गुंटर ग्रास : जब मैं हिटलर के साथ था

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मेरा बचपन एक झटके से ख़त्‍म हुआ था। तब मैं बारह साल का था। जिस शहर में मैं रहता था, उसके कई हिस्‍सों में युद्ध शुरू हो गया था। यह द्वितीय विश्‍वयुद्ध की शुरुआत थी। रेडियो पर युद्ध के समाचार आते थे और तल मंज़िल पर बने अपने फ्लैट में परिवार के साथ उन ख़बरों को सुनते हुए मैंने पाया कि मेरा बचपन ख़त्‍म हो चुका है। कभी हम अपनी इमारत की छत पर खड़े होकर देखते, तो हमें दूर-दूर तक ज़मीन से उठता हुआ धुआँ दिखता था। आज मैं उन सारे दिनों को याद करता हूँ और हैरान होता हूँ।

स्‍मृति लुका-छिपी खेलती है। दो पल के लिए सामने आती है, फिर ओझल हो जाती है। बेमतलब ही झाँक-झाँक जाती है। वह अपने आप में विरोधाभासी है, लेकिन वह ऐसी ही है- ऐसे ही वह अपना काम कर जाती है। स्‍मृति प्‍याज़ की तरह होती है। उसे प्‍याज़ की तरह छीलना होता है, तभी हम जान सकते हैं कि उसके भीतर वाली परत पर क्‍या लिखा है। वह हमेशा द्विअर्थी या बहुलार्थी होती है, और अक्‍सर उल्‍टे अक्षरों में लिखी होती है, जैसे आईने में पड़ने वाले अक्षरों का प्रतिबिंब।

उसकी सूखी त्‍वचा के नीचे एक और नम त्‍वचा होती है, उसे छीलो, तो नीचे एक और। यह सिलसिला चलता रहता है। हर त्‍वचा पर कुछ अक्षर उभरे होते हैं, कुछ संकेत, कुछ प्रतीक। उन्‍हें पढ़ना वैसा ही महसूस कराता है, जैसे बरसों पुराने रहस्‍यों को पढ़ने की कोशिश करना। जैसे किसी पुराने रहस्‍य ने ख़ुद को प्‍याज़ की परतों में छुपाए रखा है। प्‍याज़ की तरह स्‍मृति की भी कई त्‍वचाएँ होती हैं। एक को छीलो, तो दूसरी नई आ जाए। और अगर उसे काटो, तो आँखों में आँसू आ जाएं। स्‍मृति भी ऐसी होती है। सिर्फ़ छीलते समय सच निकल कर आता है।

उस समय युद्ध सीधे हमारे घरों तक चलकर नहीं आया था, हम रेडियो पर उसकी ख़बरें सुनते थे। दूर बंदरगाह के पास बम फटते थे। हमारे इलाक़े से वहाँ तक ट्राम जाया करती थी। मैं वहाँ चला जाता था। अक्‍सर बम के टुकड़े, उनके आवरण, छर्रे वहाँ से बीन लाता और शहर की दुकानों में उन्‍हें बेच देता। उनके बदले कभी डाक टिकट, तो कभी पिक्‍चर कार्ड, और कभी-कभी किताबें ख़रीद लिया करता। मैंने कुछ बहुत सुंदर किताबें बमों के टुकड़े बेचकर ख़रीदी थीं। जाने कितनी किताबें।

पिक्‍चर कार्ड्स जमा करने का तो मुझ पर जुनून था। उस ज़माने में सिगरेट की डिब्बियों के साथ पिक्‍चर कार्ड्स मिला करते थे। उन पर मशहूर पेंटिंग्‍स छपी होतीं। मैंने उन्‍हीं कार्ड्स के ज़रिए मॉन्‍तेना, बोत्तिचेली, गिरलांदियो जैसे महान चित्रकारों की पेंटिंग्‍स के बारे में जाना था और उन्‍हीं के ज़रिए मैं लंबे समय तक उन सबके नामों का ग़लत उच्‍चारण किया करता था। एक शख़्स मुझे सबसे ज़्यादा कार्ड्स देता था। वह सिगरेट ख़ुद रखता था, कार्ड्स उसके काम के न होते, तो मुझे दे देता। एक दिन पता चला कि वह बमबारी में मारा गया।

जब भी मैं बम बेचता, और कुछ डाक टिकट पा लेता, दौड़कर घर आता, उन्‍हें अपने एलबम में चिपका देता। मैंने तीन एलबम बना रखे थे – नीले एलबम में मैं पुरानी, नवजागरण से पहले की पेंटिंग्‍स चिपकाता था, लाल एलबम में नवजागरण की मशहूर पेंटिंग्‍स व टिकट। सुनहरे एलबम में बारोक काल की तथा अन्‍य चीज़ें चिपकाता था। उसमें बहुत सारा हिस्‍सा ख़ाली ही बचा हुआ था। वह मेरे बचपन का सबसे क़ीमती ख़ज़ाना था। मैं जान से भी बढ़कर उसकी हिफ़ाज़त करता था।

हमारे कई परिचित धीरे-धीरे मारे जा रहे थे। मेरे एक मामा, जो पोस्‍ट ऑफिस में काम करते थे, उन्‍हें जर्मनों ने मार डाला था। वह जर्मन-विरोधी पक्ष की तरफ़ थे। इन सबके बीच हमारे परिवार का अंदरूनी वातावरण भी बदल रहा था। जिन रिश्‍तेदारों की चर्चा हम बड़े शौक़ से करते थे, हमने पाया कि वे पिता की विचारधारा के विपरीत हैं। धीरे-धीरे हमारे परिवार में उनका नाम तक लेना बंद हो गया। उनके बच्‍चों की नई और प्‍यारी हरकतों का ज़िक्र ख़त्‍म हो गया। ऐसा लगा, जैसे वे बहुत सारे लोग हमारे जीवन में कभी थे ही नहीं। लोग ग़ायब हो रहे थे। न केवल धरती से, बल्कि हमारी बातों से भी।

मेरा अपना बचपन ग़ायब हो चुका था। पर मैं इतना छोटा था कि मुझमें इतनी हिम्‍मत कभी नहीं रही कि मैं पूछ सकूँ, ‘आख़िर क्‍यों?’ मैं कई सारी बातों के बदले पूछना चाहता था, आख़िर क्‍यों? लेकिन कभी नहीं पूछ पाया। मेरी इसी अक्षमता के कारण कुछ बरसों बाद मैंने ख़ुद को हिटलर की विचारधारा के साथ खड़ा पाया। मैं उसके नौजवान दल में “हिटलर युवा” की तरह शामिल हुआ। वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी भूल थी, क्‍योंकि मैं ख़ुद से, और दूसरों से, यह नहीं पूछ पाया कि आख़िर क्‍यों? मैंने युवा दिनों की उस भूल से सीख ली और उस रास्‍ते फिर नहीं गया। और मैंने अपना यह अतीत सभी से छिपाए रखा।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(जर्मनी के मशहूर लेखक गुंटर ग्रास को 1999 का साहित्‍य नोबेल पुरस्‍कार मिला था। यह अंश उनकी आत्‍मकथात्‍मक पुस्‍तक ‘पीलिंग द ऑनियन’ से है।)

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