एलिफ़ शफ़क : सामान कम होगा, तो थकान कम होगी

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सबकुछ व्यवस्थित हो, और एक ख़ास क़िस्म का मौन भी हो, यह मुझे परेशान करने के लिए काफ़ी है। बरसों तक एक ही मकान में रहना, एक ही पड़ोसी को रोज़ देखना, रोज़ एक ही गली में चलना, रोज़ एक ही शहर में घूमना यह सब मेरे बस का नहीं है। संतुलन और स्थिरता मेरे लिए रूसी और चीनी भाषाओं की तरह हैं। मुझे पता है, ये महान इतिहास वाली महान भाषाएँ हैं, पर कम से कम मैं, इन्हें नहीं बोलती।

सन्नाटा तो बेहद बुरा लगता है। जैसे ही ख़ामोशी का कोई बड़ा बादल गहराता है, मेरे भीतर की आवाज़ें ज़्यादा तेज़ हो जाती हैं। जब मैं लिखने बैठती हूँ, तो कमरे की सारी खिड़कियाँ खोल देती हूँ। ऐसा करके मेरा मन यह नहीं होता कि मेरा निजी संगीत मुझमें से निकले और बाहर के संगीत में शामिल हो जाए, बल्कि मैं यह चाहती हूँ कि बाहर का संगीत आकर मेरे भीतर के संगीत में घुल जाए।

वस्तुओं के साथ मेरा रिश्ता लगातार बेवफ़ाइयों पर आधारित है। मैं वस्तुएँ पाती हूँ, उनसे प्यार करती हूँ, फिर वे मुझसे छूट जाती हैं। बचपन से ही ऐसा रहा कि थोड़े-थोड़े समय के बाद मुझे अपना सामान पैक कर अगली जगह रवाना होना पड़ा। जब आप मुहल्ला बदल लेते हैं, शहर बदल लेते हैं या अपना महाद्वीप बदल लेते हैं, आप अपने साथ महज़ कुछ तयशुदा चीज़ें ही ले जा सकते हैं। बाक़ी सारी चीज़ें आपको पीछे छोड़ देनी होती हैं।

बार-बार घर और शहर बदलने ने मुझे यह सिखाया कि कैसे कम से कम फर्नीचर के साथ रहा जाए। मैं एक शहर में जो ख़रीदती, अगले शहर जाते समय उसे बेच देती। यह वैसा ही है, जैसे हर नए क़दम के साथ मैं पिछले क़दम की संपत्तियों को खो बैठूँ। उसके बाद भी एक सामान हमेशा मेरे साथ रहा, जहाँ कहीं भी मैं गया, वही मेरे काम आया। उसका अस्तित्व मृत सागर से भी पुराना है और पंख से भी हल्का है। उसे कहीं भी ले जाओ, कस्टम्स वाले कोई उलाहना भी नहीं करते। वह है- कहानी कहने की कला।

मैं अपनी सबसे अनमोल किताबें भी कभी अपने साथ नहीं रख पाई। बक्सों में बंद वे दोस्तों के घरों के तहख़ानों में पड़ी हैं। रूसी साहित्य का मेरा संग्रह अंकारा में मेरी मां के घर में पड़ा है, स्पैनिश की सारी किताबें इस्ताम्बुल में एक दोस्त के गैराज में रखी हुई हैं, अरबी साहित्य की अन्य किताबें उस कॉलेज के कमरे में हैं, जहाँ मैं पढ़ाती थी।

इस तरह से अव्यवस्थित रहने का एक अजीबोग़रीब फ़ायदा मुझे मिला। मेरी स्मृति तेज़ हो गई। जब आप किताबें पास नहीं रख सकते, तब आपके पास उसके महत्वपूर्ण हिस्सों को याद रखने के अलावा कोर्ई चारा नहीं होता। पास्तरनाक की ‘डॉक्टर ज़िवागो’ के कई संवाद मुझे रटे हुए हैं। रूमी की कविताएँ मेरे मन में हमेशा गूँजती रहती हैं। मैं उन किताबों को सदैव साथ नहीं रख सकती, लेकिन जब चाहूँ, अपने भीतर से उन पंक्तियों को याद कर सस्वर दोहरा सकती हूँ। आज भी मेरे भीतर रूमी की वे पंक्तियां गूंजती हैं-

“अगर मन के भीतर प्रेम का हीरा नहीं है, तो मेरे वजूद का यह बाज़ार संग-दर-संग ढह जाए।”

अनाइस नीन एक लेखिका थीं, जो फ्रांस में 1903 में पैदा हुई थीं। न केवल विश्व साहित्य पर उनके लेखन का गहरा असर पड़ा, बल्कि बीसवीं सदी के स्त्री मुक्ति आंदोलन को भी उन्होंने बहुत गहरे प्रभावित किया। वह लिक्खाड़ थीं। उपन्यास, कहानी, आलोचना सबकुछ लिखा, लेकिन उनकी डायरियाँ सबसे ज़्यादा पढ़ी गईं। आलोचकों का कहना था कि उनके उपन्यासों के किरदार दरअसल वह ख़ुद हैं और वह हमेशा इस बात से इंकार करती रहीं।

उनके जीवन के बारे में जो विचित्र बातें हैं, उनमें से एक यह कि वह प्रकाशन उद्योग के नियमों और हरकतों से इतनी परेशान हो गईं कि उन्होंने अपनी किताबें ख़ुद ही छापने का फ़ैसला किया। वह हाथों से चलने वाला एक प्रिंटिंग प्रेस ख़रीद लाईं। उसे चलाना सीखा। हाथों से ही टाइपसेट करना होता था। सो, वह भी सीखा। यह बहुत मेहनत का काम था, ख़ासतौर पर उस महिला के लिए जो दुबली-पतली, महज़ पचास किलो की हो।

उन्होंने एक जगह लिखा है, “अपनी किताबें ख़ुद छापने से मुझे एक बड़ी सीख मिली कि कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अपनी बात कही जाए। मुझे ख़ुद ही टाइपसेट करना होता था। सो, जितने कम शब्द होंगे, उतनी ज़्यादा आसानी होगी।”

परिस्थितियां हमें यह सिखा देती हैं कि हम कैसे कम के भीतर संतोष कर लें। सामान जितना कम होगा, सफ़र में थकान भी उतनी ही कम होगी।

*अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

(एलिफ़ शफ़क तुर्की की समकालीन लेखिका हैं। रूमी और शम्स तबरेज़ी के जीवन पर लिखा उनका उपन्यास ‘द फोर्टी रूल्स ऑफ़ लव’ बेहद चर्चित है। वह तुर्की और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिखती हैं। यह संस्मरण उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक ‘द ब्लैक मिल्क’ से लिया गया है।)

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