पाब्‍लो नेरूदा – 1 : मेरा जीवन, मेरे संघर्ष

pablo-neruda

दुनिया मुझे पाब्‍लो नेरूदा के नाम से जानती है, लेकिन घरवालों ने स्‍पैनिश परंपरा के अनुकूल मेरा लंबा-सा नाम रखा था- नेफ्ताली रिकार्दो रेयेस बासोआल्‍तो। जब मैंने कविताएं लिखनी शुरू कीं, तो मैंने अपना नाम पाब्‍लो नेरूदा रख लिया। सच कहूँ, मुझे ठीक से याद नहीं, मैंने अपना नाम कब बदला, क्‍यों बदला, ठीक-ठीक क्‍यों मैंने यही नाम चुना, कोई और नाम क्‍यों नहीं चुना। मैं तेरह या चौदह साल का था। कविताएं लिखता था। मेरे पिताजी बेहद सख़्त इंसान थे। लेखक बनने का मेरा सपना उन्‍हें बिल्‍कुल पसंद नहीं था। वह मुझे देखकर परेशान हो उठते थे। उन्‍हें लगता था, जब तक मेरे भीतर लेखक बनने का सपना रहेगा, मेरे पास कोई भविष्‍य नहीं होगा। मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो जाएगा। मुझे उनकी बातें समझ नहीं आती थीं। मैं तो एक किशोरवयीन लेखक था। मैं अपना लेखन उनसे कैसे छिपा सकता हूँ- अक्‍सर मैं ये बातें सोचता रहता था।

उन्‍हीं दिनों मैंने चेक कथाकार यान नेरूदा को पढ़ा। मैंने उनकी कविताएं कभी नहीं पढ़ी थीं, लेकिन मेरे पास उनकी कहानियों की एक किताब थी। उसमें प्राग के आसपास के परिवेश और लोगों की कथाएं थीं। शायद मैंने अपना नया नाम वहीं से चुना। इतना समय हो चुका है कि मुझे ठीक से याद ही नहीं है। फिर भी सभी लोग यही मानते हैं कि मैंने यान नेरूदा से अपना चुना। इसी कारण चेक और प्राग के लोग मुझे बहुत अपना मानते हैं।

मैंने हर जगह लिखा है। मैंने जंगलों में लिखा, मैं चारागाहों में लिखा। मैंने सड़क पर लिखा और भेड़ों की ऊन छीलते समय भी लिखा। लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है। जिस तरह सांस लिये बिना मैं जि़ंदा नहीं रह सकता, उसी तरह लिखे बिना भी जीवित रहना मुमकि़न नहीं। मैंने कार में यात्रा करते हुए भी लिखा है। जहाँ संभव हो, मैं वहाँ लिख सकता हूँ। मुझे प्रकृति, जीवन, हलचलों में शरीक रहना अच्‍छा लगता है। चारों ओर बहुत लोग हों, बहुत शोर हो, मैं तब भी लिख लेता हूँ। हाँ, अगर अचानक सन्‍नाटा छा जाए, तो मेरे लिखना रुक जाता है।

शुरुआती दिनों में तो हाथ से ही लिखता था, पर बाद के दिनों में मैंने टाइपराइटर अपना लिया। एक बार एक हादसे में मेरी उंगली टूट गई। उसके कारण मेरा टाइप करना बंद हो गया। फिर भी कविताएं तो लिखनी ही थीं, मैं हाथ से लिखता रहा। जब मेरी उंगली ठीक हो गई, तो मैंने फिर टाइपराइटर पकड़ लिया। पर मैंने पाया, जिन कविताओं को

मैंने हाथ से लिखा था, वे अधिक सुंदर, अधिक नाज़ुक थीं। उनकी फार्म में मैं आसानी से फेरबदल कर सकता था। मुझे ऐसा लगता है कि टाइपराइटर के प्रयोग ने कविता के साथ मेरी आत्‍मीयता को कुछ कम किया था। हाथ से लिखने पर वह आत्‍मीयता मैंने वापस पा ली।

अब लोग मेरी आर्थिक स्थिति पर व्‍यंग्‍य करते हैं। उन्‍हें लगता है कि मेरा रहन-सहन आलीशान है और मैं पैसों के बीच खेलता हूँ। वे यह क्‍यों भूल जाते हैं कि मेरी पहली किताब जिसकी अब लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं, और जिन कविताओं को लोग कंठस्‍थ रखते हैं, वह छपने के बाद भी मैं टूटी चप्‍प्‍पल, कई बार नंगे पैर ही चलता था। जितना काम और संघर्ष मैंने किया है, उतना बहुत कम लोगों के हिस्‍से में आया, फिर भी सारी निंदाएं मेरे ही हिस्‍से आती हैं, यह अजीब लगता है। मैंने अपना जीवन जनता के कल्‍याण के लिए समर्पित कर दिया है। मेरे पास अपना कहने के लिए सिर्फ़ किताबें हैं। मैं अपना सबकुछ लोगों में बांट दिया। जो लोग मेरी आलोचना करते हैं, वे इसका एक हिस्‍सा भी करके दिखा दें। मैं तो सिर्फ़ इतना कहता हूँ कि एक दिन के लिए अपना जूता तो छोड़कर दिखा दें। नंगे पैर चलकर दिखा दें।

मैंने अपने जीवन का एक हिस्‍सा भारत में भी बिताया है। रेसीडेंस ऑन अर्थ की कविताएं मैंने भारत में ही लिखीं। मुझे वहाँ अच्‍छा लगा, लेकिन वहाँ के जीवन ने मुझे बहुत निराश किया। लोग अपनी चिंताओं को मिटाने भारत जाते हैं, वहाँ का रहस्‍य, धर्म अनुभव करने के लिए। वे शायद दूसरी तरह के लोग हैं। मुझे तो भारत बहुत अलग लगा। एक निहत्‍था देश, अपने आप में असुरक्षित। वहाँ नौजवानों ने अंग्रेज़ी संस्‍कृति अपना ली है। अंग्रेज़ी संस्‍कृति मुझे भी बहुत प्रिय है, लेकिन भारत के लोगों पर मुझे वह बहुत अटपटी लगी, लगभग घिनौनी, क्‍योंकि उस अंग्रेज़ी संस्‍कृति के कारण वे पश्चिम की बौद्धिक ग़ुलामी कर रहे हैं।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

( नेरूदा की किताब मेमॉयर्स तथा उनके विभिन्‍न साक्षात्‍कारों से चुन कर बनाया गया टुकड़ा।)

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