विश्व साहित्य

Murakami by Geet Chaturvedi

मुराकामी होने का अर्थ

हारुकि मुराकामी की कीर्ति इतनी है कि बड़े से बड़ा रॉकस्टार भी उनसे ईर्ष्या करे। उनकी किताबों की दुनिया कई बार जितनी जानी-पहचानी लगती है, बाज़ दफ़ा उतनी ही अनजानी भी। किसी लेखक को हम महज़ इसलिए नहीं पसंद करते कि वह हमें एक अनजान दुनिया की यात्रा पर ले जा रहा, बल्कि इसलिए भी करते हैं कि वह हमारे जाने-पहचाने व्यक्तित्व का अजाना चित्र खींच देता है। मुराकामी में ऐसा क्या है, जो उन्हें एक साथ पूरी दुनिया के पाठकों से जोड़ता है, यह बात पता करना दरअसल ‘मैग्नीफाइंग ग्लास’ लगाकर अपने महानगरीय समाज व व्यक्ति की निजी त्रासदियों को देखना है।

मुराकामी साझा वैश्विक संस्कृति और अनुभवों के उपन्यासकार हैं। जापान का महानगरीय समाज न तो अपने गाँवों-सा पूरी तरह जापानी है और न ही लंदन-पेरिस-न्यूयॉर्क की तरह यूरोपीय-अमेरिकी, बल्कि पूर्व और पश्चिम के इस मिश्रण से उसने एक तीसरा ही रंग ले लिया है। मुराकामी, यूरोपीय सांस्कृतिक दबावों से बने इसी विशिष्ट जापानी रंग के उपन्यासकार हैं। कमोबेश यही रंग एशिया व अफ्रीका के लगभग सभी महानगरों का होता जा रहा है। जीवनशैली व प्रतिस्पर्धा के दबाव ने इन सारे मनुष्यों के मनोजगत या ‘माइंडस्केप’ को एक-सा बना दिया है। तेज़ रफ़्तार, बिखरते परिवार, परिभाषाएँ बदलते मानवीय मूल्य और सफलता पा लेने के दबाव के कारण जिस तरह का अवसाद और अकेलापन टोक्यो का युवा महसूस करता है, लगभग वैसी ही अनुभूति बीजिंग, बैंगलोर, मुंबई, दिल्ली, कराची, इस्ताम्बुल जैसे शहरों का युवा भी करने लगा है। न्यूयॉर्क, लंदन, पेरिस जैसे महानगरों में तो यह अनुभूतियाँ पहले से थीं।

मुराकामी पर आरोप लगता है कि वह जापान में रहते हुए अमेरिकी जीवनशैली की किताब लिखते हैं, तो क्या इन सारे महानगरों को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि ये सभी अपने-अपने देशों में बसते हुए भी अमेरिकी जीवनशैली, भागदौड़ व दबावों को जी रहे हैं? इन महानगरों में रहने वाले पाठक भी कई बार इसे महसूस नहीं कर पाते, लेकिन मुराकामी के उपन्यास उन्हें यह बात शिद्दत से महसूस करा देते हैं। यही उनकी विश्व-दृष्टि और वैश्विक समकालीनता है, जिससे वह पूरी दुनिया में आकर्षण का केंद्र हैं।

समाज में आर्थिक व सांस्कृतिक दबावों से पैदा हुआ अवसाद व अकेलापन मुराकामी के उपन्यासों की मुख्य थीम हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति या युवक की कहानी लिखते हैं, जिसका भौगोलिक परिवेश तो जापानी है, लेकिन मानसिक परिवेश वैश्विक है, क्योंकि अवसाद व अकेलापन समकालीन पूंजीवादी विश्व-मानव को मिले सबसे बड़े अभिशाप हैं। ‘काफ्का ऑन द शोर’ में अभिभावकों से परेशान होकर एक नौजवान घर से बाहर निकल जाता है और लाइब्रेरी में रात बिताता है, ‘आफ्टर डार्क’ के नौजवान पूरी रात तफ़रीह करते हैं और एक-दूसरे की निजी समस्याओं को सुनते हैं तो वे उन्हें अपनी ही समस्याएँ लगती हैं। ‘वाइंड-अप बर्ड क्रॉनिकल’ की तरह लकदक चमकते सुपरबाज़ार में अचानक एक बिल्ली प्रगट हो जाती है और वह सुकून के उस स्वप्न की तरह दिखती है जिसे हमने बेहद अकेलेपन में देखा हो। उनकी किताबों में प्रेम व हानिबोध विराट हैं, तो जीवन व प्राप्तिबोध बेहद सूक्ष्म, और दोनों के साहचर्य में एक सोचता हुआ सौंदर्य है।

चाहे कोई भी समाज हो, भौतिक दबाव अधिक हों, तो आध्यात्मिक तलाश बलवती हो जाती है, और मुराकामी इस तलाश का ख़ालिस चित्रण करते हैं। यह करते हुए वह काफ़्का और बोर्हेस की तरह कठिन नहीं होते, न ही सेल्फ हेल्प के लेखकों जैसा सरल व उपदेशात्मक। दरअसल, मुराकामी ऐसे चतुर लेखक हैं, जिन्हें पता है कि कहानी के किन हिस्सों में कठिन होना है और कहाँ सरल बन जाना है। वह दोनों का सही अनुपात में कलात्मक मिश्रण करते हैं। उनके चरित्र अच्छाइयों का नहीं, इंसानी ख़ामियों का उदास उत्सव हैं।

अच्छा साहित्य मनुष्य की स्मृतियों को झिंझोड़ देता है। मुराकामी को पढ़ते हुए हम उदासी की अपनी स्मृतियों में चले जाते हैं। कितना भी इंकार करें, सचाई यह है कि हम अपनी उदासियों से मुहब्बत करते हैं। पराये दुखों को पढ़ने में एक सुविधा यह होती है कि आप उन दुखों को अपना महसूस करते हैं, लेकिन किसी भी समय उन्हें पराया मानकर छोड़ सकते हैं। ‘काफ़्का ऑन द शोर’ का एक संवाद है कि अपने बाहर की भूलभुलैया में तुम जितने क़दम रखोगे, तुम्हारे भीतर की भूलभुलैया भी उतनी ही घनी होती जाएगी। मनुष्य के लिए बाहरी और भीतरी का यह संघर्ष भले पुराना हो, लेकिन आज की दुनिया में यह जितना मुखर है, उतना किसी समय नहीं रहा। मुराकामी की किताबें बाहरी मेज़ पर रखी हुईं आंतरिक त्रासदी की नाज़ुक तश्तरियाँ हैं।

मुराकामी पर बात करते समय मैं इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाना चाहता हूं कि बीते बरसों में डोरेमॉन और उस जैसे जिन कार्टून सीरियलों ने पूरी दुनिया में स्वीकृति पाई है, वे सभी जापान से ही निकले हैं। उन्होंने मिकी माउस, डोनाल्ड डक, टॉम एंड जैरी जैसे पश्चिमी सीरियलों को लगभग बेदख़ल कर दिया। उनके चित्रण में भी आपको अवसाद, अकेलेपन, सफलता के दबाव से पैदा हुई काल्पनिक तलाश के तत्व प्रमुखता से दिखेंगे।

  • गीत चतुर्वेदी, संडे नवभारत टाइम्स में प्रकाशित, 2016

आद्रियाना लिस्बोआ की कविता : आत्मा को ऐसे धोएं

आत्मा को अपने हाथों से धोना चाहिए.
इसलिए नहीं कि वह बहुत नाजुक होती है
और रंग छोड़ती है.
इसके उलट, वह बेहद मजबूत कपड़े से बनी होती है
और उसे साफ करने का एक ही तरीका है कि
उसे हाथों से धोया जाए.

एक घरेलू साबुन लें- अच्छा होगा कि सबसे सस्ता वाला.
ब्लीच, फैब्रिक सॉफ्टनर- ये सब भूल जाइए,
किसी आत्मा को इनकी ज़रूरत नहीं होती.
थोड़ी देर तक उसे भिगोकर रखिए
ताकि जिद्दी दाग हट जाएं,
हट जाएं तेल, कीचड़, चटनी-सॉस के निशान भी.
फिर उसे रगड़िए, निचोड़िए
और सूखने के लिए धूप में टांग दीजिए.
इस्तरी करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है.

अगर इस तरह से धोएंगे,
तो आप बरसों बरस पहन सकते हैं अपनी आत्मा.

यह जो आपकी देह है न, यही दुनिया है —
यह एक अड़ियल स्कूल है
और आत्मा
इसका आदर्श यूनिफॉर्म।

*

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

25 अप्रैल 1970 को जन्मी आद्रियाना लिस्बोआ, ब्राजील की सबसे चर्चित लेखिकाओं में से हैं। पुर्तगाली भाषा में उनके कई उपन्यास व एक कविता-संग्रह प्रकाशित हैं।  उनकी कविताएं दुनिया की कई बड़ी पत्रिकाओं में छपकर मक़बूल हुई हैं। आद्रियाना ने अपने कला-जीवन की शुरुआत गायन व संगीत से की, फिर धीरे-धीरे लेखन की ओर आ गईं। यह हिंदी संस्करण एलिसन एंत्रेकिन के अनुवाद पर आधारित है।

The Funeral : a short story in Two Lines

My short fiction “Bade Papa ki Antyeshti” has been published in Anita Gopalan’s fine English translation as “The Funeral” in Two Lines, a prestigious American journal. The translation was called “a masterful translation”. 

I feel proud that Two lines have spotlighted this story to begin their Fall season. The story would sound familiar to Hindi readers, it is a version of ‘Bahattar Gulab’ which was published recently in India Today annual.

Read The Funeral by Geet Chaturvedi, translated by Anita Gopalan here.

Read the beautiful editorial about the short story here.

Anita Gopalan

The Amphibian in the Columbia Journal

A beautiful and thoughtful translation by Anita Gopalan of a section from my long poem ‘The Amphibian’ is in the Columbia Journal, housed at Columbia University. It is wonderful that the journal has featured Anita’s photo on the page—a respect and recognition for the translator. They also said they loved how the tension in the piece is so beautifully highlighted through both the word choice and the pacing.

“The Amphibian” (Ubhaychar) is a 27-part poem included in my book “Nyoonatam Main”. Dedicated to CM and Vishnu Khare, this poem came to me as an artistic challenge, and I’m so glad that readers are loving it in English translation also. Thank you, Columbia Journal, for publishing this piece!

Read the poem here:

Excerpt from the Poem, The Amphibian, by Geet Chaturvedi, Translated from the Hindi by Anita Gopalan

Amos Oz

अमोस ओज़ : बड़ा होकर एक किताब बनूँगा

हमारे पास सिर्फ़ एक ही चीज़ इफ़रात में थी, और वह थी- किताबें। हर जगह किताबें। दीवारों पर। दरीचों पर। गलियारे में। रसोई में। घर में घुसते ही किताबें। हर खिड़की पर रखी हुई किताबें। घर के हर कोने में भरी हुईं हज़ारों किताबें। मेरी सोच है, लोग आएँगे और चले जाएँगे, पैदा होंगे और मर जाएँगे, लेकिन किताबें हमेशा-हमेशा रहेंगी, वे हमेशा के लिए होती हैं। जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक किताब बन जाऊँगा। लेखक नहीं बनूँगा, किताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन किताबों को नहीं मारा जा सकता। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीक़े से किसी किताब को ख़त्म करने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के किसी कोने में ज़िंदा बची हुई हो।

मेरे बचपन में ऐसा कई बार हुआ कि त्योहार के दौरान भी घर में खाने के लिए पैसे न होते। ऐसे में माँ, पिताजी की ओर कातर निगाहों से देखती। पिताजी उसका देखना समझ जाते कि अब क़ुर्बानी देने का समय आ गया है। वह किताबों की आलमारी की तरफ़ बढ़ जाते। पिताजी नैतिक व्यक्ति थे। उन्हें पता था कि किताबों से ज़्यादा अहम रोटी होती है और रोटी से भी ज़्यादा अहम अपने बच्चे की ख़ुशी।

मुझे याद है, जब वह अपने हाथों में अपनी कुछ किताबें दबाकर सेकंड हैंड बुकशॉप की तरफ़ जा रहे थे, उन्हें बेचने के लिए, तब उनकी पीठ कुबड़ों की तरह झुक गई थी। जब अब्राहम अपने बेटे आइज़क की क़ुर्बानी देने के लिए उसे कंधे पर उठा मोरा की पहाड़ियों की तरफ़ जा रहा होगा, तब उसकी पीठ भी इसी तरह झुकी हुई होगी।

मैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा लगा सकता था। किताबों के साथ मेरे पिता का रिश्ता ऐंद्रिक था। उन्हें किताबों को महसूस करना, उन्हें थपथपाना, उन्हें सूँघना पसंद था। किताबों के साथ उन्हें सुख मिलता था। वह ख़ुद को रोक नहीं पाते थे। अपनी ही नहीं, दूसरों की किताबों तक भी बरबस चले जाते, उन्हें एक बार छूकर ज़रूर देखते।

और उस ज़माने में किताबें भी क्या माशाअल्लाह होती थीं। आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा सुंदर। खुरदुरे सुगंधित चमड़े पर सुनहरे अक्षरों से लिखा होता था। उन्हें छूते ही दिल ज़ोर-से धड़कता था, जैसे किसी निजी और वर्जित हिस्से को छुआ जा रहा, जैसे उसे छूते ही वह धीरे-से काँप उठेगा। दूसरी ऐसी भी किताबें थीं, जो पुट्ठों के साथ बँधी होती थीं, उनकी जिल्द लेई से चिपकी होती, कैसी तो कामुक-सी सुगंध होती थी उस लेई की।

हर किताब की अपनी एक निजी और उत्तेजक सुगंध होती है।

कई बार पुट्ठों के ऊपर चढ़ी कपड़े की जिल्द उखड़ जाती थी, जैसे लहराती हुई स्कर्ट। उस समय कपड़े की जिल्द और पुट्ठे के बीच के अंधकार में झाँकने से हम ख़ुद को रोक नहीं पाते थे।

जब मैं छह साल का हुआ, तो पिता ने अपनी आलमारी का एक छोटा-सा हिस्सा मुझे दे दिया और कहा, यहाँ तुम अपनी किताबें रख सकते हो। मुझे याद है, मेरी किताबें जो मेरी पलंग के पास यूं ही पड़ी रहती थीं, उन सबको अपनी गोद में उठाकर मैंने बड़े क़रीने से उस आलमारी में सेट किया था। मैंने उस समय बेहद ख़ुशी महसूस की थी।

जो लोग आलमारी में अपनी किताबें खड़ी करके लगा सकते हैं, वे बड़े हो चुके होते हैं। बच्चे तो अपनी किताबें आड़ी बिछाकर रखते हैं। मैं बड़ा हो गया था। मैं पिता की तरह हो गया था।

ख़ैर, रोटी ख़रीदने के लिए किताब बेचने निकले पिता आमतौर पर एक-दो घंटे में लौट आते थे। लौटने पर उनके पास किताबें न होतीं, बल्कि भूरे लिफ़ाफ़े में ब्रेड, अंडे, चीज़ आदि होते। लेकिन कभी-कभार जब वह लौटते, अपनी क़ुर्बानियों के बावजूद उनके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान होती। ऐसे समय उनके पास उनकी प्यारी किताबें न होतीं और वह खाने का कोई सामान भी ना लाते। वह घर से ले गई अपनी किताबें तो बेच देते थे, लेकिन उसी समय बदले में कुछ दूसरी किताबें ख़रीद लेते थे। उन्हें रद्दी की दुकान में कुछ ऐसी अनमोल किताबें मिल जातीं, जिन्हें पढ़ने का उनका बरसों पुराना सपना होता। वह उस मौक़े को हाथ से जाने न देते और मिले हुए पैसों से खाना ख़रीदने के बजाय वे किताबें ख़रीद लेते।

ऐसे समय मेरी माँ उन्हें माफ़ कर देती थी, मैं भी। क्योंकि मुझे आइसक्रीम और भुट्टों के अलावा कुछ भी खाना अच्छा नहीं लगता था। वे ऑमलेट या दूसरी चीज़ें ले आते, जो मुझे बिल्कुल नहीं भाती थीं। बहुत ईमानदारी से कहूँ, तो कई बार मुझे सुदूर भारत के कुपोषित बच्चों से ईर्ष्या होती थी, क्योंकि उन बच्चों से कोई यह ज़िद नहीं करता था कि अपनी थाली का खाना पूरा करके ही उठना।


अनुवाद – गीत चतुर्वेदी

(अमोस ओज़ इज़राल के महान लेखक थे। उनका उपन्यास ‘माय माइकल’ एक अद्भुत प्रेमकथा है। ऊपर का यह अंश उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक यानी उनकी आत्मकथा ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’ से लिया गया है।)

Jaime Sabines translated by Geet Chaturvedi

ख़ाइमे साबिनेस (Jaime Sabines) की कविताएँ

ख़ाइमे साबिनेस (Jaime Sabines,1926-1999) मेक्सिको के कवि थे। नोबेल पुरस्‍कार विजेता कवि ओक्‍तावियो पास (Octavio Paz) उन्‍हें ‘स्‍पैनिश भाषा के सर्वश्रेष्‍ठ समकालीन कवियों में से एक’ मानते थे। स्‍पैनिश में उनकी कविता की दस किताबें प्रकाशित थीं। उन्‍होंने गद्य कविता में अधिक काम किया, लेकिन यह भी तथ्‍य है कि स्‍पैनिश में नेरूदा के बाद, साबिनेस की प्रेम कविताओं को सबसे अधिक मान मिला। यानी गद्य कविता के बावजूद उनमें प्रेम कविताओं जैसी कोमलता थी। कवि-अनुवादक डब्‍ल्‍यू. एस. मर्विन (W. S. Merwin), साबिनेस के बारे में कहते थे कि उन्‍हें पढ़ना जुनून की प्रामाणिकता को सुनने जैसा है।

उनकी मृत्‍यु के बाद न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स ने लिखा था, ‘कामनाओं पर लिखी साबिनेस की कविताओं को मेक्सिको की कई पीढ़ियों ने गले लगाया और बरसों तक उन्‍हें प्रेम के भजनों की तरह गाया। मेक्सिको में उनकी कविताओं को पढ़ा जाता है, उन्‍हें कंठस्‍थ किया जाता है, उनसे प्रेम किया जाता है।’

साबिनेस बेहद लोकप्रिय कवि थे, लेकिन उतने ही एकांतवासी भी। उनकी सार्वजनिक उपस्थितियाँ बेहद कम होती थीं। मृत्‍यु से कई बरस पहले उन्‍होंने आखि़री कविता-पाठ किया था, जिसमें उन्‍हें सुनने हज़ारों लोग आए थे। वह कविता पाठ मेक्सिको के नेशनल थिएटर में हुआ था, जिसकी बैठक-क्षमता सिर्फ़ एक हज़ार थी, लेकिन बाहर सड़कों पर दसियों हज़ार लोग आकर बैठ गए थे। उन श्रोताओं के लिए आयोजकों को दूर-दूर तक लाउडस्‍पीकर लगाने पड़े। यही नहीं, लोगों की उनकी कविताएँ शब्‍दश: याद थीं। वह कविता पढ़ते, लोग उनके साथ एक-एक शब्‍द बोलते जाते। कितना रोमांचक दृश्‍य रहा होगा- हज़ारों का समूह एक साथ, कवि की आवाज़ से आवाज़ मिलाकर, एक कविता पढ़ रहा है।

साबिनेस, मेक्सिको के साहित्यिक समूहों से भी दूर रहते थे, इसलिए उनकी कविता को शुरुआती समय में साहित्यिक समूहों ने नज़रअंदाज़ किया, लेकिन 1983 के बाद उनकी कविता लोकप्रिय होती गई। उसी बरस ओक्‍तावियो पास ने कहा, ‘मेरी नज़र में साबिनेस, लातिन अमेरिका के सबसे महत्‍वपूर्ण कवि हैं।’

पिता के दबाव में साबिनेस ने डॉक्‍टरी की पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन तीन साल में ही छोड़ दी। एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था, ‘उसके पहले मेरी कविता साधारण-सी थी, दूसरों की नक़ल थी। लेकिन उन तीन बरसों में मैंने जाना कि मैं कविता के बिना जीवित नहीं रह सकता, और मैंने दवाएँ छोड़कर कविता पर ध्‍यान देना शुरू कर दिया।’

72 साल के जीवन के आखि़री दशक में सीढि़यों से गिर जाने के कारण उनके कूल्‍हे की हड्डी  टूट गई, जिसके इलाज में उन्‍हें तीस बार सर्जरी करानी पड़ी। इससे उनका शारीरिक और मा‍नसिक स्‍वास्‍थ्‍य प्रभावित हुआ और वह कविता नहीं कर पाए।

1999 में उनकी मृत्‍यु के बाद मेक्सिको के राष्‍ट्रपति ज़ेदियो ने प्रस्‍ताव दिया कि कवि की राजकीय अंत्‍येष्टि की जाए, लेकिन उनके परिवार ने इससे मना कर दिया। यह कहते हुए कि कवि ने पूरी ज़िंदगी सादगी में बिताई थी, इसलिए मौत की रस्‍में भी सादगी से ही होंगी।

*

चाँद

तुम हर दो घंटे में चाँद को चम्‍मच में भरकर
खा सकते हो या कैप्‍सूल में भरकर।
उससे नींद की गोली जैसा फ़ायदा मिलेगा और
दर्द-निवारक गोली की तरह भी।
और उन लोगों को इससे ख़ास फ़ायदा होगा
जो कुछ ज़्यादा ही फिलॉसफ़ी झाड़ा करते हैं।
अगर अपने बटुए में तुम चाँद का एक टुकड़ा रखोगे
तो वह भालू के बाल या ख़रगोश के पैरों से ज़्यादा चमत्‍कारी होगा।
उससे तुम्‍हें एक प्रेमी खोजने में मदद मिलेगी
या चोरी-छिपे धनवान बन जाने से।
उसके कारण डॉक्‍टर और अस्‍पताल भी तुमसे दूर ही रहेंगे।
जब बच्‍चे सोने से मना करें, तब
तुम उसे टॉफि़यों की तरह दे सकते हो उन्‍हें।
अगर बुज़ुर्गों की आंखों में दो बूंद चाँद डाला जाए
तो वे ज़्यादा आसानी से प्राण छोड़ पाते हैं।

चाँद का एक नया पत्‍ता
अपने तकिये के नीचे रखकर सोओ
और जो चाहे, सो सपना देखो।
चाँद की हवा से भरी हुई बोतल
हमेशा अपने पास रखकर चला करो
इससे तुम पानी में डूबने से बच जाओगे।
क़ैदियों और निराश लोगों को
चाभी की तरह दे दो चाँद।
जिन लोगों को सज़ा-ए-मौत मिली है
और जिन लोगों को सज़ा-ए-ज़िंदगी मिली है
ऐसे लोगों के लिए चाँद से बेहतर कोई टॉनिक नहीं है।
उसे थोड़ा-थोड़ा, लेकिन नियमित लिया करें।


मृत्यु के बारे में

उसे दफ़ना दो।
मिट्टी के नीचे सोये हैं कई ख़ामोश लोग
वे बाक़ायदा उसकी देखभाल करेंगे।
इसे यहाँ मत छोड़ो।
दफ़ना दो।

*

मिथ के बारे में

मेरी माँ ने बताया था कि मैं उसके गर्भ में ही रोया था।
लोगों ने उससे कहा था : तुम्‍हारा बेटा बहुत क़िस्मत वाला होगा।

मेरे जीवन के इन बरसों में
कोई तो है, जो मेरे कानों के पास धीरे-धीरे
बहुत धीरे-धीरे फुसफुसाते हुए कहती है :
जियो, जियो, जियो।

वह मृत्यु है।

*

उम्मीद के बारे में

ख़ुद को उम्मीद से भरा हुआ रखो।
जो दिन आने वाला है
वह तुम्‍हारी आंखों में किसी कली की तरह खिल रहा है
एक नई रोशनी की तरह।
बस इतना है :
जो दिन आने वाला है, वह कभी नहीं आने वाला।

*

अगर मैं अगले ही पल मरने वाला हूँ

अगर मैं अगले ही पल मरने वाला हूँ, तो मैं ज्ञान के ये कुछ शब्‍द लिखूंगा : रोटी का पेड़ और शहद, रूबाब का फल, कोका-कोला, ज़ोनाइट, स्वस्तिक। और उसके बाद मैं रोने लग जाऊंगा।

अगर तुम रोना चाहो, तो ‘माफ़ किया’ शब्द के बाद भी रो सकते हो।

और मेरे साथ ऐसा ही है। मैं अपने नाख़ून त्यागने को तैयार हूँ, ताकि मैं अपनी आंखें निकाल सकूं और कॉफ़ी के एक कप के ऊपर उसे नींबू की तरह निचोड़ सकूं।

(चलो, आँख के छिलके के साथ कॉफ़ी पियें, मेरी प्रिया। )

इससे पहले कि चुप्‍पी की बर्फ़ मेरी ज़ुबान पर जम जाए, इससे पहले कि मेरा गला दो हिस्‍सों में कट जाए और चमड़े के किसी झोले की तरह मेरा दिल उलटकर गिर जाए, मेरी जि़ंदगी, मैं तम्‍हें बताना चाहता हूँ कि कितना शुक्रगुज़ार हूँ मैं अपने इस बड़े कलेजे का, इसी के कारण मैं तुम्‍हारे बग़ीचे में घुसकर सारे गुलाब खा गया और किसी ने मुझे देखा तक नहीं।

मुझे याद है। मैंने अपने दिल को हीरों से भर लिया – हीरे, टूटकर गिरे हुए सितारे हैं जो धरती की धूल में धीरे-धीरे बूढ़े हो गए – जब भी मैं हँसता था, मेरे दिल के हीरों से खनखनाने की आवाज़ आती थी। सिर्फ़ एक ही बात से खीझता हूँ कि थोड़ा पहले पैदा हो सकता था मैं, पर नहीं हो पाया।

प्यार को मेरे हाथ में किसी मरी हुई चिड़िया की तरह मत रखो।

*

मैं ख़ुशियों को इस तरह महसूस करता हूँ

मैं ख़ुशियों को इस तरह महसूस करता हूँ, जैसे तैरते हुए किसी शहर की पीठ पर बारिश अपने पंख फड़फड़ाती है।

धूल नीचे बैठ जाती है। हवा शांत है, उसमें से गुज़रती हैं महक की पत्तियाँ, ठंडक के पक्षी और सपने। अभी-अभी जन्‍मे एक शहर की अगुवानी आसमान करता है।

ट्राम, बस, ट्रक, साइकिल पर और पैदल चलते लोग, हर रंग की गाड़ियां, ठेलेवाले, दुकानदार, भुने हुए केले, दो बच्‍चों के बीच उछलती हुई गेंदें : गली फैलती है, लोगों की आवाज़ें शाम की आखिरी रोशनी से टकरा दोगुनी हो जाती हैं, दिन अब सूख रहा है।

वे उस तरह बाहर निकलते हैं जैसे बरसात के बाद चींटियाँ, आसमान के छोटे-छोटे टुकड़ों को चुनने के लिए, अक्षुण्‍णता के नन्‍हें तिनके को अपने अंधेरे घरों की ओर ले जाते हुए, छतों से लटक रही हैं गूदेदार मछलियाँ, पलंग के नीचे जाला बुन रही हैं मकडि़याँ, घर के पिछवाड़े, कम से कम एक, परिचित भूत भी मौजूद है।

काले बादलों की माँ, तुम्‍हारा शुक्रिया, तुमने इस दुपहरी का चेहरा इतना सफ़ेद कर दिया है और हमारी मदद की है ताकि हम ज़िंदगी से प्‍यार करते रह सकें।  

*
 

कुछ समय बाद

कुछ समय बाद अनजान लोगों को तुम इस तरह सौंपोगे ये पन्‍ने जैसे तुम कटी हुई घास का गट्ठर किसी को देते हो।

अपनी उपलब्धियों पर गर्वित और दुखी तुम लौटोगे और अपने पसंदीदा कोने में ख़ुद को फेंक दोगे।

तुम ख़ुद को कवि कहते हो, क्योंकि तुममें इतनी विनम्रता नहीं है कि तुम चुप रह सको।

अरे ओ चोर, तुम्‍हें शुभकामनाएँ, ऐसा करके तुम अपनी पीड़़ा से कुछ चुरा ही रहे हो – और अपने प्रेम से भी। अपनी परछाईं के जो टुकड़े तुम चुन-चुनकर उठाते हो, देखते हैं, उनसे तुम कैसी तस्‍वीर बना पाते हो।

*

तुममें वह सब है, जो मैं खोजता हूँ

तुममें वह सब है, जो मैं खोजता हूँ, जिसकी प्रतीक्षा करता हूँ, जिससे मैं प्‍यार करता हूँ- तुममें वह है।
मेरे हृदय की मुट्ठी धड़क रही है, पुकार रही है।
तुम्‍हारे लिए कही कहानियों के प्रति मैं आभार प्रकट करता हूँ।
मैं तुम्‍हारे पिता और मां और मृत्‍यु को शुक्रिया कहता हूँ जिसने तुम्‍हें नहीं देखा।
तुम्‍हारे लिए चलती हवा का शुक्रिया।
तुम उतनी ही शानदार हो जितना गेहूँ,
अपनी देह के रेखाचित्र की तरह ही नाज़ुक हो तुम।
मैंने कभी किसी छरहरी औरत से प्‍यार नहीं किया
लेकिन तुमने मुझे प्‍यार में डाल ही दिया।
मेरी इच्‍छाओं को तुमने लंगर की तरह टिका दिया।
मेरी आँखों को दो म‍छलियों की तरह पकड़ लिया।
और इसी कारण मैं खड़ा हूँ तुम्‍हारे दरवाज़े पर, प्रतीक्षारत।

*

इस पर अच्‍छे से ग़ौर करना

वे कहते हैं कि वज़न घटाने के लिए मुझे कसरत करनी चाहिए
कि पचास की उम्र में चर्बी और सिगरेट ख़तरनाक होते हैं
कि अपनी देह को सुडौल बनाए रखना बहुत ज़रूरी है
और समय के ख़िलाफ़ एक जंग लड़ना, उम्र के ख़िलाफ़ भी।

अच्‍छी नीयत वाले विशेषज्ञ और दोस्‍ताना डॉक्‍टर
आहार की सूची और पूरी एक दिनचर्या बना कर देते हैं
ताकि ज़िंदगी को कुछ साल और लंबा किया जा सके।

इन अच्‍छी नीयतों के प्रति मैं कृतज्ञ हूँ, लेकिन मुझे हँसी आ जाती है
कि उनके सुझाव कितने खोखले हैं, कितना तुच्‍छ है उनका यह जोश

(मृत्‍यु को भी ऐसी चीज़ों पर हँसी आती है)

मैं सिर्फ़ एक ही सुझाव पर अमल करूंगा और वो यह कि
अपने बिस्‍तर में एक युवती को पा सकूं
क्‍योंकि इस उम्र में
यौवन ही वह एकमात्र चीज़ है जो ऐसे रोगों को ठीक कर सके।

*

पैदल

ऐसा कहा जाता है, ऐसी अफ़वाह है। दावतों में, कलादीर्घाओं में, कभी कोई एक या बहुत सारे लोग इस पर स्‍वीकृति की मुहर लगाते हैं, कि ख़ाइमे साबिनेस एक महान कवि है। या कम से कम एक अच्‍छा कवि है। या एक ठीक-ठाक सा कवि है। या बहुत सरल, कि वह एक कवि है।

ख़ाइमे ये सारी बातें सुनता है और ख़ुश होता है : अरे वाह! क्‍या बात है! मैं एक कवि हूँ। मैं एक महत्‍वपूर्ण कवि हूँ। मैं एक महान कवि हूँ। इन सारी बातों को मान वह घर से बाहर जाता है, या बाहर से घर लौटता है इन सारी बातों को मान। लेकिन तब कोई इस पर तवज्‍जो नहीं देता कि वह कवि है। जब वह गलियों में चलता है, तो कोई नहीं देता। और घर में एकाध ही लोग ही उसके कवि होने पर ध्यान देते हैं। कवियों के माथे पर कोई सितारा क्‍यों नहीं लगा होता? या उनकी चमक दिखने लायक़ क्‍यों नहीं होती? या उनके कानों से रोशनी की किरणें क्‍यों नहीं निकलतीं?

ख़ाइमे कहता है, हे ईश्‍वर! मुझे एक पिता भी होना पड़ता है, एक पति भी, दूसरों की तरह कारख़ाने में काम करना पड़ता है, दूसरों की तरह ही मैं घर से बाहर फिरता हूँ पैदल।

कहता है ख़ाइमे, हाँ, बिल्‍कुल यही है। इतना ही है। मैं कवि नहीं हूँ, मैं पैदल हूँ।

और इस बार वह अपने बिस्‍तर में जा घुसता है, ख़ुश और शांतचित्‍त।

*

टैगोर को पढ़ते हुए

टैगोर को पढ़ते हुए मैंने यह सोचा था : दिया, रास्‍ता, झरने के नीचे रखा घड़ा, नंगे पैर- ये सब एक खोई हुई दुनिया है। अब तो यहाँ बिजली के बल्‍ब हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ हैं, पानी के नलके हैं, जेट हवाई जहाज़ हैं। इनमें से कोई कहानियाँ नहीं सुनाता। टीवी और फिल्‍मों ने दादी-नानी की जगह ले ली है। और सारी तकनीक चमत्‍कार तक इस क़दर पहुंचती है कि बस, साबुन और टूथपेस्‍ट के बारे में बता पाती है।

मुझे नहीं पता कि मैं क्‍यों चलता हूँ, लेकिन इस समय मुझे टैगोर की कोमलता की तरफ़ आ जाना चाहिए, पूरब की पूरी कविता की तरफ़ जो कंधे पर मटका लेकर चल रही लड़की को हमारे दफ़्तर की लायक़ लेकिन ग़रीब टाइपिस्‍ट में बदल देती है। आख़िरकार, हमारे बादल एक ही हैं, हमारे सितारे एक ही और अगर ग़ौर से देखा जाए, तो हमारे समंदर भी एक ही हैं।

मेरे दफ़्तर की यह लड़की भी प्‍यार को पसंद करती है। और काग़ज़ात की अराजकता जो दिनों को महज़ मैला करती है, उनके बीच सफ़ेद सपनों वाले कुछ ऐसे भी काग़ज़ हैं, जिनकी वह रखवाली करती है, करुणा की कतरनें भी हैं, जिनसे वह अकेलेपन को चुनौती देती है। किसी दिन मैं, हमारे जीवन की इस बेतहाशा ग़रीबी के गीत गाना चाहता हूँ, बेहद साधारण चीज़ों की स्‍मृति का गीत, उस आरामदेह यात्रा का गीत जो हम आने वाले कल की दिशा में की थी, बिना बीते हुए कल को पर्याप्‍त प्रेम किए।

प्रेमी

प्रेमी ख़ामोश हो गए हैं।
प्रेम सबसे सुंदर, सबसे बारीक मौन है
जो सबसे ज़्यादा कांपता है
और जिसे सहना सबसे ज़्यादा मुश्किल।
प्रेमी कुछ खोज रहे हैं।
प्रेमी वे हैं जो त्‍याग करते हैं
जो बदल जाते हैं, जो भूल जाते हैं।
उनका दिल उन्‍हें बताता है कि वे कभी नहीं खोज पाएँगे।
वे खोज नहीं रहे, फिर भी उन्‍हें तलाश है।

दीवानों की तरह गलियों में भटकते हैं प्रेमी
क्‍योंकि वे अकेले हैं, अकेले।
हर एक पल के प्रति ख़ुद को समर्पित करते,
रोते हैं क्‍योंकि वे अपना प्‍यार बचा नहीं पाते।
वे प्रेम की चिंता करते हैं।
वे बस आज में जीते हैं, यही अच्‍छा करते हैं।
बस इतना ही आता है उन्‍हें।
वे कहीं जा रहे होते हैं,
हमेशा कहीं न कहीं जा रहे होते हैं।
वे उम्‍मीद करते हैं,
किसी एक ख़ास चीज़ की नहीं,
बस, ऐसे ही उम्‍मीद करते हैं।
उन्‍हें पता है कि जो कुछ भी वे खोज रहे, उसे नहीं पा सकेंगे।
प्रेम एक अनवरत स्‍थगन है।
अगली बार, अगली बार। ना, बस अगली सीढ़ी पर मिल जाएगा प्रेम।
प्रेमियों की प्‍यास कभी बुझाई नहीं जा सकती।
इस पर भी सौभाग्‍य की बात कि उन्‍हें हमेशा अकेले रहना पड़ता है।

प्रेमी किसी कहानी में आए सांपों की तरह हैं।
उनके हाथों की जगह सांप उगे होते हैं।
उनकी गरदन में जो नस होती है,
वह भी सांप की तरह ही फूलती है
और एक दिन उनकी गला घोंट देती है
प्रेमी सो नहीं पाते।
क्‍योंकि अगर वे सोये, तो कीड़े उन्‍हें खा जाएँगे।

वे अंधेरे में आंखें खोलते हैं
और उनमें आतंक बस जाता है।

पागल होते हैं प्रेमी, सिर्फ़ पागल
उन्‍हें ईश्‍वर ने छोड़ दिया है और शैतान ने भी।

कांपते हुए अपनी गुफ़ाओं से
बाहर निकलते हैं प्रेमी, भूख से हारे हुए
और पुराने भूतों का शिकार करते हैं।
वे उन लोगों पर हंसते हैं
जिन्‍हें सबकुछ पता होता है।
और उन पर भी हंसते हैं जो ताउम्र सच्‍चा प्‍यार करते हैं।  
और उन पर भी, जो मानते हैं कि
प्रेम एक ऐसा दिया है, जिसकी लौ कभी बुझाई नहीं जा सकती।

प्रेमी पानी भरने का खेल खेलते हैं
धुएँ से छल्‍ले बनाने का खेल।
एक ही जगह रुके रहने का खेल।
कहीं नहीं जाने का खेल।
वे खेलते हैं प्‍यार का लंबा और दुख-भरा खेल।
वे कभी हार नहीं मानते।
किसी भी क़िस्‍म की सुलह उन्‍हें शर्मिंदा कर देती है।

एक पसली से दूसरी पसली तक ख़ाली होते हैं वे
एक ख़ाली मौत उबलती रहती है उनकी आंखों के पीछे
वे भटकते हुए रोते हैं जब तक कि सुबह न हो जाए।
ट्रेनें उन्‍हें अलविदा कह देती हैं
मुर्ग़े दुख से भरकर जागते हैं।

कभी-कभी एक नवजात भूमि की ख़ुशबू उन तक पहुंचती है
एक औरत की ख़ुशबू जो अपनी जांघों के बीच हाथ दबाए सोई है शांति से
शांत पानियों की ख़ुशबू, और रसोई की भी।

और तब प्रेमी अपने होंठों के बीच
वह गीत गाना शुरू करते हैं
जो उन्‍होंने कभी सीखा ही नहीं था।
और उसके बाद रोते जाते हैं, रोते ही जाते हैं
इस ख़ूबसूरत ज़िंदगी के लिए।

*

सारे अनुवाद और टिप्पणी : गीत चतुर्वेदी

pal aster

पॉल ऑस्टर : मकान नहीं छोड़ा, देह छोड़ दी

तीन हफ्ते पहले मुझे अपने पिता की मृत्यु की ख़बर मिली। पिता के पास कुछ नहीं था। बीवी नहीं थी, कोई ऐसा परिवार नहीं था जो सिर्फ़ उन पर निर्भर हो। यानी ऐसा कुछ नहीं था, जो सीधे तौर पर उनकी अनुपस्थिति से प्रभावित हो। उनके न रहने का दुख होगा, कुछ लोगों को सदमा लगेगा, कुछ दिनों का शोक होगा और फिर ऐसा लगेगा, जैसे कि वह कभी इस दुनिया में थे ही नहीं।

दरअसल, अपनी मृत्यु से काफ़ी पहले ही वह अनुपस्थित हो गए थे। लोग पहले ही उनकी अनुपस्थिति को स्वीकार कर चुके थे। उसे उनके होने के एक गुण की तरह मान चुके थे। अब जबकि वह सच में नहीं हैं, लोगों के लिए इसे एक तथ्य की तरह स्वीकार कर लेना कोई मुश्किल काम न होगा।

पंद्रह साल से वह अकेले रह रहे थे। ऐसे, जैसे कि उनके आसपास की दुनिया का कोई अस्तित्व ही न हो। ऐसा लगता ही नहीं था कि उन्होंने इस धरती पर कोई जगह घेरी है, बल्कि वह इंसान के रूप में उस बक्से की तरह हो गए थे, जिसमें कुछ भी घुस नहीं सकता। दुनिया उनसे टकराती थी, कभी-कभी टकराकर टूट भी जाती थी, कभी-कभी टकराकर चिपक भी जाती थी, पर कभी उनसे पार नहीं हो पाई। पंद्रह साल तक वह एक आलीशान मकान में भटकते रहे, और फिर वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

वह इस मकान में आना नहीं चाहते थे। जब हमारा परिवार यह मकान ख़रीदना चाहता था, तो उन्होंने इसकी क़ीमत पर एतराज़ जताया था, लेकिन माँ यही मकान चाहती थी। अंतत: उन्होंने ख़रीद लिया, वह भी पूरे नक़द भुगतान पर। कोई क़र्ज़ नहीं, कोई क़िस्त नहीं। वे उनके अच्छे दिन थे। वह शाम को जल्दी घर आते थे और डिनर से पहले थोड़ी देर सोया करते थे। वह अपनी आदतों से मजबूर थे। जब इस मकान में आए उन्हें हफ़्ता भी नहीं हुआ था, उन्होंने एक बड़ी अजीबोग़रीब ग़लती की थी। एक शाम दफ़्तर से लौटने के बाद अपनी आदत के अनुसार, वह इस मकान में आने के बजाय, पुराने मकान में चले गए। बाक़ायदा वहाँ कार पार्क की। सामने का दरवाज़ा बंद देख पिछले दरवाज़े से अंदर घुसे, सीढ़ियाँ चढ़ीं, बेडरूम में घुसे और जाकर सो गए। क़रीब एक घंटा सोते रहे। जब उस मकान की नई मालकिन ने अपने बेडरूम में किसी अजनबी को सोया पाया, तो हल्ला मच गया। मेरे पिताजी जाग गए। लेकिन

वह वहाँ से भागे नहीं। वह तो बस आदत के मुताबिक़ उस मकान में घुस गए थे। जब वहाँ इकट्ठा लोगों को यह बात समझ आई, तो सब बहुत हँसे। आज भी मैं उस क़स्से को याद कर हँस पड़ता हूं।

धीरे-धीरे समय गुज़रा। माँ तलाक़ लेकर अलग हो गईं। हम बच्चे बड़े हुए और अलग रहने लगे, लेकिन पिता उसी मकान में रहते रहे। उसमें उन्होंने ज़रा भी परिवर्तन नहीं किया। दीवारों का रंग वही, सारे फ़र्नीचर भी वही। आख़िर वह मकान उन्होंने अपने परिवार के लिए लिया था। पंद्रह बरसों से वह सिर्फ़ रहते आए, उस मकान में उन्होंने न कुछ जोड़ा, न कुछ घटाया। उसमें चलते हुए लगता, हम किसी अवसाद लोक में चल रहे हैं।

मरे हुए आदमी की चीज़ों का सामना करने से ज़्यादा भयावह कुछ नहीं होता। चीज़ें तो जड़ होती हैं, उनके भीतर अर्थ तो वह जीवन डालता है, जिससे वह जुड़ी होती हैं। जब जीवन ख़त्म होता है, तब चीज़ें भी बदल जाती हैं, भले उनके रूप में कोई बदलाव न आता हो। वे उन भूतों की तरह होती हैं, जिन्हें छुआ जा सकता है। उन कपड़ों का क्या करेंगे, जो ख़ामोशी से उस आदमी का इंतज़ार कर रही हैं, जो उन्हें पहनता आया था, लेकिन जो अब कभी नहीं आएगा। उस रेज़र का क्या करेंगे, जो बाथरूम में टँगा हुआ है, जिस पर पिछली शेव के निशान बचे हैं, लेकिन अब जिसका इस्तेमाल नहीं होगा। उनके हनीमून की तस्वीरें वहाँ लगी हुई थीं। एक दराज़ में पुरानी चेकबुक्स पड़ी थीं। कुछ में हथौड़ियाँ और कभी इस्तेमाल न होने वाली कीलें पड़ी थीं। बाथरूम की एक दराज़ के सबसे नीचे एक पुराना टूथब्रश पड़ा था, जिसे माँ इस्तेमाल करती थीं। उसे देखकर ही पता चलता है कि इसे पंद्रह साल से छुआ तक नहीं गया है।

हम सब उस मकान से निकल चुके थे, लेकिन हमारी चीज़ें अब भी वहाँ वैसे ही पड़ी थीं, जैसे हमारे पिता वहाँ वैसे ही थे। वह हम सबकी स्मृतियों के बियाबान में ठीक उसी तरह थे। पहले जैसे।

उस मकान की एक-एक चीज़ देखकर पता चलता है कि पिता ने अपने जाने की कोई तैयारी नहीं की थी। वह अचानक गए। जिस मकान में वह रहना नहीं चाहते थे, उसी मकान में उन्होंने पूरा जीवन गुज़ारा। जब सबने कहा कि यह मकान छोड़ दो, तो उन्होंने किसी की नहीं सुनी। अकेले ही रहे। मरने से एक हफ्ता पहले उन्होंने मकान बेच दिया था, लेकिन उसकी किसी चीज़ को बाहर नहीं निकाल पाए। वह रोज़ उस मकान में रहते थे, लेकिन मरते समय वह उसका सामना नहीं कर पाए। नए लोगों के लिए उस मकान को ख़ाली करने के बजाय उन्होंने अपनी देह को ही ख़ाली करना सही समझा। इसके लिए मृत्यु एकमात्र रास्ता थी, एकमात्र जायज़ रास्ता।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(पॉल ऑस्टर अमेरिका के प्रसिद्ध लेखक हैं। उत्तर आधुनिक कथा-शैली के लिए जाने जाते हैं। न्यूयॉर्क ट्रायलॉजी उनकी यादगार कृति है। उनका यह संस्मरण उनकी किताब ‘इन्वेन्शन ऑफ़ सॉलीट्यूड’ से लिया गया है।)

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एलिफ़ शफ़क : सामान कम होगा, तो थकान कम होगी

सबकुछ व्यवस्थित हो, और एक ख़ास क़िस्म का मौन भी हो, यह मुझे परेशान करने के लिए काफ़ी है। बरसों तक एक ही मकान में रहना, एक ही पड़ोसी को रोज़ देखना, रोज़ एक ही गली में चलना, रोज़ एक ही शहर में घूमना यह सब मेरे बस का नहीं है। संतुलन और स्थिरता मेरे लिए रूसी और चीनी भाषाओं की तरह हैं। मुझे पता है, ये महान इतिहास वाली महान भाषाएँ हैं, पर कम से कम मैं, इन्हें नहीं बोलती।

सन्नाटा तो बेहद बुरा लगता है। जैसे ही ख़ामोशी का कोई बड़ा बादल गहराता है, मेरे भीतर की आवाज़ें ज़्यादा तेज़ हो जाती हैं। जब मैं लिखने बैठती हूँ, तो कमरे की सारी खिड़कियाँ खोल देती हूँ। ऐसा करके मेरा मन यह नहीं होता कि मेरा निजी संगीत मुझमें से निकले और बाहर के संगीत में शामिल हो जाए, बल्कि मैं यह चाहती हूँ कि बाहर का संगीत आकर मेरे भीतर के संगीत में घुल जाए।

वस्तुओं के साथ मेरा रिश्ता लगातार बेवफ़ाइयों पर आधारित है। मैं वस्तुएँ पाती हूँ, उनसे प्यार करती हूँ, फिर वे मुझसे छूट जाती हैं। बचपन से ही ऐसा रहा कि थोड़े-थोड़े समय के बाद मुझे अपना सामान पैक कर अगली जगह रवाना होना पड़ा। जब आप मुहल्ला बदल लेते हैं, शहर बदल लेते हैं या अपना महाद्वीप बदल लेते हैं, आप अपने साथ महज़ कुछ तयशुदा चीज़ें ही ले जा सकते हैं। बाक़ी सारी चीज़ें आपको पीछे छोड़ देनी होती हैं।

बार-बार घर और शहर बदलने ने मुझे यह सिखाया कि कैसे कम से कम फर्नीचर के साथ रहा जाए। मैं एक शहर में जो ख़रीदती, अगले शहर जाते समय उसे बेच देती। यह वैसा ही है, जैसे हर नए क़दम के साथ मैं पिछले क़दम की संपत्तियों को खो बैठूँ। उसके बाद भी एक सामान हमेशा मेरे साथ रहा, जहाँ कहीं भी मैं गया, वही मेरे काम आया। उसका अस्तित्व मृत सागर से भी पुराना है और पंख से भी हल्का है। उसे कहीं भी ले जाओ, कस्टम्स वाले कोई उलाहना भी नहीं करते। वह है- कहानी कहने की कला।

मैं अपनी सबसे अनमोल किताबें भी कभी अपने साथ नहीं रख पाई। बक्सों में बंद वे दोस्तों के घरों के तहख़ानों में पड़ी हैं। रूसी साहित्य का मेरा संग्रह अंकारा में मेरी मां के घर में पड़ा है, स्पैनिश की सारी किताबें इस्ताम्बुल में एक दोस्त के गैराज में रखी हुई हैं, अरबी साहित्य की अन्य किताबें उस कॉलेज के कमरे में हैं, जहाँ मैं पढ़ाती थी।

इस तरह से अव्यवस्थित रहने का एक अजीबोग़रीब फ़ायदा मुझे मिला। मेरी स्मृति तेज़ हो गई। जब आप किताबें पास नहीं रख सकते, तब आपके पास उसके महत्वपूर्ण हिस्सों को याद रखने के अलावा कोर्ई चारा नहीं होता। पास्तरनाक की ‘डॉक्टर ज़िवागो’ के कई संवाद मुझे रटे हुए हैं। रूमी की कविताएँ मेरे मन में हमेशा गूँजती रहती हैं। मैं उन किताबों को सदैव साथ नहीं रख सकती, लेकिन जब चाहूँ, अपने भीतर से उन पंक्तियों को याद कर सस्वर दोहरा सकती हूँ। आज भी मेरे भीतर रूमी की वे पंक्तियां गूंजती हैं-

“अगर मन के भीतर प्रेम का हीरा नहीं है, तो मेरे वजूद का यह बाज़ार संग-दर-संग ढह जाए।”

अनाइस नीन एक लेखिका थीं, जो फ्रांस में 1903 में पैदा हुई थीं। न केवल विश्व साहित्य पर उनके लेखन का गहरा असर पड़ा, बल्कि बीसवीं सदी के स्त्री मुक्ति आंदोलन को भी उन्होंने बहुत गहरे प्रभावित किया। वह लिक्खाड़ थीं। उपन्यास, कहानी, आलोचना सबकुछ लिखा, लेकिन उनकी डायरियाँ सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं। आलोचकों का कहना था कि उनके उपन्यासों के किरदार दरअसल वह ख़ुद हैं और वह हमेशा इस बात से इंकार करती रहीं।

उनके जीवन के बारे में जो विचित्र बातें हैं, उनमें से एक यह कि वह प्रकाशन उद्योग के नियमों और हरकतों से इतनी परेशान हो गईं कि उन्होंने अपनी किताबें ख़ुद ही छापने का फ़ैसला किया। वह हाथों से चलने वाला एक प्रिंटिंग प्रेस ख़रीद लाईं। उसे चलाना सीखा। हाथों से ही टाइपसेट करना होता था। सो, वह भी सीखा। यह बहुत मेहनत का काम था, ख़ासतौर पर उस महिला के लिए जो दुबली-पतली, महज़ पचास किलो की हो।

उन्होंने एक जगह लिखा है, “अपनी किताबें ख़ुद छापने से मुझे एक बड़ी सीख मिली कि कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात कही जाए। मुझे ख़ुद ही टाइपसेट करना होता था। सो, जितने कम शब्द होंगे, उतनी ज़्यादा आसानी होगी।”

परिस्थितियां हमें यह सिखा देती हैं कि हम कैसे कम के भीतर संतोष कर लें। सामान जितना कम होगा, सफ़र में थकान भी उतनी ही कम होगी।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(एलिफ़ शफ़क तुर्की की समकालीन लेखिका हैं। रूमी और शम्स तबरेज़ी के जीवन पर लिखा उनका उपन्यास ‘द फोर्टी रूल्स ऑफ़ लव’ बेहद चर्चित है। वह तुर्की और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। यह संस्मरण उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द ब्लैक मिल्क’ से लिया गया है।)

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गार्सीया मारकेस : साहित्य से प्यार करने वाला चोर

वे मेरे लेखन के शुरुआती दिन थे। उस समय मैं जो तरीक़ा अपनाता था, आज के तरीक़े से एकदम अलग था। मैं अख़बार में काम करता था। दिन भर लिखता था। रात के कुछ घंटे बाहर दोस्तों के साथ रहता। वापस दफ़्तर आकर सो जाता था। सुबह उठकर फिर काम शुरू कर देता था। उस समय भी मैं सिर्फ़ दो उँगलियों से टाइप करता था और तब तक पैराग्राफ़ नहीं बदलता था, जब तक कि मैं उससे संतुष्ट न हो जाऊँ।

मेरे भीतर जो भी कुछ चलता था, उसे मैं काग़ज़ पर उँडेल देता था, कच्चा, अधपका। मुझे लगता है कि काग़ज़ की लंबाई के कारण मुझे यह आदत पड़ गई थी। अख़बार में छपाई के लिए काग़ज़ के रोल आते हैं, उसमें से काग़ज़ काटकर लिखने के लिए दिया जाता था। वे रोल लंबे-लंबे होते थे, सो उनमें से कटे टुकड़े भी बेहद लंबे होते थे। आज की तरह ए-फोर साइज के पेपर नहीं। कई बार तो एक टुकड़ा ही पाँच मीटर लंबा होता था और हम लोग उसी पर टाइप करते थे। कैसा दृश्य होता था! एक सँकरा-सा काग़ज़ टाइपराइटर से निकला हुआ है, एक तरफ़ टाइप हो रहा है और आगे वह ज़मीन पर किसी विशाल पूँछ की तरह फैलता जा रहा है। हमारे संपादक महोदय की आदत भी उसी के हिसाब से बनी हुई थी। जब भी वह हमें लेख लिखने को कहते, पेज या शब्द संख्या के आधार पर न कहते, बल्कि कहते, ‘मुझे डेढ़ मीटर लंबा लेख चाहिए।’

बरसों बाद जब मैं प्रसिद्ध लेखक बन गया, मैं लिखने की इस शैली को ‘मिस’ करने लगा। अब कंप्यूटर को देखकर लगता है कि यह एकदम उस लंबे काग़ज़ वाली शैली का ही विस्तार है, क्योंकि कंप्यूटर की स्क्रीन पर भी काग़ज़ की लंबाई का पता नहीं चलता।

मैं देर तक काम करता था। हर समय दिमाग़ में सिर्फ़ मेरी कहानी चलती। एक ही चीज़ को कई-कई बार लिखता। सुबह तक लिखने के बाद जब थक जाता, दफ़्तर के पिछले कमरों में काग़ज़ के रोल्स पर सो जाता। काग़ज़ का बिस्तर बनाकर। उसी रोल वाले काग़ज़ को ही ओढक़र। बीच में बाहर जाकर थोड़ा खा-पी लेता, वरना वह भी मुल्तवी कर देता।

हर दिन पिछले दिन की तरह बीत जाता, सिर्फ़ शुक्रवार की रातों को छोड़कर। उस रोज़ हम शाम से ही बाहर निकल जाते। लेखकों-कलाकारों का एक बड़ा समूह था। हम सब एक कैफ़े मे मिलते और बहसें करते। इस समूह में एक शख़्स सबसे अजीब था। वह एक चोर था। वह आधी रात से थोड़ा पहले आता था। हमेशा अपनी चोरों वाली यूनिफॉर्म में होता यानी टाइट पैंट, कपड़े के जूते, बेसबॉल टोपी और हल्के औज़ारों वाली एक पोटली।

एक बार किसी के यहाँ चोरी करते समय वह पकड़ा गया। पकड़ने वाले ने उसका फोटो खींचकर अख़बार में छपवा दिया, ताकि हर कोई उस चोर को पहचान ले और उसे अपने घर के आसपास देखकर सावधान हो जाए। इससे उसकी चोरियाँ तो नहीं रुकीं, बल्कि उसके नाम हज़ारों पाठकों की चिट्ठियां आईं। उनमें उस तस्वीर को छपवाने वाले को खरीखोटी सुनाई गई थी कि कैसे वह एक ग़रीब चोर के पेट पर इस तरह लात मार सकता है।

उस चोर को साहित्य से ख़ूब प्रेम था। जब हम कला और किताबों के बारे में बोल रहे होते, वह बहुत ग़ौर से सुनता, एक शब्द भी न चूकता। हमें पता था कि वह कविताएँ भी लिखता है, प्रेम-कविताओं का एक सकुचाया हुआ शर्मसार-सा कवि, जो अपनी रचनाएँ हम सबसे छुपा ले जाता था। जब हम उस जगह नहीं होते थे, तो वह वहाँ मौजूद दूसरों को अपनी कविताएँ सुना देता था, ऐसा हमें कई बार पता चला था।

आधी रात के बाद वह पड़ोस के किसी अमीर मुहल्ले की ओर चला जाता, इतने सुकून के साथ, जैसे यह उसकी नौकरी हो। फिर तीन-चार घंटे बाद लौटकर आता। हम अपनी बहसों में मशग़ूल तब भी वहीं डटे रहते। वह हम लोगों के लिए कभी गहना लेकर आता, कान की बाली या अंगूठी, जो कि चोरी के माल का हिस्सा होती। हमें भेंट करते हुए वह कहता, ‘यह मेरी तरफ़ से, तुम्हारी प्रेमिका के लिए।’ हालांकि उसने यह कभी नहीं पूछा कि हमारी कोई प्रेमिका थी भी या नहीं।

चोरी करते समय वह घर में किताबें खोजा करता, अगर किसी बेहद सुंदर किताब पर उसकी नज़र पड़ जाती, तो वह उसे हमारे लिए तोहफ़े में ले आता। अगर वह किताब ज़्यादा सुंदर और ज़्यादा लोगों के लिए उपयोगी नज़र आती, तो उसे हमें देने के बजाय वह मीरा देल्मार द्वारा संचालित सार्वजनिक पुस्तकालय को भेंट कर देता था।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(गाब्रियल गार्सीया मारकेस दक्षिण अमेरिका के महान लेखक थे। उन्हें 1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह हिस्सा उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘लिविंग टु टेल अ टेल’ से लिया गया है।)

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यान लिआनके : अंधियार तले एक धड़कता दिल खोजना

1950 के दशक के अंत और साठ के दशक की शुरुआत में समाजवाद को स्‍थापित करने के लिए चीन ने बहुत प्रयास किए थे। इस कारण देश में लगातार तीन साल तक प्राकृतिक आपदाओं को निमंत्रण मिला। तीन करोड़ लोगों की भूख से मौत हुई। इन आपदाओं के कुछ ही बरसों बाद (तब मैं छोटा था) एक दिन, मेरी माँ मुझे साथ लेकर गाँव के सीवान पर बनी दीवारों के पार कचरा फेंकने गई। मध्‍य चीन का हमारा वह गाँव ग़रीब, पिछड़ा और शेष इलाक़ों से कटा हुआ था।

माँ ने मेरा हाथ पकड़ा, सफ़ेद और पीली मिट्टी वाली दीवार की तरफ़ इशारा किया और कहा, ‘बेटे, एक बात हमेशा ध्‍यान रखना। जब लोग भूख से मर रहे हों, खाने के लिए कुछ भी न हो, तब यह सफ़ेद मिट्टी, उस पेड़ (एल्‍म नामक एक जंगली पेड़) की छाल के साथ मिलाकर खाई जा सकती है। लेकिन अगर कोई वह पीली मिट्टी खाएगा, तो जल्‍द ही मर जाएगा।’

मुझे साथ लेकर माँ घर लौट आई। खाना बनाने के लिए वह रसोई में चली गई और बाहर आँगन में अपनी लंबी परछाईं छोड़ गई। मैं खाई जा सकने वाली उस मिट्टी के सामने खड़ा था, मुझे गाँव दिख रहा था और खेत भी। सूरज डूब रहा था और थोड़ी ही देर में अंधेरे की विशाल चादर ने सबकुछ को ढँक लिया।

उस दिन के बाद से जीवन के कृष्णपक्ष के प्रति मैं सराहना के भाव से भर गया। मुझे यह समझ में आ गया कि अंधेरे का अर्थ सिर्फ़ प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं होता , बल्कि अंधेरा अपने आप में जीवन होता है। अंधेरा ही चीनी जनता का प्रारब्‍ध है।

आज का चीन मेरे बचपन के चीन से बहुत अलग है। यह अमीर और शक्तिशाली हो गया है। इसने 1.3 अरब लोगों को रोटी, कपड़ा और पैसा मुहैया कराने की बुनियादी समस्‍या को सुलझा लिया है। अब वह प्रकाश की उस चमकीली किरण का प्रतिबिंब बन गया है, जो पूरे पूर्व को रोशन करती है। लेकिन इस रोशनी के नीचे एक गहरा काला अंधकार रहता है।

जब मैं आज के चीन को देखता हूँ, तो पाता हूँ कि यह एक फलता-फूलता लेकिन विकृत देश है, विकास हो रहा है लेकिन सबकुछ बदल रहा है। मैं चारों ओर भ्रष्‍टाचार, धांधलियाँ, अव्‍यवस्‍था और अराजकता पाता हूँ। हर रोज़ कुछ न कुछ ऐसा घटित होता है, जिसे तर्क के सहारे समझना मुश्किल है। हमने हज़ारों बरसों में नैतिकता और मनुष्‍यता का सम्‍मान करने वाली व्‍यवस्‍था बनाई थी, लेकिन उसकी सिलाई अब उधड़ चुकी है। जीवन अंधकार और अवसाद से भरा हुआ है। हर कोई कुछ न कुछ भयावह घटित होने की ख़ौफ़नाक प्रतीक्षा में है। इसके कारण सामूहिक बेचैनी का माहौल बन गया है।

यह कोई नहीं बता सकता कि अर्थव्‍यवस्‍था के विकास का यह दनदनाता इंजन कहाँ जाकर रुकेगा। कोई नहीं बता सकता कि अब, जबकि पैसे और ताक़त ने समाजवाद और पूँजीवाद दोनों को बेदख़ल कर दिया है, आगे चलकर हमें मानवीय अनुभूतियों, मानव स्‍वभाव और गरिमा के बदले क्‍या क़ीमत चुकानी होगी? लोकतंत्र, स्‍वतंत्रता, क़ानून और नैतिकता के आदर्शों को छोड़ देने की क़ीमत हमें क्‍या देकर चुकानी होगी?

कुछ साल पहले की बात है। मैं अपने सूबे हेनान के एक गाँव में गया। वह गाँव एड्स की चपेट में था। उसके निवासियों की संख्‍या सिर्फ़ 800 थी, जबकि वहाँ 200 से ज़्यादा लोग एचआईवी से संक्रमित थे। उनमें से ज़्यादातर 30 से 45 की उम्र के मज़दूर थे। उन्‍हें यह संक्रमण इसलिए हुआ था कि पैसा पाने के लोभ में वे लोग जत्‍थे के जत्‍थे रक्‍तदान करने गए थे। वहाँ से वे संक्रमण लेकर लौटे। उनकी मृत्‍यु उतनी ही निकट व अनिवार्य थी जितना कि सूरज का डूबना। वहाँ इतना अंधकार फैल गया था, जैसे सूरज स्‍थायी रूप से डूब गया हो।

चीन को अपनी हज़ारों साल पुरानी संस्‍कृति पर गर्व है, लेकिन जब एक बूढ़ा आदमी सड़क पर गिर जाता है, भले उसके बदन से ख़ून बह रहा हो, उसे कोई उठाने नहीं जाता। सबको डर लगता है कि जाने किस मुसीबत में फँस जाएँ। हम किस तरह के समाज में रह रहे हैं, जहाँ एक गर्भवती स्‍त्री ऑपरेशन टेबल पर मर जाती है और सारे डॉक्‍टर अपने सहायकों सहित वहाँ से भाग छिप जाते हैं। उस मृत्‍यु की ज़िम्‍मेदारी कोई नहीं लेना चाहता। पीछे एक नन्‍ही आत्‍मा अपनी कमज़ोर रुलाहट के साथ बची रह जाती है।

इस अंधेरे के बीच जीवन की तलाश करना ही एक लेखक का काम है। इसे ‘राइटर्स जॉब’ कह सकते हैं। जॉब शब्‍द से मुझे बाइबल का एक चरित्र याद आता है। उसका नाम भी जॉब था। उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है। उसकी पत्‍नी उससे कहती है कि अब तो ईश्वर को कोसो। वह कहता है, ‘ईश्‍वर ने हमें जो अच्‍छा दिया है हम उसे ले लें और जो बुरा दे रहा, उसे अस्‍वीकार करके उसे कोसें, यह कैसे हो सकता है?’ इस जवाब से पता चलता है कि जॉब मानता था, ईश्‍वर उसकी परीक्षा ले रहा है और जीवन में अंधेरा व रोशनी एक साथ रहा करते हैं।

मैं ऐसा कोई स्‍वांग नहीं करना चाहता कि मैं ईश्‍वर द्वारा चुना गया जॉब हूँ, जिसका काम ही पीड़ा झेलना है। किंतु मैं इतना तो जानता हूँ कि अंधेरे को बूझने का काम मुझे दिया गया है। इन्‍हीं अंधेरी परछाइयों के तले मैं अपनी क़लम उठाता हूँ। इन्‍हीं के नीचे से गुज़रते हुए मैं प्रेम, भलाई और एक धड़कता हुआ दिल खोजता हूँ।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(यान लिआनके के उपन्‍यास ‘लेनिन्‍स किसेज़’ की चर्चा ख़ासे समय से है। वह समकालीन चीन के सबसे विवादास्‍पद लेखक हैं। 2014 में उन्‍हें प्राग में प्रतिष्ठित फ्रांत्‍ज़ काफ़्का पुरस्‍कार दिया गया। सम्‍मान समारोह में उनके द्वारा दिए गए वक्तव्‍य से यह अंश चुना गया है।)

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