ओरहान पामुक – 1 : जिस दिन पिता नहीं रहे…

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उस रात मैं देर से घर पहुँचा था। पता चला, पिताजी की मृत्यु हो गई है। क़रीब दो बजे रात मैं उनके कमरे में गया, ताकि उन्हें आख़िरी बार देख सकूँ। सुबह से फोन आ रहे थे, लोग आ रहे थे, मैं अंत्येष्टि की तैयारियों में लगा हुआ था। लोगों की बातें सुनते हुए, पिताजी के कुछ पुराने हिसाब चुकता करते हुए, मृत्यु के काग़ज़ात पर हस्ताक्षर करते हुए बार-बार मेरे भीतर यही ख़याल आ रहा था, हर क़िस्म की मौत में, मरने वाले से ज़्यादा महत्वपूर्ण रस्में हो जाती हैं।

एक दिन मैं किसी को बता रहा था, मेरे पिताजी ने मुझे कभी डाँटा नहीं, कभी ज़ोर से नहीं बोला, मुझे कभी नहीं मारा। उस समय मुझे उनकी दयालुता के कितने क़िस्से याद आए। जब मैं छोटा था, जो भी चित्र बनाता था, मेरे पिताजी कितनी प्रशंसा के भाव में भरकर उन्हें देखते थे। जब मैं उनकी राय पूछता, तब वे मेरे लिखे हर वाक्य को इस तरह पढ़ते, जैसे मैंने मास्टरपीस लिख दिया हो। मेरे बेस्वाद और नीरस चुटकुलों पर वह ठहाके लगाकर हँसते थे।

अगर बचपन में उन्होंने मेरे भीतर वह विश्वास न भरा होता, मैं कभी लेखक नहीं बन पाता। हम दोनों भाइयों में उन्होंने बचपन से ही यह विश्वास रोपा कि हम होनहार और दूसरों से अलग हैं। वह ख़ुद के बारे में यही सोचते थे कि वह सबसे अलग हैं और उनका मानना था कि हम उनके बेटे हैं, इसलिए हमें भी वैसा ही होना है।

उन्होंने कई किताबें पढ़ी थीं, वह कवि बनना चाहते थे, वैलरी की कविताओं का अनुवाद भी किया था। जवानी में उन्होंने कई किताबें जुटाई थीं। जब मैंने उन किताबों को पढ़ना शुरू किया, तो उन्हें बेहद ख़ुशी हुई। वह किताबों को मेरी तरह उत्तेजना में भरकर नहीं पढ़ते थे, बल्कि दिमाग़ में चल रहे कोलाहल को शांत करने और आनंद के लिए पढ़ते थे, लेकिन वह ज़्यादातर किताबों को बीच में छोड़ देते थे।

दूसरे पिता अपने बच्चों से सेनापतियों की तरह बात करते थे, लेकिन मेरे पिता बताते थे कि कैसे उन्होंने पेरिस की गलियों में सार्त्र और कामू को चलते हुए देखा है। अठारह साल बाद जब मेरा पहला उपन्यास प्रकाशित हुआ, उन्होंने मुझे एक सूटकेस दिया। उसमें उनकी डायरी, कविता, नोट्स और साहित्यिक लेखन था। उन्हें पढक़र मैं बहुत असहज हो गया। वह सब उनके भीतर के जीवन के दस्तावेज़ थे।

हम अपने पिता को एक आम इंसान की तरह कभी नहीं देख पाते, हम चाहते हैं कि वह हमेशा हमारे आदर्श के रूप में रहें, जैसा हम उन्हें अपने भीतर बनाते आए हैं।

कॉलेज के दिनों में, जब मैं अवसाद में था, मैं सिर्फ़ उनकी प्रतीक्षा करता था कि वे आएँ, डिनर टेबल पर हमारे साथ बैठें और ऐसी बातें बोलें कि हमारा मन खिल उठे। छुटपन में मेरा पसंदीदा शौक़ था कि उन्हें देखते ही मैं उनकी गोद में चढ़ जाऊँ, उनकी गंध महसूस करूँ और उनका स्पर्श करूँ। मैं चाहता था कि मेरे पिता मुझसे कभी दूर न जाएँ, फिर भी वह दूर गए।

जब वह सोफ़ा पर बैठकर किताबें पढ़ते, कभी-कभी उनकी आँखें पन्ने पर से हटकर कहीं दूर देखने लग जातीं, वह अपने में खो जाते। तब मुझे लगता, मेरे पिता के भीतर कोई और शख़्स भी रहता है, जिस तक मेरी पहुँच नहीं है और वह किसी और ही जीवन के स्वप्न देखता है, तब मुझे बुरा लगता। कभी-कभी वह कहते, मैं उस गोली की तरह महसूस करता हूँ, जिसे बिना किसी कारण दाग़ दिया गया है। जाने क्यों मुझे इस बात पर ग़ुस्सा आता था। शायद भीतर ही भीतर मैं उनके इन पहलुओं से दूर भागना चाहता था।

बरसों बाद, जब मेरे भीतर से यह ग़ुस्सा निकल चुका था, मैंने अपने पिता को उस तरह देखना शुरू किया कि उन्होंने कभी हमें डाँटा तक नहीं, मारना तो दूर है, मैंने पाना शुरू किया कि हम दोनों के बीच गहरी समानताएँ हैं। जब मैं किसी मूर्ख पर गुर्राने लगता हूँ, या वेटर से शिकायत करता हूँ, या अपने ऊपरी होंठ काटता हूँ, या किसी किताब को आधा ही पढक़र छोड़ देता हूँ या अपनी बेटी का चुंबन लेता हूँ, या जब जेब से पैसे निकालता हूँ या किसी अजनबी के स्वागत में हल्की-फुल्की बातें करता हूँ, मुझे लगता है, मैं अपने पिता की नक़ल कर रहा हूँ।

यह नहीं कि मेरे हाथ, पैर, कलाई या मेरी पीठ पर बना तिल उनके जैसा है, बल्कि यह ख़याल ही कई बार मुझे डरा देता है कि मैं तो बचपन से ही उनके जैसा बन जाने की प्रतीक्षा कर रहा था। इंसान की मौत उसी दिन से शुरू हो जाती है, जिस दिन उसके पिता नहीं रहते।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(ओरहन पमुक तुर्की के प्रसिद्ध उपन्‍यासकार हैं। उन्‍हें 2006 में साहित्‍य का नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह निबंध उनकी पुस्‍तक ‘अदर कलर्स’ से लिया गया है।)

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