पेश आया जाए। जिस तरह बरसों पहले मैं अपने आसपास उन्हें पा घबरा जाती थी, उसी तरह आज भी घबरा जाती हूँ। भले हमने कुछेक बार एक-दूसरे को चुटकुले सुनाए हों और ठंडी वोद्का के गिलास टकराए हों। और भले ही एक बार हम दोनों ने एक रेस्तरां में बैठकर पोर्क से बना वैसा ही व्यंजन साथ खाया, जैसा देखकर कभी मैं आतंकित हो गई थी।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(वीस्‍वावा शिम्‍बोर्स्‍का पोलैंड की कवि थीं। उन्‍हें 1996 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह संस्‍मरण उन्‍होंने पोलैंड के ही कवि चेस्‍वाव मीवोश के 90वें जन्‍मदिन पर लिखा था। मीवोश को 1980 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।)

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ओरहान पामुक – 3 : मेरी घड़ी की कहानी

मैंने अपनी कलाई पर घड़ी बाँधना 1965 में शुरू किया, जब मेरी उम्र 12 साल थी। पर पाँच साल बाद ही मैंने उसे त्‍याग दिया। तब तक वह बहुत पुरानी हो चुकी थी। किसी बड़े ब्राण्ड की नहीं थी, बिल्‍कुल सादी घड़ी थी। 1970 में मैंने ओमेगा घड़ी ख़रीदी और 1983 तक उसे इस्‍तेमाल किया। यह, मेरी तीसरी घड़ी, यह भी ओमेगा है। यह ज़्यादा पुरानी नहीं है, इसे मेरी पत्‍नी ने मुझे तोहफ़े में दिया था, ‘साइलेंट हाउस’ प्रकाशित होने के कुछ ही समय बाद।

घड़ी को मैंने अपने शरीर के अंग की तरह महसूस करता हूँ। जब मैं लिखने बैठता हूँ, यह मेरी डेस्‍क पर सामने पड़ी रहती है और शायद थोड़ा घबराते हुए मेरी ओर देखती रहती है। लिखने बैठने से पहले, जब मैं इसे उतारकर टेबल पर रखता हूँ, मुझे ऐसा लगता है, जैसे किसी ने फुटबॉल खेलने से पहले टीशर्ट उतारी हो। जैसे कि कोई बॉक्‍सर मैच से पहले तैयारी कर रहा हो – अगर मैं गलियों में पैदल चलने के बाद लिखने बैठता हूँ, तो ऐसा अक्‍सर महसूस होता है। मेरे लिए इसे उतारना किसी युद्ध के शुरू होने की भंगिमा जैसा है।

अगर मैंने चार-पाँच घंटे अच्‍छे से लिख लिया, जो मैं लिखना चाहता था, उसमें कामयाब रहा, तो घर से निकलते समय मैं इसे उसी तरह वापस पहन लेता हूँ। तब यही मुझे उपलब्धि का संतोष प्रदान करती है। जैसे ही मैंने अपनी चाभियाँ और पैसे जेब में रखे, मैं अपने टेबल से झट से उठ जाता हूँ, घड़ी को हाथों में लेकर। मैं सड़क या गली में पहुँच चुका हूँ, तब वहाँ पैदल चलते हुए मैं कलाई पर अपनी घड़ी वापस बाँधता हूँ। मेरे लिए यह एक बहुत बड़ा आनंद है। मेरे मन में ये सारी बातें गुत्‍थमगुत्‍था रहती हैं।

मैंने ख़ुद को कभी सोचते हुए नहीं पाया। समय कितनी जल्‍दी गुज़र जाता है। मैं घड़ी का चेहरा देखता हूँ, घंटे और मिनट की सुइयाँ उसी जगह हैं, जहाँ उन्‍हें होना चाहिए, लेकिन मैं इसे समय के कण की तरह नहीं मान पाता। क्‍योंकि वह कण उसमें नहीं दिखता। इसीलिए मैं कभी डिजिटल घड़ी नहीं ख़रीदूँगा। डिजिटल घड़ियाँ समय के हर खंड को एक नंबर में तब्‍दील कर देती हैं, जबकि मेरी घड़ी का चेहरा तो रहस्‍यमय है। मुझे उसे ध्‍यान से देखना पड़ता है। आप समय का चेहरा देख रहे हैं – यह भाव आपको कई बार एक आध्‍यात्मिक क़िस्म की अकड़ से भर देता है।

पुरानी वाली घड़ी मेरी सबसे पसंदीदा और सुंदर है। मुझे उसकी आदत भी सबसे ज़्यादा है। मेरा उससे जुड़ाव वैसा ही है, जैसा किसी प्रिय वस्‍तु से होता है। यह दार्शनिक जुड़ाव, सम्‍मोहन का यह भाव मेरे उन दिनों से जुड़ा है, जब मैंने पहली बार घड़ी पहनी थी। तब मैं मिडिल स्‍कूल में था। जल्‍द ही घड़ी के साथ मेरा रिश्‍ता स्‍कूल की घंटियों के साथ जुड़ गया। मैंने अपनी घड़ी में आशावाद खोजना शुरू किया। अगर कोई काम मैं 12 मिनट में करता हूँ, तो घड़ी देखकर वह काम 9 मिनट में करने की कोशिश करने लगा। भले मैं इसमें कामयाब न हो पाता, मैं कभी निराश न होता था।

सोने से पहले मैं घड़ी उतार देता हूँ और सिरहाने क़रीब ही रखता हूँ। सुबह जागने के बाद सबसे पहले मेरे हाथ उसी को खोजते हैं। जैसे मेरी घड़ी मेरी सबसे क़रीबी दोस्‍त हो। जब उसका पट्टा घिस जाता है, तब भी मैं उसे बदलना नहीं चाहता। उसमें से मेरी त्‍वचा की सुगंध आती है।

पुराने दिनों में मैं 12 बजे के आसपास काम करने बैठता और शाम तक करता रहता। हालांकि लिखने का मेरा असली समय रात ग्‍यारह से सुबह के चार बजे के बीच होता। मैं चार बजे सोने चला जाता। जब तक मेरी बेटी पैदा नहीं हुई थी, तब तक मैं सारी रात काम करता रहता था। सोने के लिए सुबह का समय था। इन घंटों के दौरान जब हर कोई सोया रहता, मेरी घड़ी का चेहरा मुझे निहारता रहता।

फिर मेरी दिनचर्या बदल गई। 1996 के बाद से मैंने आदत डाल ली कि मैं सुबह पाँच बजे उठ जाऊँ, फिर सात बजे तक काम करूँ। फिर अपनी पत्‍नी और बेटी को जगाऊँ और उनके साथ नाश्‍ता करने के बाद अपनी बेटी को स्‍कूल ले जाऊँ।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(ओरहान पामुक तुर्की के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार हैं। उन्‍हें 2006 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। उनका यह निबंध उनकी पुस्‍तक ‘अदर कलर्स’ से लिया गया है।)

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ओरहान पामुक – 2 : मैं स्कूल नहीं जा रही

मैं स्‍कूल नहीं जा रही, क्‍योंकि मुझे नींद आ रही, मुझे सर्दी है और स्‍कूल में कोई मुझे पसंद नहीं करता।

मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी क्‍योंकि वहाँ दो बच्‍चे मुझसे बड़े हैं, ताकतवर भी हैं, वे हाथ अड़ाकर मेरा रास्‍ता रोक देते हैं। मुझे उनसे डर लगता है।

मुझे डर लगता है, इसलिए मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी। स्‍कूल में समय जैसे रुक जाता है। हर चीज़ बाहर ही रुक जाती है। स्‍कूल के दरवाज़े से बाहर।

घर में मेरा कमरा, मेरी माँ, मेरे पापा, मेरे खिलौने और बाल्‍कनी के बाहर उड़ती चिड़ियाँ – जब मैं स्‍कूल में होती हूँ, सिर्फ़ इन सबके बारे में सोचती हूँ। तब मुझे रोना आ जाता है। मैं खिड़की से बाहर देखती हूँ। आसमान में बहुत सारे बादल तैरते हैं।

मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी, क्‍योंकि वहाँ की कोई चीज़ मुझे पसंद नहीं।

एक दिन मैंने एक पेड़ का चित्र बनाया। टीचर ने देखा और कहा, ‘अरे वाह। यह तो सच में पेड़ जैसा है।’ मैंने दूसरा चित्र बनाया। उसमें पेड़ पर कोई पत्‍ता नहीं था। वे दोनों बच्‍चे मेरे पास आए और मेरा मज़ाक़ उड़ाने लगे। मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी। रात को सोने से पहले जब मुझे यह ख़्याल आता है कि अगली सुबह स्‍कूल जाना होगा, तो मुझे बहुत ख़राब लगता है। मैं कहती हूँ, ‘मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी।’

सुनकर वे लोग पूछते हैं, ‘क्‍यों नहीं जाओगी? सब लोग स्‍कूल जाते हैं।’

सब लोग? फिर सब लोगों को जाने दो। एक अकेले मेरे न जाने से क्‍या फ़र्क़ पड़ जाएगा? मैं कल तो गई थी न स्‍कूल? मैं कल भी नहीं जाऊँगी। अब सीधे परसों जाऊँगी।

काश, मैं अपने बिस्‍तर में सो रही होती। या अपने कमरे में होती। स्‍कूल के सिवाय मैं कहीं भी जा सकती हूँ।

मैं स्‍कूल नहीं जाऊँगी। दिखता नहीं, मुझे बुखार है? जैसे ही कोई कहता है, स्‍कूल, वैसे ही मुझे बुखार चढ़ जाता है। मेरा पेट दुखने लगता है। मैं तब दूध भी नहीं पी पाती।

मैं यह दूध नहीं पियूँगी। मैं कुछ नहीं खाऊँगी। और मैं स्‍कूल भी नहीं जाऊँगी। मैं बहुत अपसेट हूँ। मुझे कोई पसंद नहीं करता। वे दोनों बच्‍चे भी न, वे अपना हाथ अड़ाकर मेरा रास्‍ता रोक लेते हैं। मैं उनकी शिकायत करने टीचर के पास गई। टीचर ने कहा, ‘मेरे पीछे-पीछे क्‍यों आ रही हो?’ एक बात बताऊँ, किसी को बताओगे तो नहीं न, सच तो यह है कि मैं हमेशा टीचर के पीछे-पीछे चलने लगती हूँ और टीचर हमेशा ही कहती हैं, ‘मेरे पीछे मत आओ।’

मैं अब कभी स्‍कूल नहीं जाऊँगी। क्‍यों? क्‍योंकि मुझे स्‍कूल जाना ही नहीं है। बस।

जब रिसेस होती है, मैं क्‍लास से बाहर ही नहीं निकलती। मेरी रिसेस तब होती है, जब सब लोग मुझे भूल जाते हैं। तब सबकुछ हिल-मिल जाता है, तब हम सब दौड़ने लगते हैं। टीचर बहुत ग़ुस्‍से से देखती है। तब वह बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगती। मुझे स्कूल नहीं जाना। एक बच्‍चा है, जो मुझे पसंद करता है। सिर्फ़ वही है, जो मेरी तरफ अच्‍छे से देखता है। लेकिन किसी को मत बताना, मुझे वह बच्‍चा भी अच्‍छा नहीं लगता।

मैं बस बैठी रहती हूँ। मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता है। मेरे गालों पर आँसुओं की धारा बहती रहती है। मुझे स्‍कूल बिल्‍कुल अच्‍छा नहीं लगता।

मैं कहती हूँ, मुझे स्‍कूल नहीं जाना। लेकिन सुबह होते ही ये लोग मुझे स्‍कूल पहुँचा देते हैं। मैं मुस्‍कुरा भी नहीं पाती। एकदम नाक की सीध में देखते हुए चलती हूँ। मैं रोना चाहती हूँ। मैं धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ती हूँ। मेरी पीठ पर उतना ही बड़ा बस्‍ता है, जितना किसी सैनिक की पीठ पर। पहाड़ी चढ़ते हुए मैं अपने छोटे-छोटे पैरों को देखती रहती हूँ। सब कुछ कितना भारी है: मेरी पीठ का बस्‍ता भारी है। मेरे पेट में गया दूध भी भारी है। अब तो मैं रो दूंगी।

मैं स्‍कूल में प्रवेश करती हूँ। बड़़ा-सा काला गेट बंद होता है। मैं चीखती हूँ, ‘माँ, तुमने आज भी मुझे यहाँ अकेला छोड़ दिया।’ फिर मैं अपनी क्‍लास में जाती हूँ। अपनी जगह बैठ जाती हूँ। खिड़की से बाहर देखती हूँ। मैं एक बादल बनकर उड़ जाना चाहती हूँ।

इरेज़र, नोटबुक और पेन : ये सब मुर्गियों को खिला दो।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(ओरहान पामुक तुर्की के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार हैं। उन्‍हें 2006 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। अपनी बेटी रूया के बहानों पर उन्होंने यह निबंध लिखा था। इसे उनकी पुस्‍तक ‘अदर कलर्स’ से लिया गया है।)

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ओरहान पामुक – 1 : जिस दिन पिता नहीं रहे…

उस रात मैं देर से घर पहुँचा था। पता चला, पिताजी की मृत्यु हो गई है। क़रीब दो बजे रात मैं उनके कमरे में गया, ताकि उन्हें आख़िरी बार देख सकूँ। सुबह से फोन आ रहे थे, लोग आ रहे थे, मैं अंत्येष्टि की तैयारियों में लगा हुआ था। लोगों की बातें सुनते हुए, पिताजी के कुछ पुराने हिसाब चुकता करते हुए, मृत्यु के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर करते हुए बार-बार मेरे भीतर यही ख़याल आ रहा था, हर क़िस्म की मौत में, मरने वाले से ज़्यादा महत्वपूर्ण रस्में हो जाती हैं।

एक दिन मैं किसी को बता रहा था, मेरे पिताजी ने मुझे कभी डाँटा नहीं, कभी ज़ोर से नहीं बोला, मुझे कभी नहीं मारा। उस समय मुझे उनकी दयालुता के कितने क़िस्से याद आए। जब मैं छोटा था, जो भी चित्र बनाता था, मेरे पिताजी कितनी प्रशंसा के भाव में भरकर उन्हें देखते थे। जब मैं उनकी राय पूछता, तब वे मेरे लिखे हर वाक्य को इस तरह पढ़ते, जैसे मैंने मास्टरपीस लिख दिया हो। मेरे बेस्वाद और नीरस चुटकुलों पर वह ठहाके लगाकर हँसते थे।

अगर बचपन में उन्होंने मेरे भीतर वह विश्वास न भरा होता, मैं कभी लेखक नहीं बन पाता। हम दोनों भाइयों में उन्होंने बचपन से ही यह विश्वास रोपा कि हम होनहार और दूसरों से अलग हैं। वह ख़ुद के बारे में यही सोचते थे कि वह सबसे अलग हैं और उनका मानना था कि हम उनके बेटे हैं, इसलिए हमें भी वैसा ही होना है।

उन्होंने कई किताबें पढ़ी थीं, वह कवि बनना चाहते थे, वैलरी की कविताओं का अनुवाद भी किया था। जवानी में उन्होंने कई किताबें जुटाई थीं। जब मैंने उन किताबों को पढ़ना शुरू किया, तो उन्हें बेहद ख़ुशी हुई। वह किताबों को मेरी तरह उत्तेजना में भरकर नहीं पढ़ते थे, बल्कि दिमाग़ में चल रहे कोलाहल को शांत करने और आनंद के लिए पढ़ते थे, लेकिन वह ज़्यादातर किताबों को बीच में छोड़ देते थे।

दूसरे पिता अपने बच्चों से सेनापतियों की तरह बात करते थे, लेकिन मेरे पिता बताते थे कि कैसे उन्होंने पेरिस की गलियों में सार्त्र और कामू को चलते हुए देखा है। अठारह साल बाद जब मेरा पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ, उन्होंने मुझे एक सूटकेस दिया। उसमें उनकी डायरी, कविता, नोट्स और साहित्यिक लेखन था। उन्हें पढक़र मैं बहुत असहज हो गया। वह सब उनके भीतर के जीवन के दस्तावेज़ थे।

हम अपने पिता को एक आम इंसान की तरह कभी नहीं देख पाते, हम चाहते हैं कि वह हमेशा हमारे आदर्श के रूप में रहें, जैसा हम उन्हें अपने भीतर बनाते आए हैं।

कॉलेज के दिनों में, जब मैं अवसाद में था, मैं सिर्फ़ उनकी प्रतीक्षा करता था कि वे आएँ, डिनर टेबल पर हमारे साथ बैठें और ऐसी बातें बोलें कि हमारा मन खिल उठे। छुटपन में मेरा पसंदीदा शौक़ था कि उन्हें देखते ही मैं उनकी गोद में चढ़ जाऊँ, उनकी गंध महसूस करूँ और उनका स्पर्श करूँ। मैं चाहता था कि मेरे पिता मुझसे कभी दूर न जाएँ, फिर भी वह दूर गए।

जब वह सोफ़ा पर बैठकर किताबें पढ़ते, कभी-कभी उनकी आँखें पन्ने पर से हटकर कहीं दूर देखने लग जातीं, वह अपने में खो जाते। तब मुझे लगता, मेरे पिता के भीतर कोई और शख़्स भी रहता है, जिस तक मेरी पहुँच नहीं है और वह किसी और ही जीवन के स्वप्न देखता है, तब मुझे बुरा लगता। कभी-कभी वह कहते, मैं उस गोली की तरह महसूस करता हूँ, जिसे बिना किसी कारण दाग़ दिया गया है। जाने क्यों मुझे इस बात पर ग़ुस्सा आता था। शायद भीतर ही भीतर मैं उनके इन पहलुओं से दूर भागना चाहता था।

बरसों बाद, जब मेरे भीतर से यह ग़ुस्सा निकल चुका था, मैंने अपने पिता को उस तरह देखना शुरू किया कि उन्होंने कभी हमें डाँटा तक नहीं, मारना तो दूर है, मैंने पाना शुरू किया कि हम दोनों के बीच गहरी समानताएँ हैं। जब मैं किसी मूर्ख पर गुर्राने लगता हूँ, या वेटर से शिकायत करता हूँ, या अपने ऊपरी होंठ काटता हूँ, या किसी किताब को आधा ही पढक़र छोड़ देता हूँ या अपनी बेटी का चुंबन लेता हूँ, या जब जेब से पैसे निकालता हूँ या किसी अजनबी के स्वागत में हल्की-फुल्की बातें करता हूँ, मुझे लगता है, मैं अपने पिता की नक़ल कर रहा हूँ।

यह नहीं कि मेरे हाथ, पैर, कलाई या मेरी पीठ पर बना तिल उनके जैसा है, बल्कि यह ख़याल ही कई बार मुझे डरा देता है कि मैं तो बचपन से ही उनके जैसा बन जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। इंसान की मौत उसी दिन से शुरू हो जाती है, जिस दिन उसके पिता नहीं रहते।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(ओरहन पमुक तुर्की के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार हैं। उन्‍हें 2006 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह निबंध उनकी पुस्‍तक ‘अदर कलर्स’ से लिया गया है।)

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