हारुकि मुराकामी : कोई लेखक मेरा दोस्त नहीं

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न तो मैं कोई बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हूँ और न ही आक्रामक। मैं ठीक उन्हीं लोगों जैसा हूँ, जो मेरी किताबें पढ़ते हैं। मैं एक जैज़ क्लब चलाता था, ग्राहकों के लिए कॉकटेल और सैंडविच बनाता था। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं लेखक बनूँगा। यह सब अपने आप होता चला गया। मुझे लगता है कि यह मुझे ईश्वर का दिया एक अनमोल उपहार है। इसीलिए मैं भरसक विनम्र रहने की कोशिश करता हूँ।

तब मेरी उम्र 29 साल थी। मैं अपने व्यवसाय में मस्त रहता था। अचानक एक दिन एक फुटबॉल मैच देखते हुए, जाने कैसे मुझे सूझा कि मुझे एक उपन्यास लिखना चाहिए। मैं आज तक उस प्रेरणा का स्रोत नहीं समझ पाया। उस रोज़ आधी रात जब सब सो गए, मैं अपने किचन टेबल पर बैठा और उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। मैं लिखना तो चाहता था, शुरुआती वाक्य भी लिख दिए, पर मुझे लिखना नहीं आता था। हर वाक्य के बाद मेरी उलझन बढ़ जाती थी। समझ में ही नहीं आता था कि अब क्या लिखूँ।

मेरे पिता जापानी साहित्य के अध्यापक थे, लेकिन मैंने ख़ुद कभी जापानी साहित्य नहीं पढ़ा था। मैं बचपन से ही पश्चिमी संस्कृति में रचा-बसा था। जैज़ संगीत, दोस्तोएव्स्की, काफ्का, रेमंड चैंडलर, ये सब मेरे अपने लोग थे। उनकी दुनिया, मेरी दुनिया था। मैं इनकी किताबें उठाता और पढ़ते-पढ़ते अपने आप सेंट पीटर्सबर्ग या अमेरिका पहुँच जाता। यह उपन्यास की शक्ति होती है, वह आपको कहीं भी पहुँचा सकता है। आज आप आसानी से अमेरिका जा सकते हैं, लेकिन साठ के दशक में बड़ा मुश्किल था। मैं किताबें पढ़कर, संगीत सुनकर, मन ही मन वहाँ पहुँच जाता। किसी स्वप्न की तरह।

तो इस तरह, जब मैं उपन्यास लिखने बैठा, पहले ही पन्ने के बाद अटक गया कि अब क्या लिखा जाए। जापानी साहित्य तो पढ़ा ही नहीं था और लिख जापानी में रहा था। तो मैंने अपने प्रिय पश्चिमी लेखकों को याद किया और उनकी शैली में लिखने लगा। नतीजा यह हुआ कि पहली ही किताब से मेरी अपनी अलग शैली विकसित हो गई।

यह अच्छा ही हुआ कि मुझे जापानी साहित्य का ज्ञान नहीं था, और मेरे प्रिय विदेशी लेखकों को मेरी भाषा के भीतर नकल करना लगभग असंभव काम है। मेरी भाषा और विदेशी प्रभाव दोनों ने मौलिक मिश्रण बना दिया।

मुझे वह किताब पूरा करने में दस महीने का समय लगा। उसका शीर्षक रखा : हवा का गीत सुनो। (अब मुझे वह कमज़ोर किताब लगती है। अंग्रेज़ी में इसका नाम है ‘हियर द विंड सिंग’।) मैंने अपनी पांडुलिपि एक प्रकाशक को भेजी और कुछ ही दिन बाद उसे पहला पुरस्कार मिल गया। मैं हैरान था। मेरी शुरुआत हो गई थी। मैंने अपनी पत्नी से कहा, मैं लेखक बन गया। मुझसे ज़्यादा हैरान वह थी क्योंकि लेखक, होटलवाले के मुकाबले कहीं ज़्यादा ग्लैमरस करियर था।

मैंने छपने से पहले वह उपन्यास उसे पढ़ने के लिए दिया था। उसे पसंद नहीं आया। उसके बाद मैंने उसे तीन-चार बार लिखा। मेरी पत्नी ने मुझे बरसों बाद बताया कि दरअसल, उसने मेरी पांडुलिपि पढ़ी ही नहीं थी। बिना पढ़े ही उसने अपनी नकारात्मक राय दे दी थी, क्योंकि उसे लगता था, मैं लिख नहीं सकता।

जब वह किताब सफल हो गई, उससे इतने पैसे आ गए कि मुझे कोई दूसरा काम करने की ज़रूरत न पड़े, तब से वह मेरी किताबों की पहली पाठिका बन गई। उसके बाद से वह मेरा लिखा हर पेज पढ़ने और उस पर बहस करने को तत्पर रहती है।

मेरे लेखक बनने से पहले, मेरा कोई दोस्त तक लेखक न था। और मेरे लेखक बनने के बाद भी, आज तक, मेरा कोई लेखक दोस्त नहीं। दो-तीन जो हैं, वे भी विदेशों में हैं। अब तक मुझे किसी लेखक को दोस्त बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। मैं अकेला रहता हूँ। समूह, स्कूल या साहित्यिक कार्यक्रम मुझे पसंद नहीं।

प्रिंसटन में एक बार एक दावत में मुझे भी बुलाया गया था। सकुचाया हुआ-सा मैं वहाँ गया। वहाँ जॉयस कैरल ओट्स आई थीं, टोनी मोरीसन भी थीं। इतने बड़े लेखकों की उपस्थिति में मैं एकदम घबरा गया। मैं इतना सहमा हुआ था कि उस दावत में खाना भी नहीं खा पाया। पहली बार वहाँ एकाध लेखकों से दोस्ती जैसा रिश्ता बना, लेकिन जापान में तो कोई भी लेखक मेरा दोस्त नहीं। मैं खुद भी लोगों से दूरी बनाए रखना पसंद करता हूँ। हमेशा यही कहता हूँ कि लेखक को अपने अच्छे लिखे पर निर्भर रहना चाहिए, किसी ख़ास समूह में शामिल होने या ख़ास लोगों से दोस्ती कर लेने पर नहीं।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(हारुकि मुराकामी जापान के सबसे चर्चित लेखक हैं। उनके विभिन्न साक्षात्कारों के आधार पर यह छोटा-सा टुकड़ा बनाया गया है।)

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