अमोस ओज़ : बड़ा होकर एक किताब बनूँगा

Amos Oz

हमारे पास सिर्फ़ एक ही चीज़ इफ़रात में थी, और वह थी- किताबें। हर जगह किताबें। दीवारों पर। दरीचों पर। गलियारे में। रसोई में। घर में घुसते ही किताबें। हर खिड़की पर रखी हुई किताबें। घर के हर कोने में भरी हुईं हज़ारों किताबें। मेरी सोच है, लोग आएँगे और चले जाएँगे, पैदा होंगे और मर जाएँगे, लेकिन किताबें हमेशा-हमेशा रहेंगी, वे हमेशा के लिए होती हैं। जब मैं छोटा था, तो मेरा सपना था, बड़ा होकर मैं एक किताब बन जाऊँगा। लेखक नहीं बनूँगा, किताब बनूँगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है। लेखकों को मारना भी कोई मुश्किल काम नहीं, लेकिन किताबों को नहीं मारा जा सकता। आप कितना भी योजनाबद्ध तरीक़े से किसी किताब को ख़त्म करने की कोशिश करें, एक संभावना हमेशा रहेगी कि उसकी कोई एक प्रति दुनिया की किसी न किसी लाइब्रेरी के किसी कोने में ज़िंदा बची हुई हो।

मेरे बचपन में ऐसा कई बार हुआ कि त्योहार के दौरान भी घर में खाने के लिए पैसे न होते। ऐसे में माँ, पिताजी की ओर कातर निगाहों से देखती। पिताजी उसका देखना समझ जाते कि अब क़ुर्बानी देने का समय आ गया है। वह किताबों की आलमारी की तरफ़ बढ़ जाते। पिताजी नैतिक व्यक्ति थे। उन्हें पता था कि किताबों से ज़्यादा अहम रोटी होती है और रोटी से भी ज़्यादा अहम अपने बच्चे की ख़ुशी।

मुझे याद है, जब वह अपने हाथों में अपनी कुछ किताबें दबाकर सेकंड हैंड बुकशॉप की तरफ़ जा रहे थे, उन्हें बेचने के लिए, तब उनकी पीठ कुबड़ों की तरह झुक गई थी। जब अब्राहम अपने बेटे आइज़क की क़ुर्बानी देने के लिए उसे कंधे पर उठा मोरा की पहाड़ियों की तरफ़ जा रहा होगा, तब उसकी पीठ भी इसी तरह झुकी हुई होगी।

मैं उनकी पीड़ा का अंदाज़ा लगा सकता था। किताबों के साथ मेरे पिता का रिश्ता ऐंद्रिक था। उन्हें किताबों को महसूस करना, उन्हें थपथपाना, उन्हें सूँघना पसंद था। किताबों के साथ उन्हें सुख मिलता था। वह ख़ुद को रोक नहीं पाते थे। अपनी ही नहीं, दूसरों की किताबों तक भी बरबस चले जाते, उन्हें एक बार छूकर ज़रूर देखते।

और उस ज़माने में किताबें भी क्या माशाअल्लाह होती थीं। आज के ज़माने से कहीं ज़्यादा सुंदर। खुरदुरे सुगंधित चमड़े पर सुनहरे अक्षरों से लिखा होता था। उन्हें छूते ही दिल ज़ोर-से धड़कता था, जैसे किसी निजी और वर्जित हिस्से को छुआ जा रहा, जैसे उसे छूते ही वह धीरे-से काँप उठेगा। दूसरी ऐसी भी किताबें थीं, जो पुट्ठों के साथ बँधी होती थीं, उनकी जिल्द लेई से चिपकी होती, कैसी तो कामुक-सी सुगंध होती थी उस लेई की।

हर किताब की अपनी एक निजी और उत्तेजक सुगंध होती है।

कई बार पुट्ठों के ऊपर चढ़ी कपड़े की जिल्द उखड़ जाती थी, जैसे लहराती हुई स्कर्ट। उस समय कपड़े की जिल्द और पुट्ठे के बीच के अंधकार में झाँकने से हम ख़ुद को रोक नहीं पाते थे।

जब मैं छह साल का हुआ, तो पिता ने अपनी आलमारी का एक छोटा-सा हिस्सा मुझे दे दिया और कहा, यहाँ तुम अपनी किताबें रख सकते हो। मुझे याद है, मेरी किताबें जो मेरी पलंग के पास यूं ही पड़ी रहती थीं, उन सबको अपनी गोद में उठाकर मैंने बड़े क़रीने से उस आलमारी में सेट किया था। मैंने उस समय बेहद ख़ुशी महसूस की थी।

जो लोग आलमारी में अपनी किताबें खड़ी करके लगा सकते हैं, वे बड़े हो चुके होते हैं। बच्चे तो अपनी किताबें आड़ी बिछाकर रखते हैं। मैं बड़ा हो गया था। मैं पिता की तरह हो गया था।

ख़ैर, रोटी ख़रीदने के लिए किताब बेचने निकले पिता आमतौर पर एक-दो घंटे में लौट आते थे। लौटने पर उनके पास किताबें न होतीं, बल्कि भूरे लिफ़ाफ़े में ब्रेड, अंडे, चीज़ आदि होते। लेकिन कभी-कभार जब वह लौटते, अपनी क़ुर्बानियों के बावजूद उनके चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान होती। ऐसे समय उनके पास उनकी प्यारी किताबें न होतीं और वह खाने का कोई सामान भी ना लाते। वह घर से ले गई अपनी किताबें तो बेच देते थे, लेकिन उसी समय बदले में कुछ दूसरी किताबें ख़रीद लेते थे। उन्हें रद्दी की दुकान में कुछ ऐसी अनमोल किताबें मिल जातीं, जिन्हें पढ़ने का उनका बरसों पुराना सपना होता। वह उस मौक़े को हाथ से जाने न देते और मिले हुए पैसों से खाना ख़रीदने के बजाय वे किताबें ख़रीद लेते।

ऐसे समय मेरी माँ उन्हें माफ़ कर देती थी, मैं भी। क्योंकि मुझे आइसक्रीम और भुट्टों के अलावा कुछ भी खाना अच्छा नहीं लगता था। वे ऑमलेट या दूसरी चीज़ें ले आते, जो मुझे बिल्कुल नहीं भाती थीं। बहुत ईमानदारी से कहूँ, तो कई बार मुझे सुदूर भारत के कुपोषित बच्चों से ईर्ष्या होती थी, क्योंकि उन बच्चों से कोई यह ज़िद नहीं करता था कि अपनी थाली का खाना पूरा करके ही उठना।


अनुवाद – गीत चतुर्वेदी

(अमोस ओज़ इज़राल के महान लेखक थे। उनका उपन्यास ‘माय माइकल’ एक अद्भुत प्रेमकथा है। ऊपर का यह अंश उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक यानी उनकी आत्मकथा ‘अ टेल ऑफ़ लव एंड डार्कनेस’ से लिया गया है।)

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