गार्सीया मारकेस : साहित्य से प्यार करने वाला चोर

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वे मेरे लेखन के शुरुआती दिन थे। उस समय मैं जो तरीक़ा अपनाता था, आज के तरीक़े से एकदम अलग था। मैं अख़बार में काम करता था। दिन भर लिखता था। रात के कुछ घंटे बाहर दोस्तों के साथ रहता। वापस दफ़्तर आकर सो जाता था। सुबह उठकर फिर काम शुरू कर देता था। उस समय भी मैं सिर्फ़ दो उँगलियों से टाइप करता था और तब तक पैराग्राफ़ नहीं बदलता था, जब तक कि मैं उससे संतुष्ट न हो जाऊँ।

मेरे भीतर जो भी कुछ चलता था, उसे मैं काग़ज़ पर उँडेल देता था, कच्चा, अधपका। मुझे लगता है कि काग़ज़ की लंबाई के कारण मुझे यह आदत पड़ गई थी। अख़बार में छपाई के लिए काग़ज़ के रोल आते हैं, उसमें से काग़ज़ काटकर लिखने के लिए दिया जाता था। वे रोल लंबे-लंबे होते थे, सो उनमें से कटे टुकड़े भी बेहद लंबे होते थे। आज की तरह ए-फोर साइज के पेपर नहीं। कई बार तो एक टुकड़ा ही पाँच मीटर लंबा होता था और हम लोग उसी पर टाइप करते थे। कैसा दृश्य होता था! एक सँकरा-सा काग़ज़ टाइपराइटर से निकला हुआ है, एक तरफ़ टाइप हो रहा है और आगे वह ज़मीन पर किसी विशाल पूँछ की तरह फैलता जा रहा है। हमारे संपादक महोदय की आदत भी उसी के हिसाब से बनी हुई थी। जब भी वह हमें लेख लिखने को कहते, पेज या शब्द संख्या के आधार पर न कहते, बल्कि कहते, ‘मुझे डेढ़ मीटर लंबा लेख चाहिए।’

बरसों बाद जब मैं प्रसिद्ध लेखक बन गया, मैं लिखने की इस शैली को ‘मिस’ करने लगा। अब कंप्यूटर को देखकर लगता है कि यह एकदम उस लंबे काग़ज़ वाली शैली का ही विस्तार है, क्योंकि कंप्यूटर की स्क्रीन पर भी काग़ज़ की लंबाई का पता नहीं चलता।

मैं देर तक काम करता था। हर समय दिमाग़ में सिर्फ़ मेरी कहानी चलती। एक ही चीज़ को कई-कई बार लिखता। सुबह तक लिखने के बाद जब थक जाता, दफ़्तर के पिछले कमरों में काग़ज़ के रोल्स पर सो जाता। काग़ज़ का बिस्तर बनाकर। उसी रोल वाले काग़ज़ को ही ओढक़र। बीच में बाहर जाकर थोड़ा खा-पी लेता, वरना वह भी मुल्तवी कर देता।

हर दिन पिछले दिन की तरह बीत जाता, सिर्फ़ शुक्रवार की रातों को छोड़कर। उस रोज़ हम शाम से ही बाहर निकल जाते। लेखकों-कलाकारों का एक बड़ा समूह था। हम सब एक कैफ़े मे मिलते और बहसें करते। इस समूह में एक शख़्स सबसे अजीब था। वह एक चोर था। वह आधी रात से थोड़ा पहले आता था। हमेशा अपनी चोरों वाली यूनिफॉर्म में होता यानी टाइट पैंट, कपड़े के जूते, बेसबॉल टोपी और हल्के औज़ारों वाली एक पोटली।

एक बार किसी के यहाँ चोरी करते समय वह पकड़ा गया। पकड़ने वाले ने उसका फोटो खींचकर अख़बार में छपवा दिया, ताकि हर कोई उस चोर को पहचान ले और उसे अपने घर के आसपास देखकर सावधान हो जाए। इससे उसकी चोरियाँ तो नहीं रुकीं, बल्कि उसके नाम हज़ारों पाठकों की चिट्ठियां आईं। उनमें उस तस्वीर को छपवाने वाले को खरीखोटी सुनाई गई थी कि कैसे वह एक ग़रीब चोर के पेट पर इस तरह लात मार सकता है।

उस चोर को साहित्य से ख़ूब प्रेम था। जब हम कला और किताबों के बारे में बोल रहे होते, वह बहुत ग़ौर से सुनता, एक शब्द भी न चूकता। हमें पता था कि वह कविताएँ भी लिखता है, प्रेम-कविताओं का एक सकुचाया हुआ शर्मसार-सा कवि, जो अपनी रचनाएँ हम सबसे छुपा ले जाता था। जब हम उस जगह नहीं होते थे, तो वह वहाँ मौजूद दूसरों को अपनी कविताएँ सुना देता था, ऐसा हमें कई बार पता चला था।

आधी रात के बाद वह पड़ोस के किसी अमीर मुहल्ले की ओर चला जाता, इतने सुकून के साथ, जैसे यह उसकी नौकरी हो। फिर तीन-चार घंटे बाद लौटकर आता। हम अपनी बहसों में मशग़ूल तब भी वहीं डटे रहते। वह हम लोगों के लिए कभी गहना लेकर आता, कान की बाली या अंगूठी, जो कि चोरी के माल का हिस्सा होती। हमें भेंट करते हुए वह कहता, ‘यह मेरी तरफ़ से, तुम्हारी प्रेमिका के लिए।’ हालांकि उसने यह कभी नहीं पूछा कि हमारी कोई प्रेमिका थी भी या नहीं।

चोरी करते समय वह घर में किताबें खोजा करता, अगर किसी बेहद सुंदर किताब पर उसकी नज़र पड़ जाती, तो वह उसे हमारे लिए तोहफ़े में ले आता। अगर वह किताब ज़्यादा सुंदर और ज़्यादा लोगों के लिए उपयोगी नज़र आती, तो उसे हमें देने के बजाय वह मीरा देल्मार द्वारा संचालित सार्वजनिक पुस्तकालय को भेंट कर देता था।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(गाब्रियल गार्सीया मारकेस दक्षिण अमेरिका के महान लेखक थे। उन्हें 1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह हिस्सा उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘लिविंग टु टेल अ टेल’ से लिया गया है।)

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