आलाप में गिरह

यूँ तो गीत चतुर्वेदी की पहली कविता 1994 में छप गई थी, जब उनकी उम्र 17 वर्ष थी, लेकिन कविताओं की पहली किताब बनाने में उन्होंनें अगले 16 साल और लगा दिए। इस किताब में शामिल सबसे पुरानी कविता 1995 में लिखी गई थी, तो सबसे ताज़ा 2009 में। जब 2010 में ‘आलाप में गिरह’ प्रकाशित हुई, तो हिन्दी साहित्य संसार में इस किताब का भरपूर स्वागत और सराहना हुई।

गीत ने आपातकाल के बाद के वर्षों में अपना बचपन गुज़ारा और 1990 के बाद के उदारीकरण के दौर में उनकी युवावस्था बीती। इन दोनों राजनीतिक स्थितियों ने गीत की रचनात्मक चेतना को ख़ासा प्रभावित किया। इनके कारण गीत ने कविता की अपनी यात्रा एक ठोस यथार्थवादी कवि के रूप में शुरू की। ‘आलाप में गिरह’ एक यथार्थवादी कवि की कृति है।

हिन्दी के वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे ने इस किताब में एक लम्बा आफ़्टरवर्ड लिखा, जिसमें उन्होंने कहा, “गीत चतुर्वेदी रोज़मर्रा से उदात्त की बहुआयामी यात्रा एक ही कविता में उपलब्ध कर लेते हैं।” उन्होंने गीत चतुर्वेदी को “एक निर्भीक यथार्थवादी राजनीतिक कवि” भी कहा। मुंबई की महानगरीय चेतना, मध्यवर्गीय समाज, नब्बे के दशक का उदारीकरण, सांप्रदायिकता, राजनीतिक परिवेश, मनुष्य के व्यवहार की सूक्ष्मताएँ आदि विषय इस किताब की कविताओं के मूल में है।

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