पाब्लो नेरूदा – 2 : मेरी पहली कविता

pablo-neruda

अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि मैंने अपनी पहली कविता कब लिखी थी, कविता ने मेरे भीतर ठीक-ठीक कब जन्म लिया था। मैं याद करने की कोशिश करता हूँ। बचपन की बात है। उसी समय मैंने पढ़ना सीखा था। एक रोज़ मेरे भीतर भावनाओं ने उपद्रव किया और मैंने कागज़ पर कुछ शब्द लिख दिए। उनमें से कुछ लय और तुक में थे लेकिन लिखने के बाद वे शब्द भी मुझे अजनबियों जैसे लग रहे थे। मैं अपने जीवन में रोज़मर्रा जिस भाषा का इस्तेमाल करता था, ये शब्द उससे पराई भाषा के लग रहे थे। उस गहरी बेचैनी से, मैं बड़ी मशक़्क़त के बाद बाहर आ पाया। मुझे उसकी आदत नहीं थी। वह एक क़िस्म की व्यथा और उदासी थी। उससे किसी तरह परे होने के बाद मैंने उन पंक्तियों को एक सादे काग़ज़ पर साफ़-सुथरा लिख दिया।

वह कविता मेरी माँ के लिए थी। मेरी सौतेली माँ। हाँ, मैं एक अच्छी सौतेली माँ को जानता हूँ। वह सौतेली थी, लेकिन फ़रिश्तों जैसी थी, उसकी नरम-मुलायम छांव में मेरे बचपन की निगहबानी हुई। मैंने पहली ही कविता लिखी थी और मेरे पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं था, जिससे मैं यह जान सकूं कि मैंने आख़िर लिखा क्या है, तो ज़ाहिर है, काग़ज़ का वह टुकड़ा लेकर मैं अपने माता-पिता के पास गया।

वे डाइनिंग रूम में बैठे थे और फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। जब भी माता-पिता फुसफुसाकर बातें करते हैं, वे नदियों की तरह ज़मीन को दो हिस्सों में बांट देते हैं, एक हिस्सा बड़ों के लिए और दूसरे पार का हिस्सा बच्चों के लिए। उनके सामने खड़ा मैं कविता के आकस्मिक स्पर्श से कांप रहा था, कविता से भरा वह काग़ज़ मैंने उनकी ओर बढ़ा दिया। खोए-खोए से मेरे पिता ने आधे मन से वह काग़ज़ पकड़ा, आधे मन से उसे पढ़ा और आधे मन से ही मुझे वापस करते हुए कहा, ‘कहाँ से नक़ल मारी है बेटा?’ इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस, आवाज़ नीची करके जाने किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर माँ से बातें करने लग गए।

इस तरह मेरी पहली कविता ने जन्म लिया था, और इसी तरह, पहली कविता के साथ ही मुझे ग़ैर-जि़म्मेदार साहित्यिक आलोचना का पहला नमूना भी तोहफ़े में मिला था।

*

कुछ घटनाएं साथ-साथ चलती हैं। वे आपस में जुड़ी न दिखें, लेकिन कब वे असर करती हैं, पता नहीं चलता। ये ऐसी ही घटनाएं हैं। अब मैं आपको चिड़ियों से जुड़ी एक कहानी बताता हूँ। बूदी झील में बहुत बेरहमी से हंसों का शिकार किया जाता था। शिकारी अपनी नाव में झुककर छिप जाते थे, फिर नाव को बहुत तेज़ चलाते थे। हवा के साथ हंसों का रिश्ता अनाड़ियों जैसा होता है। वे पानी को छूते हुए लगभग दौड़ते हैं, ठीक से उड़ते नहीं, उन्हें अपने भारी पंखों को उठाने में बड़ी ताक़त लगती है। और इसीलिए तेज़ दौड़ती नावें उन्हें आसानी से पकड़ लेती हैं। वे पानी पर ही उसे डंडे मारते हैं और नाव में खींच लेते हैं। किसी ने मुझे ऐसा ही हंस दिया, जो अधमरा था। वह इतना सुंदर पक्षी थी कि जीवन में दुबारा वैसा कुछ भी देखने को न मिला। जैसे बर्फ का बर्तन हो, सुराही जैसी गर्दन पर किसी ने तंग काला मोज़ा पहना दिया हो, नारंगी रंग की चोंच और लाल आँखें।

मैंने उसके घाव धोए, उसके गले में डबलरोटी और मछलियों के टुकड़े भर दिए, लेकिन उसने सबकुछ उलट दिया। वह जल्द ही ठीक होने लगा और उसने महसूस किया कि मैं उसका दोस्त हूँ। उसकी देखभाल करते हुए मुझे हमेशा यह लगता कि उसे यक़ीनन अपने घर की याद आ रही होगी। उतने भारी पक्षी को, जिसकी ऊँचाई मेरे जितनी थी, लेकर मैं नदी पर गया। वह किनारे-किनारे ही थोड़ा-सा तैरा, नदी के भीतर नहीं गया। मैं उसे मछली पकड़ना सीखने की याद दिलाने लगा। बार-बार उसका ध्यान तल के कंकड़ों और उन नन्ही मछलियों की ओर ले जाता, जिनकी चंचलता लुभाती है। लेकिन हंस की उदास आँखें दूर, कहीं दूर, खो जाती थीं।

मैं पूरे बीस दिन उसे अपने साथ ढोकर घर से नदी और नदी से घर लाता रहा। एक दोपहर वह बहुत सुंदर दिखने लगा था। उस रोज़ तैरते समय वह मुझसे दूर नहीं जा रहा था, मैं उसे मछली पकड़ना सिखाने की जितनी कोशिश करता, वह उन पर ध्यान ही नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद जब मैंने उसे अपनी बांहों में लिया, वह एकदम शांत हो गया। जब मैंने उसे सीने से लगाया, लगा, जैसे कोई मुलायम-सी फीता धीरे-धीरे खुल रहा हो, एक काली भुजा मेरे चेहरे को सहला रही हो। उसकी लंबी सुराहीदार गर्दन लहराकर गिर-गिर जा रही थी। उसी दिन मुझे पता चला, मरते समय हंस कभी गीत नहीं गाते।

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

अक्सर मुझसे यह सवाल किया जाता है कि मैंने अपनी पहली कविता कब लिखी थी, कविता ने मेरे भीतर ठीक-ठीक कब जन्म लिया था। मैं याद करने की कोशिश करता हूँ। बचपन की बात है। उसी समय मैंने पढ़ना सीखा था। एक रोज़ मेरे भीतर भावनाओं ने उपद्रव किया और मैंने कागज़ पर कुछ शब्द लिख दिए। उनमें से कुछ लय और तुक में थे लेकिन लिखने के बाद वे शब्द भी मुझे अजनबियों जैसे लग रहे थे। मैं अपने जीवन में रोज़मर्रा जिस भाषा का इस्तेमाल करता था, ये शब्द उससे पराई भाषा के लग रहे थे। उस गहरी बेचैनी से, मैं बड़ी मशक़्क़त के बाद बाहर आ पाया। मुझे उसकी आदत नहीं थी। वह एक क़िस्म की व्यथा और उदासी थी। उससे किसी तरह परे होने के बाद मैंने उन पंक्तियों को एक सादे काग़ज़ पर साफ़-सुथरा लिख दिया।

वह कविता मेरी माँ के लिए थी। मेरी सौतेली माँ। हाँ, मैं एक अच्छी सौतेली माँ को जानता हूँ। वह सौतेली थी, लेकिन फ़रिश्तों जैसी थी, उसकी नरम-मुलायम छांव में मेरे बचपन की निगहबानी हुई। मैंने पहली ही कविता लिखी थी और मेरे पास ऐसा कोई ज़रिया नहीं था, जिससे मैं यह जान सकूं कि मैंने आख़िर लिखा क्या है, तो ज़ाहिर है, काग़ज़ का वह टुकड़ा लेकर मैं अपने माता-पिता के पास गया।

वे डाइनिंग रूम में बैठे थे और फुसफुसाकर बातें कर रहे थे। जब भी माता-पिता फुसफुसाकर बातें करते हैं, वे नदियों की तरह ज़मीन को दो हिस्सों में बांट देते हैं, एक हिस्सा बड़ों के लिए और दूसरे पार का हिस्सा बच्चों के लिए। उनके सामने खड़ा मैं कविता के आकस्मिक स्पर्श से कांप रहा था, कविता से भरा वह काग़ज़ मैंने उनकी ओर बढ़ा दिया। खोए-खोए से मेरे पिता ने आधे मन से वह काग़ज़ पकड़ा, आधे मन से उसे पढ़ा और आधे मन से ही मुझे वापस करते हुए कहा, ‘कहाँ से नक़ल मारी है बेटा?’ इसके बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस, आवाज़ नीची करके जाने किन महत्वपूर्ण मुद्दों पर माँ से बातें करने लग गए।

इस तरह मेरी पहली कविता ने जन्म लिया था, और इसी तरह, पहली कविता के साथ ही मुझे ग़ैर-जि़म्मेदार साहित्यिक आलोचना का पहला नमूना भी तोहफ़े में मिला था।

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कुछ घटनाएं साथ-साथ चलती हैं। वे आपस में जुड़ी न दिखें, लेकिन कब वे असर करती हैं, पता नहीं चलता। ये ऐसी ही घटनाएं हैं। अब मैं आपको चिड़ियों से जुड़ी एक कहानी बताता हूँ। बूदी झील में बहुत बेरहमी से हंसों का शिकार किया जाता था। शिकारी अपनी नाव में झुककर छिप जाते थे, फिर नाव को बहुत तेज़ चलाते थे। हवा के साथ हंसों का रिश्ता अनाड़ियों जैसा होता है। वे पानी को छूते हुए लगभग दौड़ते हैं, ठीक से उड़ते नहीं, उन्हें अपने भारी पंखों को उठाने में बड़ी ताक़त लगती है। और इसीलिए तेज़ दौड़ती नावें उन्हें आसानी से पकड़ लेती हैं। वे पानी पर ही उसे डंडे मारते हैं और नाव में खींच लेते हैं। किसी ने मुझे ऐसा ही हंस दिया, जो अधमरा था। वह इतना सुंदर पक्षी थी कि जीवन में दुबारा वैसा कुछ भी देखने को न मिला। जैसे बर्फ का बर्तन हो, सुराही जैसी गर्दन पर किसी ने तंग काला मोज़ा पहना दिया हो, नारंगी रंग की चोंच और लाल आँखें।

मैंने उसके घाव धोए, उसके गले में डबलरोटी और मछलियों के टुकड़े भर दिए, लेकिन उसने सबकुछ उलट दिया। वह जल्द ही ठीक होने लगा और उसने महसूस किया कि मैं उसका दोस्त हूँ। उसकी देखभाल करते हुए मुझे हमेशा यह लगता कि उसे यक़ीनन अपने घर की याद आ रही होगी। उतने भारी पक्षी को, जिसकी ऊँचाई मेरे जितनी थी, लेकर मैं नदी पर गया। वह किनारे-किनारे ही थोड़ा-सा तैरा, नदी के भीतर नहीं गया। मैं उसे मछली पकड़ना सीखने की याद दिलाने लगा। बार-बार उसका ध्यान तल के कंकड़ों और उन नन्ही मछलियों की ओर ले जाता, जिनकी चंचलता लुभाती है। लेकिन हंस की उदास आँखें दूर, कहीं दूर, खो जाती थीं।

मैं पूरे बीस दिन उसे अपने साथ ढोकर घर से नदी और नदी से घर लाता रहा। एक दोपहर वह बहुत सुंदर दिखने लगा था। उस रोज़ तैरते समय वह मुझसे दूर नहीं जा रहा था, मैं उसे मछली पकड़ना सिखाने की जितनी कोशिश करता, वह उन पर ध्यान ही नहीं दे रहा था। थोड़ी देर बाद जब मैंने उसे अपनी बांहों में लिया, वह एकदम शांत हो गया। जब मैंने उसे सीने से लगाया, लगा, जैसे कोई मुलायम-सी फीता धीरे-धीरे खुल रहा हो, एक काली भुजा मेरे चेहरे को सहला रही हो। उसकी लंबी सुराहीदार गर्दन लहराकर गिर-गिर जा रही थी। उसी दिन मुझे पता चला, मरते समय हंस कभी गीत नहीं गाते।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

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